आसाधारण साहस के पीछे का सच
1971 का भारत-पाक युद्ध, मुट्ठी भर भारतीय जवान और सामने दर्जनों टैंकों के साथ हजारों की संख्या में दुश्मन. लोंगेवाला में उसके बाद जो हुआ उसे भारतीय सेना के असाधारण पराक्रम की गौरवशाली दास्तान कहा जाता है. सेना को इस वीरता के लिए कई सम्मान मिले. मगर खुद सेना के दस्तावेज इस लड़ाई का कुछ दूसरा ही सच बयां करते हैं. हरिंदर बवेजा की तहकीकात.
लोंगेवाला की लड़ाई को भारतीय थल सेना के इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में से एक कहा जाता है. 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान देश की पश्चिमी सीमा पर स्थित लोंगेवाला में भारतीय सेना के मुट्ठी भर जवानों ने असाधारण साहस और वीरता दिखाते हुए 45 टैंकों और 3000 सैनिकों वाली पाकिस्तानी ब्रिगेड के छक्के छुड़ा दिए थे. इस घटना पर कुछ साल पहले बॉर्डर नाम की एक फिल्म भी बनी जो काफी लोकप्रिय हुई थी.
लोंगेवाला की लड़ाई को 37 साल हो चुके हैं मगर आज भी इसका वर्णन लोगों को दांतो तले उंगली दबाने पर मजबूर करता है. भारतीय सेना की योजना थी कि अगर पाकिस्तान ने हमले की कोशिश की तो जवाबी हमले में नियंत्रण रेखा को पार कर रहीमयार खान तक कब्जा कर लिया जाएगा. मगर भारतीय सैन्य रणनीतिकारों को कहीं से भी ये आशंका नहीं थी कि पाकिस्तान की एक समूची टैंक रेजीमेंट थार मरुस्थल में लोंगेवाला की तरफ से हमला करेगी.
लेकिन जिसकी आशंका नहीं थी वही हुआ. बड़ी संख्या में टैंकों और हथियारों से लैस पाकिस्तान की रेजीमेंट ने लोंगेवाला पर हमला बोल दिया. बाकी की कहानी तो सबको पता ही है कि किस तरह भारत ने हार के जबड़े से जीत छीन ली. सेना को इसके लिए एक महावीर चक्र तथा पांच वीर चक्र मिले जबकि पाकिस्तानी टैंकों को नेस्तनाबूद करने वाली वायु सेना के जवानों को एक अतिविशिष्ट सेवा पदक और 10 वीर चक्र से सम्मानित किया गया.
किस्से जुदा-जुदा |
पाक सेना पर कहर बरपाने वाले हंटर विमान |
लोंगेवाला की लड़ाई के कई गौरवशाली क्षण थे जिनका वर्णन बार-बार सैन्य पत्रिकाओं में किया जाता रहा है. सबसे ज़्यादा सुना और सुनाया गया किस्सा है मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी के असाधारण पराक्रम का. ‘बॉर्डर’ में चांदपुरी की भूमिका मशहूर अभिनेता सन्नी देओल ने निभाई थी. जब पाकिस्तान के टैंक लोंगेवाला पोस्ट तक पहुंच गए तो चांदपुरी वहां करीब 100 जवानों की अल्फा कंपनी के साथ मौजूद थे. हजारों सैनिकों और इतनी बड़ी संख्या में टैंकों को देखकर भारतीय जवानों की हिम्मत जवाब देने लगी. इससे पहले कई घंटे तक चांदपुरी अपने अधिकारियों को फोन पर इस खतरे के बारे में बताते हुए मदद मांग रहे थे. मगर उन्हें कुछ इस तरह की प्रतिक्रिया मिली थी, “कुलदीप, ये क्या बेवकूफी भरी बातें कर रहे हो, हमला हम करने वाले हैं वो नहीं. उनके पास हमला करने की क्षमता ही नहीं है. तुम डरे हुए हो और इस वजह से तुम्हें कुछ भी दिखने लगा है.”
अंधेरे में आदमी को भ्रम हो जाता है मगर चांदपुरी के साथ ऐसा नहीं था. उन्हें चारों तरफ से घेरा जा चुका था और अगर वो चाहते तो भी बचने का कोई रास्ता नहीं था. जवानों को जोश दिलाने के लिए चांदपुरी ने गरजते हुए कहा, “जिसे दुश्मन का सामना करने में डर लग रहा है वो भाग सकता है मगर याद रखना कि इससे हमारी बटालियन पर दाग लग जाएगा. और याद रखना कि मैं यहीं रहूंगा और आखिर तक लडूंगा.”
इसलिए रात के अंधरे में जब एक पाकिस्तानी सैनिक चिल्लाया, “सिक्खों, तैयार हो जाओ, असी आ गए हां” तो दूसरी तरफ से ललकार आई, “हम तुम्हारा दो घंटे से इंतजार कर रहे हैं, तुमने आने में देर कर दी.” कहा जाता है कि अल्फा कंपनी के पास केवल एक ही ऐसी गन थी जो टैंकों को नष्ट करने में सक्षम थी.
यहीं से लोंगेवाला की लड़ाई का विवादास्पद पक्ष शुरू हो जाता है जिस पर सेना और वायु सेना के बीच एक बार फिर से टकराव छिड़ गया है. वायु सेना का दावा है कि जमीन पर कोई लड़ाई लड़ी ही नहीं गई और लोंगेवाला में भारत को हार से बचाने का श्रेय केवल उसे जाता है. वायुसेना के मुताबिक पाकिस्तानी टैंकों की धज्जियां उसके चार हंटर विमानों ने उड़ाई थीं जिन्होंने ऐसा करने के लिए कई उड़ानें भरी थीं.
लोंगेवाला की लड़ाई का वायुसेना संस्करण भी कई सैन्य जर्नल्स में प्रकाशित हुआ है और ये इस लड़ाई का वर्णन दूसरे ही ढंग से करता है.
एयर मार्शल एम एस बावा 1971 में विंग कमांडर और जैसलमेर के बेस कमांडर थे. उनके शब्दों में, पाकिस्तान का हमला अकेले वायु सेना ने ही विफल किया. पांच दिसंबर 1971 की सुबह बेस कमांडर को एक रेडियो संदेश मिला—“मैं टाइगर(मेजर जनरल खंबाटा, जीओसी 12 डिविजन) बोल रहा हूं. मुझे शक है कि दुश्मन भारी संख्या में तेजी से रामगढ़ की तरफ बढ़ रहा है. लोंगेवाला स्थित हमारी पोस्ट ने पूरी रात टैंकों की आवाज सुनी है और अपने सामने से टैंकों को गुजरते देखा है. मैं चाहता हूं कि तुम्हारे जवान जितना जल्दी हो सके इसकी जांच करें.” डिविजन कमांडर की आवाज की बेचैनी साफ महसूस की जा सकती थी.
बावा याद करते हैं कि लोंगेवाला में हालात बहुत तेजी से बिगड़ रहे थे. दुश्मन के टैंकों ने पोस्ट को घेर लिया था और बमबारी शुरू कर दी थी. इतनी भारी संख्या में मौजूद और विशाल मात्रा में गोलाबारुद से लैस दुश्मन से घिरे चांदपुरी बस डिविजन को खतरे से सावधान करने और मदद मांगने के अलावा क्या कर सकते थे. उन्हें भोर तक इंतजार करने की सलाह दी गई क्योंकि हंटर रात में नहीं उड़ सकता था. चांदपुरी और उनके जवान खंदक में ही रहे और अंधेरे की चादर उनकी जिंदगी और मौत के बीच की ढाल बनी रही.
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ध्वस्त T 59 टैंक |
थोड़ा सा उजाला होते ही जब वायुसेना के दो हंटर लोंगेवाला पहुंचे तो दुश्मन पोस्ट पर गोलाबारी शुरू कर चुका था. हालांकि तब तक पोस्ट को कोई नुकसान नहीं पहुंचा था. हंटर ने नीची उड़ान भरी और फ्लाइट लेफ्टिनेंट डी के दास और फ्लाइंग ऑफिसर आर सी गोसांई को अपने शिकार यानी टी-59 टैंकों को पहचानने में ज्यादा देर नहीं लगी.
अब लड़ाई सीधे पाकिस्तानी तोपखाने और भारतीय वायुसेना के बीच थी. सबसे पहले उन्होंने उस टैंक पर निशाना साधा जो चांदपुरी की पोस्ट से 50 मीटर से भी कम दूरी पर था. बम अपने लक्ष्य पर गिरा और टैंक में आग लग गई. दूसरा निशाना वो टैंक बना जो पोस्ट के नीचे बने हेलीपैड तक पहुंच गया था. ये निशाना भी अचूक रहा और इस टैंक के परखच्चे उड़ गए.
टैंक तो नष्ट होते जा रहे थे मगर इसके बावजूद दुश्मन आगे बढ़ रहा था. कुछ टैंक हेलीपैड तक पहुंच गए थे. उधर, जहाजों का ईंधन और गोलाबारूद खत्म हो रहा था. लोंगेवाला को बचाए रखने के लिए हवाई बमबारी को लगातार जारी रखना था क्योंकि ज़मीनी मदद कहीं दिखाई दे नहीं रही थी. अब वायुसेना को वक्त से भी लड़ना था. करीब 100 किलोमीटर या हवाई रास्ते से कुछ ही मिनट दूर वायु सेना के बेस पर मौजूद हर आदमी को दूसरी जिम्मेदारियों से हटाकर कम से कम समय में लड़ाई के लिए जहाज को तैयार करने के काम पर लगा दिया गया. वायुसेना के पास यही विकल्प था कि दिन का उजाला रहते-रहते ज्यादा से ज्यादा टैंकों को नष्ट कर दिया जाए. खतरा ये था कि अगर दुश्मन को पीछे हटने पर मजबूर नहीं किया गया तो रात में वो रामगढ़ से आगे बढ़ते हुए जैसलमेर एअर बेस पर ही कब्जा कर सकता था.
दो टैंकों को नष्ट करने और पांच को नुकसान पहुंचाने के बाद लडा़कू जहाजों का पहला जोड़ा वापस बेस पर आ गया. इसके बाद दो अन्य हंटरों ने उड़ान भरी. इस दूसरे हमले में दो टैंक नष्ट हुए और छह को नुकसान पहुंचा. हमले से पाक सेना में खलबली मच गई. टैंकों ने गोल-गोल घूमना शुरू कर दिया ताकि इससे पैदा होने वाले धूल के गुबार में खुद को छिपाकर वो हंटरों के निशाने से बच सकें. मगर इसका कोई फायदा नहीं हुआ क्योंकि हवाई लड़ाई के मामले में भारत के जाबांजों को महारत हासिल थी.
बावा से अल्फा कंपनी के बारे में पूछिए और उनके स्वर में कड़वाहट आ जाती है. वो कहते हैं, “उन्होंने रक्षामंत्री को लोंगेवाला में अपनी बहादुरी के किस्से सुनाए जबकि ऐसा था ही नहीं. हंटर्स ने पाकिस्तानी टैंकों का कचूमर निकाल दिया था. पांच दिसंबर को जब मैं लोंगेवाला पहुंचा तो चांदपुरी मेरे पैरों में गिर पड़े और उन्होंने जान बचाने के लिए हमारा शुक्रिया अदा किया. वो तो बस सर झुका कर खंदक में बैठे रहे थे.”
सवाल कई हैं. क्या जे पी दत्ता की बॉर्डर एक काल्पनिक घटना है? क्या सेना झूठा श्रेय ले रही है? वायु सेना इतनी नाराज क्यों है? रक्षा मंत्री के लोंगेवाला दौरे ने दोनों सेनाओं के बीच इस विवाद को एक बार फिर हवा दे दी है कि लड़ाई आखिर किसने जीती थी.
हम ग्रुप कैप्टन बाली से इस बारे में पूछते हैं जो उस समय स्क्वैड्रन कमांडर थे. बाली के विमान में आग लग गई थी मगर इसके बावजूद वो इसे बेस तक सुरक्षित पहुंचा पाने में सफल हो गए थे. उन्हें वीर चक्र से सम्मानित किया गया था. पांच दिसंबर की उस सुबह तीन बार हमले पर गया ये लड़ाकू पायलट कहता है, “हमें बताया गया था कि कुछ ही पाकिस्तानी टैंक हैं मगर हमने करीब 15 से भी ज्यादा टैंकों का सामना किया. मुझे लगा कि शायद टैंकों के बीच युद्ध चल रहा है. मैने तत्काल एअर ऑब्जर्वेशन पोस्ट पायलट से संपर्क किया और पूछा कि क्या नीचे हमारे सैनिक भी दुश्मन से भिड़े हुए हैं, और अगर ऐसा है तो हमें कहां पर बम बरसाने हैं. उन्होंने मुझसे कहा कि ऐसा नहीं है. इसका सीधा सा मतलब था कि वहां सेना नहीं लड़ रही थी.”
तो फिर कौन सच बोल रहा है? वायुसेना या थलसेना?
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रक्षामंत्री जगजीवन राम के साथ वायुसैनिक |
इस विवाद को भारतीय सेना के एक मेजर जनरल आत्मा राम हंसारा के बयान ने और भी हवा दे दी है. हंसारा तब सेना की वायु शाखा में मेजर थे. एक अखबार को दिए गए साक्षात्कार में हंसारा कहते हैं, “जमीनी लड़ाई की बात पूरी तरह से झूठ है. ये सेना के मूल्यों का मजाक है.” गौरतलब है कि बावा की तरह हंसारा भी पांच दिसंबर की शाम लोंगेवाला में उतरे थे और वो सेना के इस दावे पर सवाल खड़ा करते हैं कि उसके जवानों ने सारी रात दुश्मन को उलझाए रखा था.
तो क्या फिर थलसेना सच पर परदा डालने की दोषी है? क्या ये मुमकिन है कि दुश्मन के हजारों सैनिकों और दर्जनों टैंकों से घिरे करीब सौ जवान बिना किसी नुकसान के रात भर लड़ सकें? अगर उन्होंने दुश्मन का मुकाबला किया होता तो क्या वो इस लड़ाई की कहानी सुनाने के लिए जिंदा रहते?
इन सवालों की गुत्थी को सुलझाने की कोशिश में तहलका ने लोंगेवाला की ऐतिहासिक लड़ाई से संबंधित अहम दस्तावेज को ढूंढ निकाला.
एअर फोर्स वॉर डायरी
जैसलमेर स्थित 14 केअर एंड मेंटेनेंस यूनिट, जो कि 122 स्वैड्रन का हिस्सा है, की वॉर डायरी में उन अहम दिनों का विवरण इस तरह दर्ज है.
चार दिसंबर, 1971.... जब 12 इंफैट्री डिविजन अपना ध्यान रहीमयार खान की तरफ बढ़ने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले इलाके पर लगा रही थी तो दुश्मन की फौज घब्बर की तरफ से बीपी 638 होते हुए भारी संख्या में लोंगेवाला की तरफ बढ़ने लगी. टैंकों की टुकड़ी लोंगेवाला पोस्ट के सामने से गुजरी और आधी रात के बाद उन्हें रामगढ़ की तरफ बढ़ते देखा गया. लोंगेवाला में मौजूद कंपनी कमांडर ने इसकी जानकारी डिविजनल हेडक्वार्टर को दी मगर इस संदेश की उपेक्षा की गई.
टैंकों की टुकड़ी ने रामगढ़ से कुछ पहले पीछे लौटने का फैसला किया क्योंकि कुछ लोग पीछे छूट गए थे. ये दुश्मन की पहली घातक गलती थी जिसने बाद में लड़ाई का रुख बदल दिया. अगर टैंक चलते रहते तो वो आसानी से रामगढ़ पर कब्जा कर लेते क्योंकि वहां कोई सुरक्षा मौजूद नहीं थी. इन टैंकों के लोंगेवाला की तरफ लौटने औऱ दूसरे टैंकों के शोर के बाद कंपनी कमांडर ने एक बार फिर जीओसी 12 इंफैंट्री डिविजन को हालात की जानकारी दी. ये संदेश मिलते ही जीओसी ने बेस कमांडर से संपर्क साधने की कोशिश की मगर मुजाहिदों ने रामगढ़ में टेलीफोन लाइनें काट दी थीं. इससे उन्हें यकीन हो गया कि दुश्मन ने लोंगेवाला की तरफ से हमला बोला है. पांच दिसंबर को तड़के जीओसी और बेस कमांडर के बीच रेडियो संपर्क स्थापित हुआ.
पांच दिसंबर 1971....दुश्मन की गतिविधि की खबर मिलने के बाद बेस कमांडर ने पायलटों को उजाला होते ही हमले के लिए तैयार रहने को कहा. सात बजकर पंद्रह मिनट पर, जब टैंक लोंगेवाला पोस्ट तक पहुंचने ही वाले थे, पहला हंटर मिशन वहां पहुंचा. मिशन ने लोंगेवाला पोस्ट की तरफ बढ़ रहे दुश्मन पर हमला करने में देर नहीं लगाई. इसके बाद तेजी से एक के बाद एक मिशन भेजे गए. बेस कमांडर के पास सिर्फ चार हंटर थे और उन्होंने 17 बार उड़ानें भरीं. हमले में दुश्मन की आधी ताकत खत्म हो गई. उस शाम सेना ने दुश्मन का एक रेडियो संदेश पकड़ा जिससे पता चलता था कि पाकिस्तानी सेना की हिम्मत जवाब दे गई थी. इसमें कहा गया था, “दुश्मन की हवाई फौज ने नाक में दम कर दिया है. एक हवाई जहाज आता है और बीस-बीस मिनट ऊपर नाचता है. आगे जाना तो क्या पीछे मुड़ना भी मुश्किल हो गया है. जल्दी हवाई फौज मदद के लिए भेजो वरना वापस मुड़ना नामुमकिन है.”
वायु सेना की वॉर डायरी इसके अधिकारियों द्वारा कही गई बात की पुष्टि करती है. मेजर जनरल आर एफ खंबाटा द्वारा भेजा गया एक संदेश भी वायु सेना के दावे को वजन देता है. इसमें कहा गया है, “हमें आज बहुत बढ़िया सहयोग मिला. आपके लड़कों ने बहुत शानदार निशाना लगाया जिससे दुश्मन के कई टैंक नष्ट हुए औऱ उसका हमला बेअसर हो गया. कृपया पायलटों तक मेरी और मेरे जवानों की सराहना पहुंचा दीजिएगा. शानदार प्रदर्शन के लिए बधाइयां.”
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रक्षामंत्री एके एंटोनी लोंगेवाला के पास रामगढ़ में |
पाकिस्तान के कुछ सैन्य अधिकारियों द्वारा 1971 की लड़ाई पर लिखी गई किताबों में भी ये बात कही गई है कि भारतीय लड़ाकू विमानों के हमले से बचने के लिए पाकिस्तानी टैंक रेत में गोल चक्कर लगा रहे थे और धूल उड़ा रहे थे. सेवानिवृत्त मेजर जनरल शौकत रज़ा अपनी किताब द हिस्ट्री ऑफ पाकिस्तान आर्मी (1966-1971) में लिखते हैं कि पांच दिसंबर की सुबह जब वो लोंगेवाला पोस्ट तक पहुंचे ही थे कि दुश्मन का लड़ाकू जहाज प्रकट हुआ. टैंक खुले मैदान में बिना किसी हवाई सुरक्षा के खड़े थे और भारतीय लड़ाकू जहाजों को पूरी छूट थी.
लोंगेवाला की लड़ाई को याद करते हुए पाकिस्तानी जनरल मुकीम अपनी किताब क्राइसिस ऑफ लीडरशिप में लिखते हैं, “जैसे ही हमने हमला बोला, डिविजनल हेडक्वार्टर के साथ हमारा संपर्क पूरी तरह से टूट गया. इलाका बहुत बीहड़ होने की वजह से हालात बहुत खराब थे. बड़ी संख्या में गाड़ियां और टैंक रेत में धंस गए थे. दुश्मन को आसमान में महारत हासिल थी. दिन के वक्त वो बहुत सक्रिय था औऱ उसने चुन-चुनकर 18 टैंकों और कई दूसरे वाहनों को नष्ट करने में सफलता हासिल की.”
सैन्य दस्तावेज
तहलका ने 1971 की लड़ाई से जुड़े सेना के भी कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज हासिल किए हैं जिनसे लोंगेवाला का वो सच सामने आता है जिसे सेना आज भी मानने को तैयार नहीं है. इसमें साफ तौर 12 इंफैट्री डिविजन की इस चूक के बारे में कहा गया है कि उसने घब्बर-लोंगेवाला के इलाके पर ठीक तरह से निगाह नहीं रखी.
सेना के दस्तावेजों के मुताबिक पांच दिसंबर को सुबह साढ़े पांच बजे सूचना मिली कि छह पाक टैंकों को लोंगेवाला के पास खरोतार इलाके में देखा गया है. लेकिन 12 इंफैट्री डिविजन से बड़ी चूक हुई. हालांकि उनके पास लड़ाई के दौरान मुआयने की सारी सुविधाएं थीं लेकिन इसने घब्बार-लोंगेवाला के बीच मुआयना करने की कोशिश ही नहीं की. ये गलत जानकारी देते हुए कि उसके पास मुआयने के लिए संसाधनों की कमी थी. इनमें ये भी कहा गया है कि अगर पाक हमले के बारे में चार दिसंबर को ही पता लगा लिया जाता तो जमीन पर ही मुकाबला कर इसे असफल किया जा सकता था.
सेना की भूमिका के बारे में दस्तावेज कहते हैं कि विषम परिस्थितियों में भी लोंगेवाला में तैनात कंपनी वहां तब तक टिकी रही जब तक और सहायता नहीं पहुंच गई. मगर लड़ाई में इसकी भूमिका की वो कोई बात ही नहीं करते.
दस्तावेजों की मानें तो लोंगेवाला में उस दिन भारतीय वायु सेना ने अपने गौरवशाली इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा और मात्र चार हंटर्स ने ही लोंगेवाला पर हुए पाकिस्तानी हमले को न केवल पूरी तरह असफल कर दिया बल्कि दुश्मन की सेना को पीठ दिखाकर भागने पर मजबूर भी कर दिया. जैसा कि दस्तावेज कहते हैं, “ये पाक तोपखाने और भारतीय वायुसेना के हंटर्स के बीच सीधा मुकाबला था. बहुत ज्यादा गोलीबारी और टैंकों के द्वारा बचाव के हरसंभव प्रयासों के बावजूद हंटर्स ने हमला करना और टैंकों को एक के बाद एक निशाना बनाना जारी रखा...लोंगेवाला में पाकिस्तानी तोपखाने के हमले को रोकने और उसे उखाड़ फेंकने का काम मुख्य रूप से चंद हंटर्स ने किया. पाकिस्तान की हथियारबंद रेजीमेंट का ज्यादातर हिस्सा अकेले हवाई हमले में नष्ट हो गया.” दस्तावेज़ों के मुताबिक बाकी बची पाकिस्तानी सेना नष्ट हुए 27 और क्षतिग्रस्त 10 टैंकों को छोड़कर, 6 दिसंबर को अपने देश लौट गई.
इससे ज्यादा कुछ और कहे जाने की जरुरत ही खत्म हो जाती है.
तो क्या इस मामले की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए? उस दिन लोंगेवाला के आसमान से पाकिस्तान के टैंकों पर बम बरसाने वाले जांबाजों से पूछिए और जवाब आपको मिल जाएगा.
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प्रेषक : SadhnaSalute to our brave Saheeds & soldiers We should not to spresds dispute in our forces for war matter. we proud on our forces for nation security.Ultimate goal of all forces is how to safe borders from enemies.
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प्रेषक : संतोष कुमार गुप्ताभारतीय वीरों को कोिट कोिट नमन िजन्होंने राष्ट्रीय सम्मान तथा पाकिस्तानी जुल्मों को समाप्त करने में अपना सवर्स्व अिपर्त कर िदया ! हम केवल देशभक्ित की केवल बातें करते हैं उन्होंने अपने कृत्यों से देशभक्ित क्या है िवश्व को िदखला िदया। िनसंदेह भारतीय वायु सेना ने एेन वक्त पर अपनी अिद्वतीय युद्ध कौशल का पिरचय िदया पर क्या यह गवर् की बात नहीं की पाकिस्तानी हमले को िनष्क्रय करने सेना के सभी अंगों ने सामुिहक प्रयास किया ! जय िहन्द!
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प्रेषक : Kumar DevSari artical padne ke baad yahi lagta hai ki hamari force ke sabhi branches ek dusre se jude hue hai. Kisi bhi jang me ladne wala sipahi Insan hi hota hai cahe wo Navy ka ho , air force ka or BSF ka. Ye sabhi India ki shan hai isiliye aise controvercy wali batein faila kar unka manobal nahi todna cahiye. Hamare officers ko cahiye ki wo noukersaho ka attitude na apnaye aur politices se dur hi rahe.






















