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मराठी की तलवार हिंदी की ढाल

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हिंदी और मराठी दोनों चोट खाई अस्मिताएं हैं जो यह पा रही हैं कि न उन्हें सम्मान हासिल हो रहा है और न रोजी-रोटी

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना पहले ही बता चुकी थी कि वह किसी को हिंदी में शपथ लेने नहीं देगी. मनसे के इस आक्रामक रवैये का विरोध जरूरी था जो समाजवादी विधायक अबू आजमी ने किया. उन्होंने हिंदी में शपथ लेने की कोशिश की और धक्कामुक्की के शिकार हुए. विधानसभा के भीतर इस शर्मनाक नजारे पर चिंता जताते और चुटकी लेते टीवी चैनलों को अचानक पुराने भाषा विवाद याद आने लगे. याद आया कि संविधान ने हिंदी को अकेली राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं दिया है, कई राजभाषाएं हैं और सबकी समान हैसियत है. लेकिन क्या यह हिंदी बनाम मराठी का झगड़ा था? क्या राज ठाकरे को मराठी से या अबू आजमी को हिंदी से प्रेम है? या यह दो नेताओं के अपने अतिवादी रुख और तेवर थे जिनका शिकार हिंदी और मराठी के उपेक्षित बहनापे को होना पड़ा?

हिंदी और मराठी दोनों चोट खाई अस्मिताएं हैं जो यह पा रही हैं कि न उन्हें सम्मान हासिल हो रहा है और न रोजी-रोटी. इन अस्मिताओं का यह जख्म छूने भर से जैसे पूरे समाज के बदन में बिजली-सी दौड़ जाती हैन अबू आजमी समझ पा रहे हैं कि हिंदी की लड़ाई इतनी आसान नहीं है और न ही राज ठाकरे कि मराठी को हिंदी नहीं कोई और भाषा नुकसान पहुंचा रही है. टीवी चैनलों की बहसें भी हिंदी बोलने के अधिकार और राज ठाकरे के अनाचार के आगे नहीं बढ़ पा रहीं. कुल मिलाकर यह विधानसभा के भीतर एक अशालीन और आक्रामक व्यवहार का मामला होकर रह गया है जो जल्द भुला दिया जाएगा. वैसे सच भी यही है. मामला वाकई हिंदी मराठी का नहीं, अशालीन व्यवहार का है. इस व्यवहार की तीखी आलोचना होनी चाहिए और दोनों पक्षों को आगे से ऐसा कुछ करने से रोका जाना चाहिए.

लेकिन क्या यह संभव होगा? क्या राज ठाकरे और अबू आजमी मराठी की तलवार और हिंदी की ढाल उठाने से बाज आएंगे? और क्या हिंदी और मराठी के नाम पर खड़े होने वाले ध्वजधारी उनके पीछे अपनी लाठियां लेकर खड़े नहीं होंगे? संकट यही है. भले ही बहुत सतही ढंग से उठाया गया हो, लेकिन ठाकरे और आजमी ने भाषा के जिस सवाल को छुआ है, वह इतना नकली भी नहीं है.

आज की तारीख में हिंदी और मराठी दोनों चोट खाई अस्मिताएं हैं जो यह पा रही हैं कि न उन्हें सम्मान हासिल हो रहा है और न रोजी-रोटी. इन अस्मिताओं का यह जख्म छूने भर से जैसे पूरे समाज के बदन में बिजली-सी दौड़ जाती है. जाने-अनजाने इस दुखती रग को दोनों पक्ष समझते हैं और इनका अपनी राजनीति के लिए इस्तेमाल करते हैं. 

लेकिन यह मामला हिंदी बनाम मराठी का नहीं है. आज की तारीख में अपनी सामाजिक हैसियत के हिसाब से ये दोनों गरीब भाषाएं हैं जिन्हें लगातार अंग्रेजी अपदस्थ और बेदखल कर रही है. हमारे गांव-देहातों, जंगल-पहाड़ों में तरक्की के नाम पर जिस तरह आदिवासियों और दलितों का विस्थापन लगातार जारी है, उसी तरह हमारे नगरों-महानगरों में सामाजिक और शैक्षणिक विकास के नाम पर भाषाओं का विस्थापन जारी है. सिर्फ मराठी और हिंदी नहीं, तमिल, तेलुगू, बांग्ला और ओडिया भी इस प्रक्रिया की चपेट में हैं- अंग्रेजी उदारवाद का बुलडोजर सारी भाषाओं को एक तरह से कुचल रहा है. भाषाएं सिर्फ अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं होतीं, उनमें हमारे समय का सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक वर्चस्ववाद भी बोलता है. भाषाओं की हैसियत उनसे जुड़ी हुकूमत तय करती है. भारत में मूलत: अंग्रेजी शिक्षा और सामाजिकता के रेशों से बना जो अल्पतंत्न शासन कर रहा है, वह अंग्रेजी की हैसियत तय कर रहा है. 

अंग्रेजी की यह राजनैतिक हैसियत उसे शिक्षा और रोजगार दोनों की भाषा में बदलती है, उसकी अंतरराष्ट्रीयता के मिथक और उसकी अपरिहार्यता के तर्क गढ़ती है. जमीन पर यह दिखता भी है कि भारतीय भाषाओं में पढ़ाई या रोजगार हासिल करने वाले पीछे छूट जा रहे हैं, साहित्य लिखने और विचार करने वाले दूसरे दर्जे की नागरिकता के लिए अभिशप्त हैं और उच्च शिक्षा ही नहीं, प्राथमिक शिक्षा में भी अमीर-गरीब सबकी नई पसंद अंग्रेजी है.

निश्चित तौर पर आज की तारीख में अंग्रेजी एक भारतीय भाषा हो चुकी है. उसका विरोध न उचित है न फलप्रद. लेकिन उसकी विशेषाधिकारसंपन्न हैसियत दूसरी भाषाओं को विपन्न बना रही है, इसमें संदेह नहीं. इत्तिफाक से आज जो शासक जमातें है, उनमें विचार और सरोकार की वह संस्कृति नजर नहीं आती कि वे भाषाओं के इस महीन द्वंद्व और उसके गहन प्रभाव को समझ सकें. दरअसल यह संस्कृतिविहीन राजनीति कभी भाषाओं को उपभोक्तावादी कचरे के आयात की मशीन की तरह इस्तेमाल कर रही है तो कभी अपने अपनी राजनीतिक संकीर्णताओं के उपकरण की तरह. कहने की जरूरत नहीं कि इसकी शिकार एक भाषा के रूप में अंग्रेजी भी हो रही है और हिंदी-मराठी भी.

प्रियदर्शन

(लेखक एनडीटीवी इंडिया में समाचार संपादक हैं) 

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