शून्यकाल

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गहरे दुष्चक्र में शिक्षा

जब भारत में शिक्षा का आधारभूत ढांचा काफी कमजोर था, तब भारत ने कहीं ज्यादा बड़े वैज्ञानिक पैदा किए. जैसे-जैसे यह ढांचा मजबूत और बड़ा
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दिवाले के बावजूद दिवाली

एक देश की सुव्यवस्था और समृद्धि उसके खरबपतियों की गिनती से नहीं आंकी जा सकती बल्कि ये उसमें किसी के भी भूखे न रहने से तय होती है...
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टायरों की दिल्ली शायरों की दिल्ली

किताबों के बढ़िया कारोबार की खबरों और इनकी पुष्टि में दिए जा रहे आंकड़ों के बावजूद लेखक आर्थिक और समाज, मानवीय कसौटियों पर ज्यादा विपन्न ...
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ऑल इज नॉट वेल

आज के ग्लैमर आक्रांत समय में चीजों का मूल्य तय करने वाली बौद्धिकता भी बाजारु हो गई है. अगर वह बाजारू न होती तो लोकप्रियतावाद से इस कदर अभिभूत न होती...
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रुचिका के आगे का रास्ता

जरूरी है कि हम सारी रुचिकाओं का खयाल रखें और सारे राठौड़ों की शिनाख्त करें. तभी न्याय व बराबरी का समाज बनेगा और मीडिया को अपनी पीठ ठोंकने का जायज़ हक होगा...
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हम नमक सत्याग्रही

अपने ठाठ-बाट पर कोई अपराध भावना न रखना ही मध्यवर्ग में नए आए उपभोक्तावाद का औचित्य है. गांधी उसे लजाते हैं तो वह अपने राष्ट्रपिता को ही पाखंडी कहता है...
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26/11 कहने से बात नहीं बनती

भारत और अमेरिका में आतंकवाद की कैफ़ियतें अलग-अलग हैं और जब तक हम उन्हें ठीक से नहीं समझेंगे, अपने यहां के आतंकवाद का खात्मा नहीं कर पाएंगे...
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25 बरस पुराने हादसे, सौ साल पुरानी किताब

व्यवस्था से न्याय का इंतजार कर रहीं त्रासदियां न सिर्फ सौ साल पहले लिखे गए ‘हिंद स्वराज’ को सही साबित करती हैं बल्कि आज के हिंद स्वराज का भी सच बताती हैं...
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औघट घाट का कबीर

तहलका का सौभाग्य कि उसकी हिंदी पत्रिका के जन्म से अपनी अंतिम श्वास तक स्वर्गीय प्रभाष जोशी पत्रिका का स्तंभ शून्यकाल लिखते रहे. मेरा दुर्भाग्य कि इसी स्तंभ में मुझे उन्हें श्रद्धांजलि देने वाला लेख लिखना पड़ रहा है...
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सादगी इनके लिए पाखंड क्यों है

हमारा अंग्रेजी मीडिया उस बाजार का एजंट है जो उपभोग को लगातार बढ़ाते जाने को ही बेहतर अर्थव्यवस्था और बेहतर जीवन मानता है...
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