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ऑक्टोपसी चंगुल में चैनल

image आनंद प्रधान

खबरिया चैनल आदमी के अंदर बैठे ‘अनजान के भय’ का दोहन करते हैं. ऑक्टोपस पॉल इसी दोहन के मकसद से भविष्यवक्ता बना दिया गया

स्पेन ने फुटबॉल विश्वकप भले ही कलात्मक और बेहतर खेल के कारण जीता हो लेकिन अपने खबरिया चैनल इसका श्रेय उसे देने के लिए तैयार नहीं हैं. चैनलों की मानें तो स्पेन की जीत का असली क्रेडिट पॉल नाम के एक ऑक्टोपस को जाता है जिसने मैच से पहले ही उसकी ‘भविष्यवाणी’ कर दी थी. चैनलों के मुताबिक इस बार फुटबॉल विश्वकप का असली हीरो ऑक्टोपस पॉल है जिसने कई प्रमुख मैचों के बारे में बिलकुल सटीक ‘भविष्यवाणियां’ की. खासकर जर्मनी के मैचों और सेमीफाइनल और फ़ाइनल मैच के नतीजों को लेकर की गई उसकी सभी सात ‘भविष्यवाणियां’ सही निकलीं.

ऑक्टोपस पॉल टीवी की पैदाइश है, यह समझने के लिए आपको रॉकेट विज्ञानी होने की जरूरत नहीं

बस, अपने खबरिया चैनलों को और क्या चाहिए था? तेज तारों, तीन देवियों, ग्रहों-ग्रहणों, नक्षत्रों, ज्योतिषियों और बाबाओं से अटे पड़े चैनलों पर ‘बाबा’ ऑक्टोपस पॉल को छाते देर नहीं लगी. उसके अहर्निश महिमागान में कोई चैनल पीछे नहीं रहा. आश्चर्य नहीं कि नियमित और प्राइम टाइम बुलेटिनों से लेकर आधा घंटे के विशेष कार्यक्रमों में जितना समय फुटबॉल विश्वकप के मैचों  की रिपोर्टों को मिला, उससे कम एयरटाइम ऑक्टोपस पॉल के करिश्माई खेल को नहीं मिला. कुछ इस हद तक कि मैच सिर्फ औपचारिकता मात्र रह गए जो पॉल की भविष्यवाणी को सही साबित करने के लिए हो रहे हों.               

जाहिर है कि ऐसा करते हुए खबरिया चैनलों ने सामान्य बुद्धि, तर्क और विवेक को ताक पर रख दिया. हालांकि इसमें कोई नई बात नहीं है लेकिन चैनल ऑक्टोपस पॉल के चंगुल में जिस तरह से फंसे उससे साफ है कि तर्क और बुद्धि से उनकी दुश्मनी अब काफी पुरानी और गहरी हो चुकी है. अफसोस की बात यह है कि चैनलों के इस अतार्किक और बुद्धिविरोधी रवैए का असर फुटबॉल विश्वकप के मैचों की रिपोर्टिंग पर भी पड़े बिना नहीं रह पाया. अधिकांश हिंदी खबरिया चैनलों की फुटबॉल विश्वकप में वैसी दिलचस्पी नहीं थी, जैसी क्रिकेट के ऐरे-गैरे चैंपियनशिप को लेकर दिखती है. रही-सही कसर ऑक्टोपस पॉल ने निकाल दी. चैनलों ने काफी हद तक कमजोर रिपोर्टिंग की भरपाई ऑक्टोपस पॉल के चमत्कारों को दिखाकर पूरी करने की कोशिश की.

नतीजा, एक ऐसा तमाशा जिसने फुटबॉल जैसे शानदार खेल के विश्वकप को काफी हद तक मजाक में बदल दिया. वैसे, टीवी ने फुटबॉल ही नहीं, लगभग सभी खेलों को पहले ही तमाशे में बदल दिया है जहां खेल अब सिर्फ खेल नहीं रह गए हैं. वे टीवी के लिए खेले जाते हैं. आश्चर्य नहीं कि उनमें खेलों की सामूहिकता, सहभागिता और  मैत्रीपूर्ण प्रतिस्पर्धा की भावना की बजाय तमाशे, तड़क-भड़क और उन्माद का बोलबाला बढ़ गया है. यह टीवी के स्वभाव के अनुकूल है क्योंकि उसकी दिलचस्पी खेल से ज्यादा खेल के तमाशे और उसकी नाटकीयता में है. ऐसे में, अंधविश्वास और टोने-टोटके कहां पीछे रहने वाले थे.

असल में, ऑक्टोपस पॉल टीवी की रचना या पैदाइश है. यह समझने के लिए आपको रॉकेट विज्ञानी होने की जरूरत नहीं है. हैरानी की बात नहीं है कि सिर्फ भारत ही नहीं, यूरोप और दुनिया के अधिकांश देशों में मीडिया में ऑक्टोपस पॉल छाया रहा. टीवी चैनलों को ऑक्टोपस पॉल इसलिए चाहिए कि वह अपनी नाटकीयता से अधिक से अधिक दर्शक खींचता है. चैनल को दर्शक चाहिए. इसलिए कि चैनलों की टीआरपी दर्शकों की संख्या पर निर्भर करती है. टीआरपी से विज्ञापन आता है और विज्ञापन से मुनाफा होता है. चैनलों को मुनाफा चाहिए और मुनाफे के लिए जरूरी है कि दर्शकों को ऑक्टोपसी चंगुल में फंसाए रहा जाए, चाहे वह अंधविश्वासों का ही क्यों न हो.

सवाल है कि दर्शक इन्हें क्यों देखते हैं? इसके मुख्यतः दो कारण हैं. पहला यह कि इनमें एक खास तरह का अनोखापन या अजीबोगरीबपन है. आम तौर पर  अजीबोगरीब चीजें ध्यान खींचती हैं. इसीलिए चैनलों पर अजीबोगरीब चीजें खूब दिखाई जाती हैं. कुछ खबरिया चैनल तो इसी विधा के विशेषज्ञ हो गए हैं. ऑक्टोपस अपने आप में काफी अजीबोगरीब जीव है, ऊपर से अगर उसे भविष्यवक्ता बना दिया जाए तो उत्सुकता स्वाभाविक है. दूसरा कारण ज्यादा महत्वपूर्ण और गहरा है. ऑक्टोपस पॉल एक आदमी के अंदर बैठे अनजान के भय, आशंकाओं और चिंताओं को भुनाने के लिए पैदा होता है, उसी पर पलता और फलता-फूलता है. ज्योतिष और भविष्यवाणियों का जन्म भी इसी ‘अनजान के भय’ से हुआ है. ज्योतिष और उसकी भविष्यवाणियां लोगों को कुछ हद तक इसी ‘अनजान के भय’ से राहत देने का आभास पैदा करती हैं.

खबरिया चैनल हर आदमी के अंदर बैठे इसी ‘अनजान के भय’ का दोहन करते हैं. ऑक्टोपस पॉल भी इसी दोहन के मकसद से भविष्यवक्ता बना दिया गया. हैरानी नहीं होगी, अगर जल्दी ही अपने खबरिया चैनल कोई देशी तोता, बिल्ली, बंदर, गाय या हाथी खोज लाएं. 

Comments (8 posted):

GAURAV AARYA on 19/07/10 02:27:22
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sir, aaj ke media ka dhyan add btorne par jyada rahta hai,kya dikhaya ja rha hai isse uska kuch lena-dena nahi hai, bus kisi bhi tarah trp bdhakar add khincho abhiyan chalta hai
vineet kumar on 19/07/10 03:14:41
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मेरी अपनी समझ है कि ये ऐसा मौका है जबकि औसत ऑडिएंस भी इसके जरिए ग्लोबल मीडिया के चरित्र का विश्लेषण कर सकती है। इस मौके पर हिन्दी चैनलों से कहीं ज्यादा ग्लोबल मीडिया के विश्लेषण की गुंजाइश बनती है और एक नए किस्म की धारणा बनती है कि टेलीविजन का संबंध पढ़े-लिखे और अधिक समझदार होने से नहीं और ऐसा भी नहीं है इसे सिर्फ अंधविश्वास में जकड़े लोग देखते हैं। मैं इस पर एख पूरी पोस्ट लिखी है-http://taanabaana.blogspot.com/2010/07/blog-post_10.html
Abhash Pathak on 20/07/10 05:15:02
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I agree, the show of octopus Paul on almost all the news channels is quite strange. It should be, in my view on all the entertainment channels.
Now what the news channels should focus about Octopus Paul, which they won't is about his retirement.
We should learn lesson by the news that Paul will not fore tell any more (and he is at the peak of his carrer in the field of forecasting).
Will the channels discuss on this matter that one should retire (politicians) at the peak of their life?
Of course the fear of future is not new and that is why all the channels try to encash it by showing so many forecasting programmes.
pravin on 20/07/10 04:55:54
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i agree with you but news channels not realize this things.
athar imam on 21/07/10 08:24:23
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सर, हमारे यहां के खबरिया चैनल तो पहले से ही काफी बदनाम हैं. जिसकी आलोचना भी समय-समय पर होती रहती है. लेकिन इस ऑक्टोपस पॉल ने स्वयं को आधुनिक बताला कर भारत जैसे देशों पर अंधविश्वासी होने का आरोप लगाने वाले यूरोप की पोल जरूर खोल दी है. हद तो तब हो गई जब कुछ लोग ऑक्टोपस पॉल की जान को खतारा होने की बातें करने लगे. वैसे यह पूरा घटनाक्रम काफी हास्यास्पद था.
geet on 21/07/10 12:27:09
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Dear Sir,

Maan lete hain ki ye sirf aaktopus (pol) tv ki paidaish hain to main aapse ek baat puchhti hoon ki spain ki jeet ka pehle hi kyun pata chala iska matlab hain ki spain ki jeet pehle hi decide ho chuki thi,kher main media ke favor main nhi hoon,lekin hum kuch kudrat ke karishmo ko nhi nkaar sakte,shayad such main us jeev ko upperwale ne ye shifa di hain ki uske kadam jis per pade wo fateh uski ho,ya phir kuch future ke baare main usse puche jaye to us topic ki answering power use god wave ke jariye milti hain,germani ke log us jeev ko dushman samjh rhe hain jabki wo to future bata raha hain, naa ki future main hone wali thinks apne kadmo se change kar raha hain........wo future bata sakta hain ,lekin badal nhi raha hain,kyunki wo ke jariya bankar kaam kar sakta hain lekin god ka nhi kash ye germani ke log samjh sakte aur use apna dushman na mante,isliye god se save rakhe.....aur germany ko awair kare ki pol is not wrong>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>
Dr. Shubhra Sharma on 21/07/10 02:01:37
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I agree that most of the hype was unwarranted and useless but it did bring in some reluctant viewers. Most of the avid football fans were already glued to their tv screens; Octopus Paul wooed the fence-sitters and tired house-fraus. He generated more interest amid the disinterested than all the players put together,and therefore should be lauded as a benefactor of football.
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टीवी चैनल वालो को आनंद जी के बात पर ध्यान देना चाहिए... कब तक वे आम लोगो के डर को भुनाते रहेंगे...अब बहुत हो गया... अब तो इस तरह के नौटंकी को बंद करे और 21वीं सदी के भारत के उज्ज्वल भविष्य के मार्ग में रोड़ा न पैदा करें... सच बोलने में इनको डर क्यों लगता है...
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