मुंबई समाचार है और समाचार मुंबई है
कहते हैं कि इतिहास अपने को दोहराता है. लेकिन जहां पहली बार वह एक त्नासदी होता है वहीं दूसरी बार वह एक प्रहसन या मजाक बन जाता है. मुंबई में इतिहास कुछ ज्यादा ही जल्दी-जल्दी खुद को दोहरा रहा है. इस चक्कर में वह न सिर्फ मजाक बल्कि भोंडा मजाक बन गया है.
मुंबई की यह मिली-जुली कुश्ती चैनलों के समाचार एजेंडे को पूरी तरह से हाइजैक करती लगती है. कई बार यह सब इतना नियोजित लगता है कि आशंका होती है कि कहीं यह सब किसी बड़े खेल का हिस्सा तो नहीं?
पिछले कुछ हफ्ते से कभी अशोक चह्वाण के टैक्सी चालकों के लिए मराठी की अनिवार्यता के बेतुके फरमान, कभी ठाकरे बनाम राहुल गांधी और कभी शिव सेना बनाम शाहरुख़ खान विवाद के बहाने मुंबई का यह इतिहास भोंडे मजाक के रूप में समाचार चैनलों पर छाया हुआ है. किसी भी मजाक की एक सीमा होती है. लेकिन लगता नहीं कि मुंबई में चल रहे इस भोंडे मजाक की कोई सीमा है. हालांकि धीरे-धीरे अब यह मजाक लोगों के धैर्य की परीक्षा लेने लगा है. पर हैरानी की बात यह है कि इसमें चैनलों की अतिरिक्त दिलचस्पी न सिर्फ बनी हुई है बल्कि अपने तईं वे इस भोंडे मजाक को जारी रखने के लिए आग में घी डालने से भी परहेज नहीं कर रहे हैं.
मुंबई में यह सब पहली बार नहीं हो रहा. शिव सेना के उदय के बाद से मुंबई का इतिहास इस त्नासदी और बाद में मजाक का गवाह रहा है. लेकिन पिछले डेढ़-दो साल में मुंबई के साथ हो रहे इस मजाक की खास बात यह है कि यह मुंबई की सड़कों से ज्यादा समाचार चैनलों के परदे और स्टूडियो में खेला जा रहा है. कई बार तो ऐसा लगता है कि जैसे इस पूरे प्रहसन को चैनलों के लिए ही बनाया गया है. आश्चर्य नहीं कि इस प्रहसन के अधिकांश पात्न काफी हद तक मीडिया और उसमें भी चैनलों की निर्मिति (क्रियेशन) हैं. मीडिया खासकर चैनल भले स्वीकार न करें लेकिन क्या यह आरोप सही नहीं कि राज और उद्धव ठाकरे जैसे नेता जो वास्तव में ‘पेपर या चैनल टाइगर’ या इस प्रहसन के जोकर से अधिक नहीं हैं, उनकी इन चैनलों ने लार्जर दैन लाइफ छवि गढ़ने के साथ-साथ उन्हें मुंबई और मुम्बईकरों का प्रतिनिधि बना दिया है?
यह ठीक है कि समाचार चैनलों की कामेडी या भोंडे मजाक में कुछ ज्यादा ही दिलचस्पी है. अधिकांश चैनलों के लिए कॉमेडी शो अनिवार्य कार्यक्रम हो गए हैं. लेकिन मुंबई में सामुदायिक घृणा, नफरत और हिंसा की जो राजनीति हो रही है वह अब सिर्फ मजाक नहीं बल्कि एक खतरनाक खेल में बदलती जा रही है. यह भी किसी से छुपा नहीं कि इस विभाजक राजनीति के खिलाड़ी एक तरह की मिली-जुली कुश्ती खेल रहे हैं. चाहे कांग्रेस हो या शिव सेना या मनसे या भाजपा या फिर एनसीपी- सभी अपनी-अपनी राजनीति की रोटियां सेंकने में लगे हुए हैं. अफसोस यह है कि जाने-अनजाने अधिकांश चैनल भी मुंबई की इस मिलीजुली कुश्ती में एक सक्रिय खिलाड़ी की तरह शामिल हो गए हैं. कारण, जैसे मुंबई में एक डर, तनाव और बेचैनी का माहौल बनाए रखने में सभी राजनीतिक दलों के हित जुड़े हुए हैं, वैसे ही चैनलों के हित भी मुंबई के साथ जारी खतरनाक मजाक को हवा देने से जुड़ गए हैं. वे अब इस खेल के कमेंटेटर भर नहीं हैं बल्कि खिलाड़ी हो चुके हैं. हालांकि उनसे अपेक्षा अंपायर की भूमिका निभाने की थी.
चैनल किसी राज या उद्धव ठाकरे के बयानों को इतना अधिक और बढ़ा-चढ़ाकर पेश क्यों करते हैं? वे शिव सेना या मनसे के छोटे-मोटे प्रदर्शनों-तोड़फोड़-मारपीट-हंगामे को भी इतना अधिक कवरेज क्यों देते हैं? वे ऐसे मुद्दों को इतना अधिक तूल क्यों देते हैं जिनसे सामाजिक सद्भाव और भाईचारे को नुकसान पहुंचता है? क्या कारण है कि समाचार चैनलों के एजेंडे पर मुंबई के इस भोंडे मजाक के अलावा कोई और खबर नहीं दिखाई देती? मुंबई की यह मिली-जुली कुश्ती चैनलों के समाचार एजेंडे को पूरी तरह से हाइजैक करती लगती है. कई बार यह सब इतना नियोजित लगता है कि आशंका होती है कि कहीं यह सब किसी बड़े खेल का हिस्सा तो नहीं?
बिहार चुनावों से ठीक पहले युवराज का बिहार दौरा होता है जहां उन्हें पहली बार मुंबई में पिटते बिहारियों और उत्तर भारतीयों का ख्याल आता है? और फिर एक पूर्वनियोजित ड्रामे की तरह मुंबई में हंगामा शुरू हो जाता है. इसके बाद खास तौर पर चैनलों के लिए प्रायोजित राहुल गांधी की हिट मुंबई यात्ना होती है. बात यहीं खत्म नहीं होती. इसके साथ-साथ बिलकुल चैनलों के मिजाज के मुताबिक शिव सेना-शाहरु ख़ खान विवाद को परवान चढ़ाया जाता है. आखिर करोड़ों रुपए लगाकर बनी एक फिल्म को इससे अधिक सस्ता प्रचार और कैसे मिल सकता था? यही नहीं, जब चैनल मुंबई में चल रहे इस खेल में पूरी तरह से डूबे और व्यस्त थे तो केंद्र सरकार मस्त थी क्योंकि चैनलों के एजेंडे पर मुंबई-शाहरु ख़ खान-माय नेम इज खान छाए हुए थे और महंगाई से लेकर पाकिस्तान से बातचीत के फैसले तक सरकार को कोई सफाई नहीं देनी पड़ रही थी. साफ है कि चैनलों ही नहीं सरकार के लिए भी इससे बेहतर स्थिति और कुछ नहीं हो सकती कि मुंबई समाचारों में रहे और समाचार मुंबई तक सीमित रहें.
आनंद प्रधान




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