तहलका हिन्दी: कांग्रेस के विरोध का नया भेष कांग्रेस के विरोध का नया भेष ================================================================================ Sanjay Dubey on 17/12/09 10:39:00 ढह रही भाजपा को देखें तो लगता है कि कांग्रेस के लिए अगला विपक्ष अब राज्यों में अपने हिसाब से अपनी सत्ता चला रहे बड़े क्षेत्रीय नेता ही होंगे कांग्रेस के लिए अगला विपक्ष कौन होगा और कहां से उभरेगा? बीती गर्मियों में संपन्न हुए लोकसभा चुनावों के बाद से ही यह सवाल राजनैतिक समीक्षकों के दिमाग को मथ रहा है. ऐसा इसलिए है क्योंकि एक तरफ भाजपा लगातार अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारती जा रही है और दूसरी तरफ तमाम क्षेत्रीय क्षत्रपों, मसलन उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव, बिहार में लालू प्रसाद यादव, कर्नाटक में देवेगौड़ा और शायद आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू का राजनैतिक सफर अब ढलान पर जा रहा है. संघ और भाजपा की इस नौकरशाही की मदांधता के पीछे उसका यह विश्वास है कि सही मायने में राजनीति करने वाले पार्टी के लोग चाहें भी तो ज्यादा कुछ नहीं कर सकते. इसकी वजह यह है कि भाजपा छोड़कर अपना तंबू तानने की हिम्मत करने वाला कोई भी नेता खास सफल नहीं हो सका है मई, 2009 के आम चुनावों ने जो पहेली गढ़ी है उसका हल शायद दो अपेक्षाकृत छोटे चुनावों में छिपा है. पहला, नवंबर में हुए राजस्थान के नगर निकाय चुनाव और दूसरा झारखंड में हुआ विधानसभा चुनाव जिसके नतीजे 23 दिसंबर को आ जाएंगे. राजस्थान में 46 नगर निगमों में से कांग्रेस ज्यादातर पर आसानी से कब्जा करने में सफल रही. भाजपा को सिर्फ दस जगह जीत हासिल हुई. पांच साल पहले जब भाजपा राज्य की सत्ता में थी उस वक्त उसे 46 में से 32 शहरों में विजय हासिल हुई थी. दशक भर पहले विपक्ष में रहते हुए भी इसे 22 शहरों में जीत मिली थी. नगर निगम चुनावों को देखें तो इनसे उन मुश्किलों की झलक मिल जाती है जिनका पिछले कुछ समय से भाजपा सामना कर रही है. जहां तक कांग्रेस की बात है तो ग्रामीण इलाकों में उसकी पकड़ हमेशा से रही है. जबकि भाजपा का परंपरागत आधार शहरों में रहा है, खासकर 1989 के बाद से. पर आज दो दशक बाद राजस्थान के शहरों ने भाजपा से मुंह मोड़ लिया है जो बताता है कि नुकसान अस्थायी नहीं बल्कि दीर्घकालिक हो सकता है. पार्टी का जयपुर जैसा अभेद्य किला भी इस बार ढह गया. एक और मजबूत गढ़ कोटा में भाजपा के मेयर पद के उम्मीदवार को 50 हजार वोटों के विशाल अंतर से मुंह की खानी पड़ी. इस हार की वजहें काफी कुछ बताती थीं. पार्टी ने सबसे लोकप्रिय नेता वसुंधरा राजे को दरकिनार कर दिया था. उन्हें उम्मीदवारों के चयन से लेकर चुनाव प्रचार तक अलग रखा गया. कमान नौकरशाही अंदाज में काम करने वाले संघ समर्थित लोगों के हाथ में थी जिन्हें केंद्रीय नेतृत्व का समर्थन भी हासिल था. उनका मानना था कि संगठन को किसी स्वतंत्र राजनैतिक व्यक्तित्व की जरूरत नहीं है. उन्हें लगा कि वे अपने दोस्तों और करीबियों को टिकट देंगे और मतदाता आंख मूंदकर उन्हें वोट दे देंगे. इस घातक चूक ने राज्य में भाजपा की मिट्टी पलीद कर दी. वसुंधरा राजे को नेता विपक्ष के पद से हटाने की मुहिम में सारी ऊर्जा झोंक देने वाले पार्टी प्रशासक अब नए नेता का चयन करने के लिए पार्टी विधायक दल की बैठक बुलाने में हिचक रहे हैं. नगर निगम चुनावों में मात खाने के बाद उन्हें डर है कि पार्टी में बगावत न फूट पड़े. पार्टी के 78 विधायकों में से ज्यादातर बेचैन हैं. वसुंधरा को फिर से बहाल करने या फिर उन्हें उपचुनाव में उम्मीदवार बनाए जाने की मांग हो रही है. वसुंधरा के बिना, संगठन मंत्रियों के मायाजाल और जमीन से कटे बाबुओं की निगरानी में चल रही भाजपा डूब रही है. लेकिन इस सबमें झारखंड की बात क्यों आई? जवाब है बाबूलाल मरांडी की वजह से. दरअसल संघ और भाजपा की इस नौकरशाही की मदांधता के पीछे उसका यह विश्वास है कि सही मायने में राजनीति करने वाले पार्टी के लोग चाहें भी तो ज्यादा कुछ नहीं कर सकते. इसकी वजह यह है कि भाजपा छोड़कर अपना तंबू तानने की हिम्मत करने वाला कोई भी नेता खास सफल नहीं हो सका है. शंकरसिंह बघेला कांग्रेस की सरकार में केंद्रीय मंत्री बने, लेकिन अपने ही राज्य गुजरात में उन्हें मुंह की खानी पड़ी. कल्याण सिंह गिड़गिड़ाते हुए वापस आए थे और अब वे एक बार फिर से इसी राह पर हैं. थोड़ा और अतीत में झांकें तो बलराज मधोक का उदाहरण सामने आता है. लेकिन मरांडी इस चलन को बदल सकते हैं. एक समय वे भाजपा के सबसे प्रभावशाली आदिवासी नेता थे. बाद में उन्हें किनारे लगाने की कोशिशें होने लगीं. अशोक रोड में बैठे लोगों को उनके साथी और प्रतिद्वंद्वी अर्जुन मुंडा में ज्यादा संभावनाएं दिखाई देने लगीं और 2006 आते-आते मरांडी को लगभग बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. लेकिन अगर त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति बनी तो इस राज्य में मरांडी किंगमेकर या फिर झारखंड के मुख्यमंत्री के तौर पर उभर सकते हैं. छल और भ्रष्टाचारियों से भरे पड़े इस राज्य के शीर्ष स्तर के नेताओं में मरांडी की छवि आज भी एक ईमानदार नेता की है. इसलिए कोई हैरत नहीं कि मधु कोड़ा और शिबू सोरेन जैसे नेताओं से जुड़ाव के बावजूद कांग्रेस ने मरांडी के साथ तालमेल किया. अगर किस्मत ने साथ दिया तो झारखंड की अगली सरकार के निर्माण में मरांडी की भूमिका निर्णायक हो सकती है. भाजपा से अलग होकर सफलता की इबारत लिखने वाले वे इकलौते नेता साबित हो सकते हैं. यह बात सच है कि वे फिलहाल कांग्रेस के खेमे में हैं लेकिन वे नीतिश कुमार और नवीन पटनायक की तरह ही एक ऐसे मजबूत राज्य स्तरीय नेता के रूप में स्थापित हो सकते हैं जिसे अपने मुख्य सहयोगी की ज्यादा परवाह नहीं होती. लेकिन क्या मरांडी का उदाहरण सिर्फ अपवाद बनकर रह जाएगा या फिर यह एक नया चलन शुरू कर सकता है? जवाब में इस बात को ध्यान में रखना होगा कि 23 दिसंबर को क्या नतीजा देखने को मिलता है. अगर भाजपा पुनर्जीवित होने में नाकाम रहती है तो क्या राज्य में गैर कांग्रेसी विपक्ष के लिए कोई स्थान बचेगा. यानी क्या भाजपा के खत्म होने की सूरत में किसी क्षेत्रीय राजनैतिक ताकत के उदय की कोई संभावना है? भाजपा के अंदरूनी लोग इस सवाल को डर पैदा करने की कोशिश बताकर खारिज कर देते हैं. लेकिन कुछ हद तक यह डर पैदा हो चुका है. गुजरात में नरेंद्र मोदी ने हिंदुत्व के उभार के बाद पैदा हुए आकर्षण को चतुराईपूर्वक स्वच्छ-प्रभावी प्रशासन, आर्थिक महत्वाकांक्षा और गुजराती अस्मिता के साथ जोड़ दिया. कर्नाटक में येदियुरप्पा पहले लिंगायत नेता हैं फिर कन्नाडिगा नेता और अंत में संघ के नेता जातिगत पहचान और कुशलतापूर्वक बनाए गए जातिगत गठजोड़ों ने 2008 में राज्य में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा को विजय दिलाई थी. फिलहाल कर्नाटक भाजपा येदियुरप्पा और रेड्डी भाइयों के आपसी संघर्ष में उलझी हुई है. फिलहाल तो दोनों के बीच एक असहज सा समझौता हो गया है लेकिन अगले एक या दो साल में मध्यावधि चुनाव की संभावना बनी हुई है. सवाल है कि यह चुनाव किस आधार पर लड़ा जाएगा? अगर इसे दो राष्ट्रीय पार्टियों के बीच के संघर्ष के रूप में प्रचारित किया गया तो स्थितियां कांग्रेस के पक्ष में चली जाएंगी. अगर इसे राहुल गांधी और नितिन गडकरी के बीच चुनाव के तौर पर प्रचारित किया गया तो यह राहुल को वाकओवर जैसा होगा. येदियुरप्पा के सामने एक ही रास्ता है कि वे दिल्ली में बैठे दुश्मनों से लोहा लेने वाले एक क्षेत्रीय नेता का चोला धारण कर लें. वे अपनी पार्टी को भाजपा कह सकते हैं, लेकिन यह पहचान सिर्फ प्रतीकात्मक होगी. व्यवहार में वे स्वतंत्र होंगे. सार्थक केंद्रीय नेतृत्व के अभाव में भाजपा के ज्यादा से ज्यादा क्षेत्रीय नेता यही रास्ता अपना सकते हैं. इसके लिए उन्हें भाजपा छोड़ने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी. जिस तरह से संघ भाजपा की कमान अपने हाथ में लेने में जुटा है उसे देखते हुए उनके पास कोई दूसरा कोई रास्ता है भी नहीं.’अशोक मलिक, वरिष्ठ पत्रकार