खुला मंच

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चैनलों के शोर में बजती चुप्पी

अपने समाचार चैनलों में कुछ अपवादों को छोड़कर आक्रामकता और शोर बहुत है. इस हद तक कि खबरें चीखती हुई दिखती हैं. एंकर और रिपोर्टर
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ताल्लुक बोझ बन जाए तो..

ऐसा सोचना ठीक नहीं होगा कि संघ और भाजपा द्वारा शिवसेना के शगूफे ‘मुंबई मराठियों के लिए’ की आलोचना सिर्फ अक्तूबर में होनेवाले बिहार विधानसभा ...
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दांव पर विश्वसनीयता

हाई कोर्ट का हालिया फैसला न्यायपालिका की जवाबदेही की पुरजोर वकालत करता है...
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‘अवचेतन मन की निराली कथाएं’

आज ‘हिस्टीरिया’ की कथाएं हो जाएं.कुछ कथाएं बस मजा देती हैं और बताती हैं कि जीवन कितना बहुरंगी है. मानव मन के विचित्र पहलुओं से ...
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मद्धम पड़ती दहाड़

अगर चीन ने बाघ के अंगों की अपनी भूख पर लगाम नहीं लगाई तो यह शानदार जीव जल्द ही इतिहास का हिस्सा बन जाएगाभारत में ...
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यह बिग बॉस कौन है?

किसी कला या मनोरंजन में हम क्या खोजते हैं, इस बात में कुछ हमारी समझ भी झांकती है...
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मराठी की तलवार हिंदी की ढाल

हिंदी और मराठी दोनों चोट खाई अस्मिताएं हैं जो यह पा रही हैं कि न उन्हें सम्मान हासिल हो रहा है और न रोजी-रोटी...
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अराजकता की सेना

शिवसेना के पास घातक हथियार तो हैं मगर कोई राजनीति या विचारधारा नहीं...
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मुंबई समाचार है और समाचार मुंबई है

कहते हैं कि इतिहास अपने को दोहराता है. लेकिन जहां पहली बार वह एक त्नासदी होता है वहीं दूसरी बार वह एक प्रहसन या मजाक ...
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हृदय परिवर्तन से आगे की राह

कई समाचार चैनलों के संपादकों का ‘अपराधबोध’ जगा है और कुछ तो स्थिति से ‘बगावत’ की बात भी कर रहे हैं. मगर क्या इससे कोई उम्मीद की जा सकती है?...
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