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   एचआईवी जांच या मुश्किलों की आंच

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एड्स से लड़ने के बड़े-बड़े सरकारी दावों के बावजूद दिल्ली के सबसे अच्छे अस्पतालों में  भी एक साधारण सी एचआईवी जांच करवाना किसी मुसीबत से कम नहीं, ऐसा करने की कोशिश में क्या-क्या झेला बता रही हैं नेहा दीक्षित...

“ऐसा क्या किया कि टेस्ट कराने चली आई?”, कुछ कुछ व्यंग्य भरी मुस्कान के साथ रिसेप्शनिस्ट मुझसे पूछती है.

“कुछ नहीं, कई बार ब्लड डोनेट किया था.”, मैं जवाब देती हूं.

“आजकल सिरिंज से तो होता नहीं, ब्यॉयफ्रेंड है तुम्हारा?”, फिर से सवाल दागा जाता है.

खुद को कॉलेज का छात्र बताकर एचआईवी जांच करवाने के लिए हमने दिल्ली के कई सरकारी और निजी अस्पतालों के चक्कर लगाए. हमने पाया कि न केवल ज्यादातर अस्पतालों में इसके लिए बुनियादी सुविधाएं नदारद हैं बल्कि जांच करवाने आए लोगों के साथ अस्पताल के भीतर ही पूर्वाग्रहों से भरा व्यवहार शुरू हो जाता है. 

ये उस मुश्किल का छोटा सा नमूना भर है जो एचआईवी जांच करवाने के लिए अस्पताल जाने वाले किसी आम शख्स को झेलनी पड़ती है. और ये हाल तब है जब रेडियो, टीवी, अखबार और जगह-जगह लगे होर्डिंग्स में फिल्मी सितारे और मशहूर शख्सियतें लोगों से एड्स के खिलाफ लड़ाई लड़ने का आह्वान करते हैं. जोर-शोर से नारा दिया जाता है, 'जब हो एचआईवी अवस्था का ज्ञान तो बनी रहे मुस्कान'. लेकिन सच्चाई ये है कि इस सबके बावजूद एक साधारण सी एचआईवी जांच करवाने के लिए भी आम आदमी को बहुत सी मुश्किलें झेलनी पड़ती हैं.

खुद को कॉलेज का छात्र बताकर एचआईवी जांच करवाने के लिए हमने दिल्ली के कई सरकारी और निजी अस्पतालों के चक्कर लगाए. हमने पाया कि न केवल ज्यादातर अस्पतालों में इसके लिए बुनियादी सुविधाएं नदारद हैं बल्कि जांच करवाने आए लोगों के साथ अस्पताल के भीतर ही पूर्वाग्रहों से भरा व्यवहार शुरू हो जाता है.

कानून कहता है कि सभी अस्पतालों में एक एचआईवी परामर्श केंद्र होना आवश्यक है लेकिन हकीकत में ऐसा है नहीं. जहां कहीं ऐसे केंद्र हैं भी, वहां उन्हें ऐसी जगह पर बनाया गया है कि उन तक पहुंचने में अच्छी खासी मशक्कत करनी पड़ती है. और फिर जब आप वहां पहुंचते हैं तो पता चलता है कि परामर्श केंद्र कभी-कभार ही खुलता है.

सफदरजंग अस्पताल में ये केंद्र पांचवीं मंजिल पर सबसे अलग-थलग स्थित है जबकि मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज में ये है भी या नहीं इसके बारे में दिल्ली मेडिकल काउंसिल तक को जानकारी नहीं. यही हाल एलएनजेपी, होली फैमिली और एम्स जैसे बड़े अस्पतालों का भी है जहां रिसेप्शनिस्ट को इनके बारे में कुछ पता ही नहीं है. राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन के तहत आने वाले बेसिक सर्विसेज और सर्वेलेंस डिवीजन के संयुक्त निदेशक डॉ. अजय खेड़ा कहते हैं, “हम देश में मौजूद हर केंद्र की खबर नहीं रख सकते. ये दिल्ली राज्य एड्स नियंत्रण सोसाइटी की जिम्मेदारी है कि यहां के हर अस्पताल में मौजूद परामर्श केंद्र आसानी से आम आदमी की पहुंच में हो.”

सरकारी अस्पतालों में एचआईवी जांच की फीस 10 रुपये है. ज्यादातर सरकारी केंद्र दोपहर 12 बजे तक ही खुले रहते हैं. सफदरजंग अस्पताल के एचआईवी परामर्श केंद्र का तो ये हाल है कि ये ज्यादातर बंद ही रहता है. यहां तैनात गार्ड का कहना था, “ये हफ्ते में दो बार खुलता है. कभी-कभार तो इतना भी नहीं.” केंद्र के बाहर अपनी रिपोर्ट का इंतजार करते हुए एक मरीज ने हमें बताया, “पिछले तीन दिन में से मैं लगातार यहां आ रहा हूं लेकिन रोज ये बंद मिलता है.” अस्पताल के अतिरिक्त मेडिकल सुपरिटेंडेंट बार-बार कोशिश करने पर भी इस बारे में तहलका से बात करने के लिए तैयार नहीं हुए.

किस्मत अच्छी हो और कोई एचआईवी केंद्र को ढूंढ भी निकाले तो मुसीबत खत्म नहीं होती. जांच से पहले मरीज को परामर्श दिया जाना चाहिए ताकि अगर जांच का परिणाम पॉजिटिव निकले तो मरीज घबराए नहीं. लेकिन जहां और जब ये परामर्श दिया भी जाता है तो इसे परामर्श कम और पीड़ा कहना ज्यादा ठीक होगा. परामर्श के दौरान तथाकथित परामर्शदाता व्यंग्यपूर्ण तरीके से मुस्कराते रहते हैं. हालांकि सरकारी प्रचार अभियान में ये बात कही जाती है कि 15-29 साल के लोग इस खतरे के निशाने पर सबसे ज्यादा होते हैं, लेकिन एक युवा और अविवाहित युवती का टेस्ट के लिए आना डॉक्टरों के लिए किसी स्केंडल से कम नहीं होता. मौलाना अबुल कलाम आजाद हॉस्पिटल में डॉक्टर का व्यवहार ऐसा था जैसे वह मुझ पर सेक्स वर्कर होने का शक कर रहा हो. एम्स में परामर्शदाता पूछ रहे थे कि सेक्स को लेकर मेरी सक्रियता कितनी है.” एलएनजेपी में मौजूद परामर्शदाता तो इस बात पर भड़क गए कि मैं अपने साथ एक युवक को भी लाई थी. उनका सवाल था, “जब वो किसी और कालेज से है तो तुम उसे कैसे जानती हो.”

एचआईवी जांच करवा रहे व्यक्ति को अपनी पहचान गोपनीय रखने का अधिकार होता है. दुर्भाग्य से सरकारी और निजी अस्पतालों में इसकी कोई गारंटी नहीं है. जब मेरी जांच हो रही थी तो तहलका के फोटोग्राफर ने मेरा फोटो खींचा और चल दिये. उन्हें न रोका गया और न ही उनके फोटो खींचने पर एतराज किया गया. इस बारे में पूछने पर होली फैमिली हॉस्पिटल के कार्यवाहक मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ. वाई पांडे का जवाब आता है, “हालांकि तस्वीर ली गई है मगर रिपोर्ट तो गोपनीय रहती ही है.”

अपनी राय दें comment कुल टिप्पणियां: 12

  • प्रेषक : Ajoy Ghsoh
    samaj ko is taraha ke report & reportaro ki jarurat hi - ta ki samaj ek adrsh ban sake
  • प्रेषक : sex
    kya bat hai
  • प्रेषक : swati
    kya bat hai
  • प्रेषक : shamsi rizvi
    bahoot hi lajawab report hai yeh.is report se sarkar k jhoote davo ki pol khulti hai . thax tahalka.
  • प्रेषक : vinod dongre
    good report.