शून्यकाल

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यहां से कश्मीर को देखिए

जब संगीनों के सहारे शांति कायम की जाती है तो उसका यही हाल होता है. एक हल्का-सा गुस्सा इस शांति की सीवन को उधेड़ डालता है
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दिवाले के बावजूद दिवाली

एक देश की सुव्यवस्था और समृद्धि उसके खरबपतियों की गिनती से नहीं आंकी जा सकती बल्कि ये उसमें किसी के भी भूखे न रहने से तय होती है...
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जात गिनने से शुरुआत होगी

देश में जाति-आधारित जनगणना को लेकर बहस थमने का नाम नहीं ले रही. कम से कम तीन तरह की राय हमारे सामने बिल्कुल स्पष्ट है. ...
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एक साल कई सवाल

यूपीए की पहली और दूसरी पारी का सबसे बड़ा फर्क यही है कि सरकार जनता की तरफ नहीं देख रही...
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फैसल से कसाब तक

आतंकवाद को लेकर जो स्टीरियोटाइप और सुविधाजनक सोच विकसित की जाती है, वह बार-बार गलत साबित होती हैजिस समय भारतीय मीडिया में कसाब की सज़ा ...
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कौन चला रहा है समानांतर सरकारें?

मैं नहीं चाहता था कि आईपीएल पर लिखूं. इससे बचने की बहुत कोशिश की, लेकिन श्रीकांत वर्मा की पंक्ति जैसे बार-बार इसी मैदान में लौटाती ...
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इंडिया की हिंदी, भारत की हिंदी

दरअसल यह इंडिया की हिंदी है जो भारत की हिंदी से पीछा छुड़ाना चाहती है और देवनागरी के धूल भरे समाज से अलग होकर अपने ...
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हुसेन चले गए सरस्वती को बचा लें

मकबूल फिदा हुसेन अब कतर के नागरिक हैं. हालांकि इस दस्तावेजी नागरिकता से उनकी भारतीयता खत्म नहीं हो जाएगी. वे चाहें तो भी यह मुमकिन ...
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गहरे दुष्चक्र में शिक्षा

जब भारत में शिक्षा का आधारभूत ढांचा काफी कमजोर था, तब भारत ने कहीं ज्यादा बड़े वैज्ञानिक पैदा किए. जैसे-जैसे यह ढांचा मजबूत और बड़ा ...
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टायरों की दिल्ली शायरों की दिल्ली

किताबों के बढ़िया कारोबार की खबरों और इनकी पुष्टि में दिए जा रहे आंकड़ों के बावजूद लेखक आर्थिक और समाज, मानवीय कसौटियों पर ज्यादा विपन्न ...
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