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प्रश्नों से घिरे परीक्षण

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व्यापक जनहित में दवा परीक्षण जरूरी होते हैं, लेकिन उनके कुछ उसूल और कायदे भी तो हों. डॉ एके अरुण का आलेख

हाल ही में मध्य प्रदेश के इंदौर में वैध दवा परीक्षण (ड्रग ट्रायल) के मामले उजागर होने से कई सवाल खड़े हो रहे हैं. सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 2010 में दवा परीक्षण के दौरान 22 लोगों की मौत हुई. आर्थिक अपराध शाखा की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2008 से 2010 तक कुल 81 लोगों की दवा परीक्षण के दौरान मौत हुई. इतनी बड़ी संख्या में हुई मौतों ने चिकित्सा की आड़ में चल रहे इस जानलेवा और आपराधिक खेल पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं.

इस घटना ने यह भी उजागर कर दिया है कि हिंदी पट्टी में इंदौर दवा परीक्षण के एक हब के रूप में वर्षों से सक्रिय है. प्रदेश विधानसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में सरकार ने माना था कि यहां 2010 तक 2365 मरीजों पर दवाओं के परीक्षण हुए जिनमें 1644 तो बच्चे थे. इसी तरह संसद में एक सवाल के उत्तर में केंद्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री ने माना कि एलोपैथिक दवा परीक्षण के दौरान देश में 2008 में 288, 2009 में 637 तथा जून 2010 तक के प्राप्त आंकड़ों के अनुसार 597 मौतें हो चुकी थीं.

इंदौर अवैध दवा परीक्षण कांड ने चिकित्सकों की नैतिकता और चिकित्सा व्यवस्था की पवित्रता पर फिर से बहस छेड़ दी है. दवा परीक्षण की अहम शर्तों में नैतिक समितियों का गठन जरूरी माना जाता है. इंदौर में भी यह समिति सक्रिय है. लेकिन समाज के प्रतिष्ठित एवं प्रबुद्ध वर्ग के प्रतिनिधियों वाली यह समिति इस अवैध दवा परीक्षण पर मौन रही और सैकड़ों निरीह मरीज एक-एक कर मरते रहे. विडंबना देखिए  कि इस नैतिक समिति से जुड़ा एक चिकित्सक स्वयं अवैध परीक्षण में लिप्त था.

दवा परीक्षण की एक और अनिवार्य शर्त है, परीक्षण और अध्ययन का प्रतिष्ठित शोध पत्रिका में प्रकाशन तथा परीक्षण के लिए प्राप्त राशि और इसके स्रोत का सार्वजनीकरण. इंदौर मामले में ऐसा कुछ नहीं हुआ. खबर है कि मध्य प्रदेश के 95 फीसदी चिकित्सकों (जो वैध या अवैध दवा परीक्षण में शामिल हैं) ने न तो परीक्षण के नतीजे किसी शोध पत्रिका में प्रकाशित कराए हैं और न ही प्राप्त धन की राशि व इसके स्रोत सार्वजनिक किए हैं. दवा परीक्षण में शामिल मरीजों का जीवन बीमा भी कराना अनिवार्य है, लेकिन इंदौर के धन पिपासु चिकित्सकों ने ऐसा भी नहीं किया. गोपनीयता की आड़ लेकर मरीजों के ये ‘दूसरे भगवान’ उनकी जान से खेलते रहे, लेकिन न तो सरकार और न ही समाज ने समय पर इसका संज्ञान लिया.

दुनिया में दवा परीक्षण की शुरुआत सन 1747 में हुई जब डॉ जेम्सलिंड ने कुछ सैनिकों पर यह अध्ययन किया कि खट्टे-मीठे फल खाने वाले सैनिकों को स्कर्वी रोग नहीं होता. बाद में दवा परीक्षण की जरूरत जब बढ़ने लगी तो अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर एक संस्था कांट्रेक्ट रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (सीआरओ) बनी. इस संगठन की मदद से कई कंपनियां मनमर्जी के मानदंड तय करके अपने फायदे के लिए दवा परीक्षण करने लगीं. विडंबना देखिए कि अमीर एवं विकसित देशों की बड़ी कंपनियां नई एलोपैथिक दवाओं का अविष्कार तो अमेरीका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी आदि में करती हैं लेकिन दवाओं का परीक्षण अफ्रीका के देश, भारत, बांग्लादेश, श्रीलंका, पाकिस्तान, भूटान आदि गरीब व अल्पविकसित देश के नागरिकों पर करती हैं.

तेजी से बढ़ती कथित आधुनिकता और झटपट विकास के मंसूबे पाले नवउदारवादी समाज के लोग सेहत के लिए अब प्रकृति की बजाय अंग्रेजी दवाओं पर निर्भर हैं. इस ताबड़तोड़ विकास ने लोगों को कम से कम समय में ज्यादा से ज्यादा धन बटोरने का जो नुस्खा दे दिया है, आधुनिक चिकित्सकों का एक वर्ग उससे खासा प्रभावित है. इसके लिये वह पेशागत नैतिकता को भी भुलाकर हर वैध-अवैध कार्य करने को तैयार है. अनुमान है कि एक मरीज पर दवा के परीक्षण के लिये चिकित्सकों को दो से पांच लाख रुपये तक मिल जाते हैं. इसके लिये उसे थोड़ा बेईमान, बेशर्म और नीच बनना पड़ता है जो आज के दौर में बिल्कुल सहज है. बताते हैं कि दवा परीक्षण का धंधा इन दिनों 1500 करोड़ रुपये का है जो तेजी से फल-फूल रहा है और इस वर्ष के अंत तक इसके 2700 करोड़ रुपये हो जाने का अनुमान है. यह भी खबर है कि इन दिनों भारत में लगभग 2000 विभिन्न प्रकार की दवाओं के परीक्षण चल रहे हैं. इनमें अधिकांश दवाएं ‘खतरनाक’ हैं. हालांकि भारत सरकार ने 2005 में ड्रग एवं कॉस्मेटिक एक्ट में संशोधन कर ड्रग ट्रायल के नये मानदंड निर्धारित किए हैं, लेकिन लालच में फंसे चिकित्सकों, कानून के रखवालों और पर्यवेक्षकों की मिलीभगत से 'धंधा' बेखौफ जारी है. इंदौर का दवा परीक्षण कांड इसकी गवाही दे रहा है जहां अवैध दवा परीक्षक  चिकित्सकों ने महज ‘पांच हजार’ रुपये में इन मासूम रोगियों का जीवन तबाह कर दिया. उल्लेखनीय है कि दोषी चिकित्सकों पर मात्र पांच हजार रुपये का आर्थिक जुर्माना लगाया गया है.

व्यापक जनहित में दवा परीक्षण जरूरी होते हैं, लेकिन उसके कुछ उसूल व कायदे हैं. मरीजों के लिए ‘भगवान’ का दर्जा प्राप्त चिकित्सकों को यह जरूर ध्यान रखना चाहिए कि डॉ एडवर्ड जेनर ने खसरे के टीके का आविष्कार करने के बाद उसका पहला परीक्षण अपने बेटे पर किया था और फिर उसे अपने रिश्तेदार मरीजों और अन्य लोगों को दिया. दवा परीक्षण की इस नैतिक मिसाल को क्या हम चिकित्सक याद रख सकेंगे?

(लेखक जनस्वास्थ्य वैज्ञानिक एवं राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त होमियोपैथिक चिकित्सक हैं)

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