हृदय परिवर्तन से आगे की राह
कई समाचार चैनलों के संपादकों का ‘अपराधबोध’ जगा है और कुछ तो स्थिति से ‘बगावत’ की बात भी कर रहे हैं. मगर क्या इससे कोई उम्मीद की जा सकती है?
हिंदी के खबरिया चैनलों के दर्शकों के लिए अच्छी खबर है. इन चैनलों के संपादक कंटेंट के लगातार गिरते स्तर से परेशान और शर्मसार हैं. उन्हें महसूस हो रहा है कि टीआरपी की होड़ में वे और उनके चैनल पत्रकारिता के मूल्यों की धज्जियां उड़ा रहे हैं. आईबीएन के संपादक आशुतोष ने माना है कि पिछले पांच साल में न्यूज चैनलों में भयानक भटकाव दिखा है. वे अकेले नहीं हैं. ईटीवी के राजनीतिक संपादक और टीवी संपादकों के संगठन के महासचिव एनके सिंह, न्यूज 24 के संपादक अजीत अंजुम और एनडीटीवी के आउटपुट संपादक रवीश कुमार समेत और भी तमाम वरिष्ठ पत्रकारों ने समाचार चैनलों की गिरावट पर गहरी चिंता का इजहार और उससे बाहर निकलने की बेचैनी जाहिर की है.
यानी लंबे समय से चल रही बहस में देर से ही सही अब संपादक भी शामिल होने लगे हैं. कई संपादकों का ‘अपराधबोध’ जगा है और कुछ तो स्थिति से ‘बगावत’ की बात भी कर रहे हैं. इससे एक उम्मीद बनी है क्योंकि अब तक अधिकांश संपादक चैनलों के कंटेंट में लगातार गिरावट की बात मानने को तैयार ही नहीं होते थे. बल्कि वे तो खुद को आक्रामक तरीके से डिफेंड भी करते थे. लेकिन लगता है कि उन्हें भी अब समझ में आने लगा है कि गिरने की भी हद होती है. उम्मीद है कि चैनलों के बाहर चल रही आलोचना और बहस अब अंदर न्यूज रूम में भी असर दिखाएगी. जाहिर है कि ईमानदार आत्मालोचना इसकी शुरुआत हो सकती है. इसलिए इस हृदय परिवर्तन का खुले दिल से स्वागत होना चाहिए. उन संपादकों को बधाई दी जानी चाहिए जो हिम्मत के साथ बोल और आत्मालोचना कर रहे हैं.
लेकिन क्या यह आत्मालोचना सचमुच आत्मसुधार के मकसद से हो रही है या सिर्फ इस ‘पागलपन और गिरावट’ से खुद को अलग दिखाने और अपना हाथ झड़ने के लिए? सच कहूं तो समाचार चैनलों में बेहतरी की उम्मीद को लेकर मन में थोड़ी निराशा और संदेह है. इसकी वजहें हैं. पहली और बुनियादी बात यह है कि सभी चैनल उस बड़े पूंजीवादी कॉर्पोरेट मीडिया मशीन के पुर्जे हैं जिनका मूल मकसद अधिकतम मुनाफा कमाना और मौजूदा सत्ता संरचना को एक आवरण देना है. पूंजीवादी लोकतंत्र के खेल में वे उस तमाशे की तरह हैं जिसकी सीमाएं पहले से तय हैं और जिसका एक मकसद लोगों को मनोरंजन का धीमा जहर देकर सुलाए रखना है. ग्लोबल मीडिया के विस्तार के साथ समाचारों का मनोरंजनीकरण हो रहा है और मनोरंजन का समाचारीकरण.
ऐसे में, न्यूज चैनलों के संपादकों के लिए मौजूदा दायरे यानी टीआरपी से बाहर कुछ अलग करने की गुंजाइश सचमुच बहुत कम होती जा रही है. टीआरपी से व्यक्तिगत तौर पर लड़ पाना किसी भी संपादक के लिए संभव नहीं, इसलिए टी.वी उद्योग के मौजूदा दायरे में टीआरपी से ‘बगावत’ लगभग असंभव है. एडिटर्स गिल्ड के अध्यक्ष और वरिष्ठ टीवी संपादक राजदीप सरदेसाई के बयान में यह लाचारी साफ दिखती है. लेकिन सारा दोष टीआरपी पर मढ़ना भी ठीक नहीं. निश्चय ही, कुछ जिम्मेदारी संपादकों की भी बनती है. अफसोस यह है कि बहुतेरे संपादक अपनी गलतियों का सारा ठीकरा टीआरपी पर फोड़ बच निकलना चाहते हैं. जबकि सच यह है कि संपादकों को टीआरपी के आगे झुकने के लिए कहा गया लेकिन उनमें से अधिकांश ने उसके आगे रेंगना शुरू कर दिया.
दरअसल, न्यूज चैनलों की गिरावट को लेकर टीआरपी के शिकायती संपादकों में से कई खुद दर्शकों के स्वाद को बिगाड़ने के लिए दोषी हैं. जो दर्शक पिछले पांच साल से सनसनीखेज, बेसिर-पैर और पांच सीज (क्राइम, कामेडी, क्रिकेट, सिनेमा, सेलेब्रिटी) के आदी हो गए हैं उन्हें रातों-रात कैसे गंभीर खबरों का पारखी बनाया जा सकता है? दर्शकों का स्वाद बदलने के लिए ईमानदारी से अगले पांच साल तक मेहनत करनी होगी. न्यूज रूम में पत्रकारीय मूल्यों को प्राथमिकता देनी होगी. हर न्यूज चैनल टैबलॉयड चैनल क्यों होना चाहता है? टीआरपी के लिए? यह तो हमेशा से रहा है कि टैबलॉयड अखबारों और चैनलों के पाठक-दर्शक क्वालिटी अखबारों-चैनलों से कई गुना रहे हैं लेकिन जनमत बनाने और प्रभाव के मामले में टैबलॉयड, क्वालिटी अखबारों-चैनलों के आगे कहीं नहीं ठहरते.
तीसरे, चैनल संपादकों को कंटेंट खासकर टीआरपी नहीं दे पाने वाली कथित गंभीर खबरों और चर्चाओं पर गंभीरता से सोचना होगा कि सचमुच में वे कितनी गंभीर होती हैं? दो साल पहले ऐसी ही समस्या से परेशान छह अमेरिकी पत्नकारों द्वारा लिखी किताब ‘वी इंटरप्ट दिस न्यूजकास्ट’ आई थी जिसमें बताया गया है कि कैसे बेहतर कंटेंट के साथ अच्छी रेटिंग भी मिल सकती है. बेचैन संपादकों के लिए यह बेहद काम की हो सकती है. मगर वे तो अपने ही बनाए दायरे में ऐसे फंसे हैं कि उससे निकलना ‘स्वर्ग की सीढ़ी’ ढूंढ़ने से भी मुश्किल हो गया है.
आनंद प्रधान





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आपने मुझे भी इस जमात में शामिल कर लिया है तो अपनी बात फिर से कहना चाहता हूं। मैंने कभी भी एक हद से ज्यादा टीआरपी के मत्थे कुछ नहीं मढ़ा। उसकी आलोचना की है लेकिन मेरे किसी भी लेख में आप देखेंगे कि मैं योग्यता के संकट पर लिखता बोलता हूं। हिन्दी पत्रकारिता में आज जो भी हो रहा है वही हो रहा है जो आज तय करने वाले लोग सोच सकते हैं या कर सकतें हैं। टीआरपी सिर्फ एक बहाना है। ज्यादातर रिपोर्टर,एंकर,आउटपुट बात करने में तो बड़े संवेदनशील लगते हैं लेकिन उनमें इस बात की घोर कमी है कि वो टेलीविजन माध्यम के हिसाब से चीजों को असरदार और देखने लायक बनाये। प्रयोग कर सकें। आनंद,ये योग्यता का संकट है। टीआरपी का संकट नहीं है। व्यक्तिगत बात विचार में समझदार होना और टीवी के लिहाज़ से उम्दा होना दोनों में फर्क है। और मैंने ये कमी ज़्यादातर उन लोगों में देखी है जो खुद को अच्छा समझते हैं और पत्रकारिता के मूल्यों की बात करते हैं लेकिन उसके आगे उनके प्रदर्शन में कोई दम नहीं होता। उनकी किसी भी रिपोर्ट या एंकरिंग को उठा कर देखिये तो आपको बात समझ में आ जाएगी। योग्यता के इस संकट के शिकार हम भी हैं। मैं भी कई बार कहानी को वैसे नहीं कह पाता जैसे कहनी चाहिए। हम अपनी इस कमी से जूझने की कोशिश नहीं करते। हमने हिन्दी टीवी पत्रकारिता में काम के स्तर का कोई मानक ही नहीं बनाया। न पहले कभी था न आज है। हम सिर्फ इस बात से खुश होते रहे कि कौन संवेदनशील होने के नाते कितने अच्छे शब्दों और वाक्य विन्यासों का प्रयोग करता है। सब इसी दिशा में होड़ करते नज़र आएंगे लेकिन टीवी के व्याकरण के लिहाज़ से नब्बे फीसदी फेल हुए हैं। रिपोर्टर की पीटीसी देखिये,एंकर की ज़ुबान देखिये,सवाल देखिये और लिखने वाले की भाषा देखिये। यह एक पेशेवर का व्यक्तिगत संकट है। इसी कारण सब टीआरपी की ओट लेते हैं। हिन्दी पत्रकारिता आज प्रभावहीन लगती है। किसी हिन्दी अखबार में छपी बड़ी से बड़ी खबर का असर नहीं होता है। न हुक्मरानों में न आवाम में। टीवी का तो छोड़ ही दीजिए।
मैं कई पत्रकारों से बात करता रहता हूं जो टीवी में काम करते हैं। वो बातचीत के स्तर पर तो काफी बढ़िया लगे लेकिन जब कैमरा पकड़ाया गया तो उनका काम औसत निकला। ये क्यों हो रहा है। बंदा अच्छा है समझदार है लेकिन एक माध्यम के लिए लायक नहीं हो पा रहा। आप ट्रेनिंग की कमी कह सकते हैं लेकिन यह भी बहाना है। किसी के पास आइडिया नहीं होता कि कैमरे से क्या कर सकते हैं। आप इस संकट पर बात कीजिए। मैंने हाल ही में लिखा है कि जो लोग खुद को अच्छा समझते हैं उनके काम का सख्त मूल्यांकन होना चाहिए। वो भी औसत निकलेगा।
एक संकट और है। हिन्दी टेलीविजन में कई जुझारू पत्रकार हैं। जो खबर को कहीं से भी नोच कर ले आते हैं। सभी चैनलों में हैं। लेकिन इन मेहनतकश पत्रकारों के साथ भी एक कमी रह गई है। वो अपनी खबर को कथा में नहीं बदल पाये। जब तस्वीरें आएंगी तो आप कथा बनने से नहीं रोक सकते। वर्ना फिर आप कहेंगे कि दूरदर्शन जैसी सपाट खबरे ही स्टैंडर्ड हैं। दूरदर्शन अपने आप में बेहद अच्छा है लेकिन उससे आगे क्या।
हिन्दी पत्रकारिता का संकट व्यवस्था का है और उससे भी बड़ा यह व्यक्तिगत है जो तमाम चैनलों में और तमाम स्तरों पर घटित हो रहा है।
क्या यह सामाजिक संकट है? सामंती परिवेश से आने के कारण वो टेक्नॉलजी से दोस्ताना व्यावहार नहीं करता? जवाब मेरे पास नहीं है लेकिन तीन तीन साल से रिपोर्टिंग कर रहे रिपोर्टर को जब कैमरे के सामने जकड़ा हुआ देखता हूं तो लगता है कि शायद मेरे सवालों का जवाब इन्हीं संदर्भों में भटक रहा है।
लोग मुझ पर यह कह कर हमला न कर दें कि इनको घमंड हो गया है और ये योग्यता पर सवाल उठा रहे हैं तो मेरे इन सवालों पर विचार किया जाना चाहिए। ऐसा क्यों होता है कि डेस्क पर बैठा बंदा कंप्यूटर में दिये गए कमांड के इस्तमाल से झिझकता है। वो हमेशा दूसरों को अढ़ाता रहता है। ऐसा क्यों होता है कि किसी भी संस्थान में दो तीन लोग ही होते हैं जो कंप्यूटर या कैमरे की तकनीकी भाषा को समझते हैं, उनसे खेलते हैं। ऐसा क्यों होता है कि हिन्दी का पत्रकार कैमरे के लिहाज़ से कपड़े,स्वेटर कोट पहन कर नहीं आता। मैं पत्रकार को डिजाइनर बनाने की बात नहीं करता। सफेद कमीज़ कैमरे पर नहीं चलती है तो नहीं चलती है। चेक नहीं चलता है तो नहीं चलता। फिर भी लोग चेक पहन कर आते हैं।
क्यों? कहीं ऐसा तो नहीं कि इस माध्यम में हम अखबारी पत्रकारिता के मानकों को आज भी लागू कर रहे हैं। जवाब मुझे पता नहीं। लेकिन मुझे लगता है कि टेलीविजन को टेलीविजन की तरह न देख पाने,समझ पाने की कमी के कारण भी यह संकट फैला है। एक मिनट के लिए आप टीआरपी हटा दें तो उसके बाद क्या? क्या ऐसा प्रोग्राम बन जाएगा जिससे लोग देखने लगेंगे? आप सिर्फ किसी प्रोग्राम को इसलिए अच्छा नहीं कह सकते कि उसे बनाने वाला पीएचडी है,अच्छी सोच रखता है और भला है।
एक संकट और है। हिन्दी टीवी पत्रकारिता पुरुष प्रधान हो गई है। इस पर लड़कियां ही लिखें तो बेहतर होगा। मैं अपने ब्लॉग कस्बा पर लिख चुका हूं। naisadak.blogspot.com पर। एक और संकट है। आनंद प्रधान होने का संकट। आनंद प्रधान से मतलब आपके नाम से नहीं है। आनंद से मतलब है लोग टीवी को मन से नहीं करते। उसका लुत्फ नहीं उठाते। यकीन न हो तो आप कैमरा मैन को देखिये वो कैसे कैमरा पकड़े है, आप रिपोर्टर को देखिये वो कैसे ट्राइपॉड उठाये हुए है। आप देखिये कि कितने रिपोर्टर डायरी लेकर आते हैं। नोट करते हैं। करने वाले हैं। सवाल ये है कि मेहनती रिपोर्टर कम क्यों है? क्या उन्हें मेहनती बनाने का ठेका संस्थान का ही है तो वो किस लिए आए हैं पत्रकारिता करने? खुद को बेहतर करना उनकी भी तो ज़िम्मेदारी है। गौर कीजिए, हिन्दी टीवी को फेल कराने वाले वो हैं जो खुद को अच्छा समझते हैं। उन्होंने कभी मेहनत नहीं की प्रयोग के ज़रिये देखने के अनुभव को रोचक बनाने की।
अब आगे की बात करते हैं। यह सही है कि टेलीविज़न में बहुत से लोग ख़ुद को उम्दा पत्रकार मानते हैं, और ऐसे पत्रकार हैं भी। लेकिन उनका आउटपुट उनकी क़ाबिलियत से मैच नहीं करता। इस बात को तुरंत स्वीकार करके इसकी वजहों पर ग़ौर किया जाना ज़रूरी है।
मेरे विचार से इसकी पहली और सबसे बड़ी वजह तो उस पत्रकार का ये मुग़ालता है कि वो तो बहुत क़ाबिल है, लेकिन कुछ कर नहीं सकता। सिस्टम, सीनियरों की तानाशाही, टीआरपी की होड़, नौकरी जाने का डर और दफ़्तर की राजनीति की वजह से काम नहीं कर पा रहा।
अब इन वजहों पर चर्चा कर ली जाए। मान भी लें कि इनमें से कुछ तो सरासर बहाने हैं, लेकिन इन्हें पूरी तरह अनदेखा नहीं किया जा सकता। हिंदी चैनल, जिनके बारे में बहस हो रही है, में ये हालात पत्रकारों की कार्यक्षमता पर असर तो डालते ही हैं।
हम अंग्रेज़ी और हिंदी चैनलों के आउटपुट की तुलना करके एक झटके में अंग्रेज़ी पत्रकारों को श्रेष्ठता का तमगा पहना देते हैं। लेकिन हम इन दो तरह के पत्रकारों के काम करने के माहौल, उनको मिलने वाले वेतन-सुविधाओं जैसे महत्वपूर्ण कारकों को ध्यान में नहीं रखते।
कई हिंदी और अंग्रेज़ी चैनलों के मालिक एक हैं। एक ही बिल्डिंग में दोनों चैनल चल रहे हैं। लेकिन काम करने के तौर-तरीक़े में काफी फर्क़ है। कुछ हद तक तो ये फर्क़ लाज़मी है, लेकिन दुर्भाग्य से हिंदी चैनलों के संपादकों और बाक़ी सीनियरों की सोच उतनी बड़ी औऱ उदार नहीं हो पाई है।
हिंदी चैनलों की ही बात करें, तो हिंदी टीवी पत्रकारों में छोटे से लेकर बड़े मीडिया समूहों में काम करने वाले पत्रकार शामिल हैं। और हर चैनल एनडीटीवी नहीं है। कुछ शीर्ष चैनलों को छोड़ दें, तो बाक़ी चैनलों में तो ज़्यादातर पत्रकारों को काम से ज़्यादा अपनी नौकरी बचाने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है।
ऐसे कई उदाहरण हैं जहां हिंदी पत्रकारों को उनकी क़ाबिलियत के हिसाब से काम नहीं मिलता, वक़्त पर तनख़्वाह नहीं मिलती, स्ट्रिंगरों के साल-साल भर के बिल पेंडिंग पड़े हैं। बात-बात पर नौकरी का संकट पैदा हो जाता है। रोज़ाना 16-16 घंटे काम करते हैं। वीक ऑफ नहीं मिलते, छुट्टियां तो भूल ही जाइए।
ऐसे में इन पत्रकारों से हम किस तरह के आउटपुट की उम्मीद करें? पीटीसी में उसकी ज़ुबान लड़खड़ा जाए तो ज़िम्मेदार कौन है? सिर्फ वही या फिर वो समूह भी जिसने उसे सिर्फ इसलिए भर्ती कर लिया कि वो कम पैसे में काम करने को तैयार हो गया था?
मेरा मक़सद अपनी (टेलीविज़न पत्रकारों की) कमियों को ढकने का कतई नहीं है। हर पत्रकार को अपने काम में लगातार सुधार की कोशिश करनी चाहिए। लेकिन कहते हैं न At the end of the day….we are just employees.
विनोद अग्रहरि
रवीश ने दुखती रग छेड़ दी है। पत्रकार अखबार का हो या टीवी का, सबसे बड़ी कसौटी है उसकी निजी काबलियत और समझ। अकसर रिपोर्टिंग या एंकरिंग देख सुनकर कहने को मन करता है, भइए ज़रा होम वर्क तो कर लेते। सर्वज्ञानी होने का दंभ कैमरे या कलम से छिपता नहीं। गंगा गंगोत्री से गंगा सागर तक बहती है, खुद को बड़ा दिखाने के लिए हमेशा नीचे की रेखा छोटी रखने की मानसिकता से वरिष्ठों को उबरना होगा। हिंदी के संदर्भ में कमी राजेन्द्र माथुर और प्रभाष जोशी या शायद एस पी सरीखे द्रोणाचार्यों की है जिनकी प्रतिमा भी अर्जुन से श्रेष्ठ धनुर्धर तैयार कर देती थी।
डर हमारे जेहन में सबसे मजबूत याददाश्त रखने में कामयाब होता है और यही कारण है कि जो न्यूज चैनल ज्यादा डरा पाते हैं,वे भी टीआरपी के मामले में अच्छा कमा लेते हैं। एक सिद्धांत है कि आवश्यकताएं सीखी और सिखाई जाती हैं। डर सभी जीवों की स्वाभाविक प्रवृत्ति है,जिसे पढ़े लिखे लोगों ने आवश्यकता में बदल दिया है। जैसे ज्यादा शोर-शराबे वाले बाजार से छुट्टी के दिन गुजरते हुए माहौल मातमी सा लगता है और कुछ कमी कहकर बेचैन करता है।ऐसा जगहों पर शोर एक आवश्यकता के तौर अपनी जगह बना चुका होता है। यही कारण है कि भूतही कहानी की स्टाइल में खबर देने वाले एक चैनल ने जब अपने सुधरने की बात कही तो उसे टीआरपी की मात खानी पड़ी। अब बात दर्शकों के लिहाज से सोचिये। वह अपने डर और सुरक्षा से जुड़ी जितनी भी आवश्यकता थी,वह एक चैनल या कई चैनल से पूरी कर रहा था। लेकिन जब उस चैनल ने अपने को शिफ्ट करना चाहा तो लोगों को लगा कि उसकी आवश्यकताएं अब वहां से पूरी नहीं हो रही है तो वह वहां से शिफ्ट हो गया। यानी चैनल ने ही अपनी स्टाइल से दर्शकों का एक समूह तैयार किया था,जो चीखती हई आवाज के साथ खबर सुनने की आदत डाल चुका है,यानी चीख के साथ खबर सुनने की आवश्यकता सीख चुका है,इसलिए अचानक वहां पर सीधी सपाट खबर सुनकर उसमें क्वालिटी की गिरावट नजर आती है।
कुल मिलाकर मूल रास्ते पर लौटने का जो साहस आज की पत्रकारिता को चाहिए,वह टीआरपी के जोड़-घटाव में सम्भव नहीं दिखाई दे रही है,बहाने हजार हो सकते हैं,लेकिन किसी एक दर्शक ने किसी चैनल के सम्पादक को चिट्ठी नहीं लिखी होगी कि आप चीखते हुए खबर सुनाये या हर खबर में सस्पेंस और सनसनी पैदा करें। इसलिए जिस मेहनत से चीख को सुनने और टीआरपी देने वाला दर्शक तैयार किया गया है,उससे ज्यादा मेहनत खबर को खबर की तरह दिखाने के लिए करने जरूरत है। चीखने के पूरे क्रम में एक और बात भी है। कितना चीखेंगे ? दो चार दिन चीख असर करेगी,फिर वह सामान्य सी बात हो जायेगी। फिर और ज्यादा चीखने की जरूरत होगी। लेकिन कुछ समय बाद चीख में कुछ भी नया नहीं होगा,बस सामान्य होने की शर्तें बदल जायेंगी। ठीक उसी तरह जैसे किसी पड़ोसी का एक दिन का रोना बहुत परेशान करता है,लेकिन उसके यहां से रोज रोने की आवाज आये तो कुछ दिन बाद सभी को सामान्य घटना लगने लगती है और उसका असर खत्म हो जाता है। यही कारण है कि कुछेक मामलों में प्रतिक्रियात्मक कदम और असर छोड़ दें तो न्यूज चैनल्स नीतिगत मामलों में प्रभाव छोड़ने में नाकाम रहे हैं,यानी चीख बेअसर रही है। इसलिए जो लोग इस बात से सहमत हैं कि टीआरपी के दौड़ में खबरें मर रही हैं,उन्हें इससे बाहर आने के खुद को धैर्य के साथ तैयार करना होगा। यह भी तय है कि यह सुधार हायरार्की में ऊपर से नीचे आयेगा। यह सच है कि सुधारों का कदम निजी हित को दांव पर लगा करके ही सम्भव है,क्योंकि केवल लाभ कमाने के लिए संस्थायें खड़ी की गईं हैं,जिनका समाज के निर्माण और उसका भविष्य तय करने में कोई दिलचस्पी नहीं है।
Mai to bas itna kahana Chahunga ki Aajkal Medea Matra paisa kamane ki Busness na ki hakikat Samane lane ka jaisa ki Aajkal India TV ka hal hai Tarah tarah ki Jhooi Khabare dikhane ka sauk badh gaya hai isliye log Print medea ki khabro ko jyada Sucha Manate hai.Ye kahana Galat nahi hoga ki medea matra Paise wale logo ke liye bani hai aur unhi se Paisa Kamati anyatha Anap Sanap Khabro ke apecha desh ke Burning issue par logo ka dhyan akarsit karta
Ateet Agrahri
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