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यहां से कश्मीर को देखिए

image प्रियदर्शन

जब संगीनों के सहारे शांति कायम की जाती है तो उसका यही हाल होता है. एक हल्का-सा गुस्सा इस शांति की सीवन को उधेड़ डालता है

हाल के दिनों में श्रीनगर की सड़कों पर दिखने वाला पथराव क्या सिर्फ पेशेवर पत्थरबाज़ों का काम था? सुरक्षा बलों द्वारा सुलभ कराए गए किन्हीं ऑडियो टेपों की मार्फत टीवी चैनलों और अख़बारों ने यही बताया और साबित किया. हो सकता है, इसमें सच्चाई हो. श्रीनगर में पिछले दिनों चल रहे हंगामे में कुछ ऐसे ही पेशेवर पत्थरबाज़ों की भूमिका भी रही हो जो सीमा के उस पार या इस पार बैठे लोगों के इशारे पर यह धंधा कर रहे होंगे.

शेख अब्दुल्ला ने जब कश्मीर घाटी में भूमि सुधार लागू किए तो इसका ज्यादा नुकसान हिंदू जमींदारों को हुआ क्योंकि ज़मीन उनके पास थी

लेकिन क्या कश्मीर का सारा गुस्सा प्रायोजित है? क्या यह प्रचार भी प्रायोजित है कि इन्हीं कुछ दिनों में सुरक्षा बलों की गोलियों से राज्य में 15 लोगों की मौत हुई? इन प्रदर्शनों के बीच छत पर खड़ी एक महिला को कोई भटकी हुई गोली लगी, ट्यूशन पढ़कर लौट रहे एक लड़के की खोपड़ी एक प्लास्टिक की गोली से फटी और सुरक्षा बलों ने तीन युवकों को घर में घुसकर गोली मारी. ये वे घटनाएं हैं जिनकी पुष्टि राज्य के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला भी कर रहे हैं और विपक्ष की नेता महबूबा मुफ़्ती भी.

बहरहाल, टीवी पर कश्मीर के इन प्रदर्शनों को देखते हुए और इनके प्रायोजित या स्वतःस्फूर्त होने की बहस से गुजरते हुए मुझे संजय काक द्वारा कश्मीर पर बनाई गई डॉक्युमेंटरी जश्ने आज़ादी की याद आई. उस डॉक्युमेंटरी में बहुत-कुछ है- एक तरफ आजादी के जुलूसों में बदलती मय्यतें हैं तो दूसरी तरफ स्वाधीनता दिवस समारोह मनाते सरकारी प्रतिष्ठान. बीच में वे सुरक्षा बल भी, जो आम लोगों के बीच रेडियो बांट रहे हैं और उऩसे एक रिश्ता कायम करने की कोशिश कर रहे हैं.

पूरी फिल्म में जिस चीज़ ने सबसे ज़्यादा मेरा ध्यान खींचा, वह यह कि जब भी कश्मीर की सड़कों पर कोई जुलूस निकलता या कोई मय्यत गुजरती, अचानक पूरे माहौल में जैसे बिजली पैदा हो जाती. सड़कों पर चीख-चीखकर नारे लगाते लोग दिखते, रोती और छाती पीटती महिलाएं मिलतीं और भिंचे हुए जबड़ों के साथ मुट्ठियां उछालते नौजवान नजर आते, जो जैसे स्क्रीन के बाहर चले आने को बेताब हों. दूसरी तरफ जब भी कोई सरकारी आयोजन नज़र आता, हवा भारी-सी लगती, सड़कें सूनी दिखतीं, कुर्सियां खाली नज़र आतीं, उदास, भावहीन चेहरे ताली बजाते- जैसे यह आयोजन लोगों पर थोपा जा रहा हो.

कश्मीर का असंतोष एक स्तर पर देश में चल रहे कई दूसरे असंतोषों की तरह भारतीय राष्ट्र राज्य की नाकामी का भी नतीजा है

इस लिहाज से देखें तो कश्मीर में पथराव और प्रदर्शन जितने नियोजित-प्रायोजित हैं, शांति उससे कहीं ज़्यादा नियोजित और प्रायोजित है. आखिर इस शांति के लिए सात लाख सिपाही वहां तैनात किए गए हैं. जब संगीनों के सहारे शांति कायम की जाती है तो उसका यही हाल होता है. एक हल्का-सा गुस्सा इस शांति की सीवन को उधेड़ डालता है और 20 साल बाद भी सेना को सड़कों पर फ्लैग मार्च करने की नौबत आती है. दरअसल, आज की तारीख में कश्मीर एक टभकता हुआ घाव है- जब तक उसपर रूई के फाहे होते हैं, जब तक कोई मरहम होता है, उस घाव की तकलीफ मालूम नहीं होती, लेकिन जैसे ही कोई उसे छूता और दबाता है तो जैसे कश्मीर का सारा जिस्म ऐंठने लगता है.

सवाल है, ऐसा क्यों हुआ. 1978 में प्रकाशित सलमान रुश्दी के उपन्यास मिडनाइट्स चिल्ड्रेन का बूढ़ा कश्मीरी मल्लाह बोलता है कि कश्मीरी डरपोक होते हैं. कश्मीरी के हाथ में एक बंदूक दो तो वह तुम्हें थमा देगा. आज कश्मीरियों के बारे में यह नहीं कहा जा सकता. तो इस कश्मीर ने बंदूक चलाना और क़त्ल करना कब सीख लिया? आखिर ऐसा क्या हुआ कि सन अस्सी के बाद कश्मीर के पुराने बाशिंदे राज्य छोड़कर भागने को मजबूर हुए और कश्मीर में एक नई बंदूक संस्कृति का उदय हुआ जिसे दिल्ली से वजह और इस्लामाबाद से मदद मिलती रही?

इन सवालों के जवाब आसान नहीं हैं. इनकी ऐतिहासिक व्याख्याओं के कई स्तर हैं. इनमें उतरें तो कश्मीर की सदियों से चली आ रही साझा विरासत का यह पहलू भी सामने आएगा कि उन सदियों में शोषक कोई और थे, शोषित कोई और. फिर यह बात भी खुलेगी कि मूलतः प्रगतिशील रुझानों वाले शेख अब्दुल्ला ने जब कश्मीर घाटी में भूमि सुधार लागू किए तो इसका ज्यादा नुकसान हिंदू जमींदारों को हुआ क्योंकि ज़मीन उनके पास थी. जम्मू के जमींदारों को यह डर भी था कि ये सुधार उन
तक न पहुंचें.

बहरहाल भारत के विभाजन ने कश्मीर के राजनीतिक हालात और दुश्वार किए. कश्मीर का भारत के साथ आना भारत के धर्मनिरपेक्ष राज्य की पुष्टि था, अगर पाकिस्तान के साथ जाता तो धर्म के आधार पर विभाजन को जायज़ ठहराता. रामचंद्र गुहा की किताब इंडिया आफ्टर गांधी का अध्याय सिक्योरिंग कश्मीर बताता है कि उन दिनों कश्मीर के सबसे बड़े नेता रहे शेख अब्दुल्ला को पाकिस्तान के साथ जाना अनैतिक लगता था और कश्मीर की आज़ादी का खयाल अव्यावहारिक. वे मानते थे कि भारत में अगर सांप्रदायिकता को दफन कर दिया जाए तो कश्मीर का भविष्य भारत के साथ सुरक्षित है. दुर्भाग्य से इसी सांप्रदायिक विचारधारा ने सबसे ज्यादा कश्मीर मांगा और इस बात की परवाह किए बिना मांगा कि इसकी वजह से कश्मीरी उससे और दूर होता जाएगा, बिदकता जाएगा. वाकई कश्मीर की यह फांस इसी वजह से बड़ी होती गई और दिल्ली की राजनीतिक चूकों ने वहां अलगाववाद की एक ऐसी गांठ बनाई जो अब तक मरने का नाम नहीं ले रही.

सवाल है, अब हम क्या करें. क्या कश्मीर को हमेशा बंदूक के दम पर अपने पांवों के नीचे रखें? अगर वह शांति से रहने को तैयार हो तो उसे रोटी और रोज़गार दें, उसको राहत और रियायत के नाम पर लाखों-करोड़ों की रिश्वत दें वरना उसके सीने में संगीन भोंकें? जाहिर है, यह काम न उचित है और न ही व्यावहारिक. कश्मीर को अगर भारतीय राष्ट्र राज्य के जिस्म का सहज और संवेद्य हिस्सा बनाना है तो इलाज के नाम पर कसी हुई वे बड़ी-बड़ी पट्टियां हटानी होंगी जिनकी वजह से उसका हिलना-डुलना मुश्किल होता है और सहज रक्त संचार भी प्रभावित होता है.

लेकिन अगर इसके बाद भी कश्मीर न माने तो क्या करें? क्या उसे आज़ाद करके उसके हाल पर छोड़ दें? आखिर एक तर्क यह तो कहता है कि हर आदमी को अपना देश चुनने का हक है और अगर कश्मीरी अलग रहना चाहते हैं तो उन्हें भी यह अधिकार देना चाहिए. आखिर अब भी कश्मीर में भारत और पाकिस्तान से अलग एक स्वतंत्र कश्मीर की बात सबसे लोकप्रिय अपील पैदा करती है.
लेकिन मामला इतना सरल नहीं है. सिर्फ इसलिए नहीं कि कश्मीर की आजादी भारत की धर्मनिरपेक्षता पर एक चोट होगी और हमारी सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियां और भी जटिल होंगी. यह हक़ीक़त हो भी तो इसमें स्वार्थ की बू आती है. लेकिन ज़्यादा सच्ची बात यह है कि कश्मीर क्या चाहता है, यह समझने की कोशिश किसी ने की ही नहीं. बल्कि एक स्तर पर यह सिर्फ कश्मीर का मामला नहीं है. दरअसल किसी भी आधुनिक और तरक्कीपसंद कौम को रोटी, इज्ज़त और इंसाफ़ चाहिए. यह अगर एक राष्ट्र के दायरे में रहकर मिलते हैं तो ठीक, और अगर उससे बाहर जाकर हासिल होते हैं तो भी ठीक. इस नई समझ और संवेदना का ही असर है कि दुनिया भर में सरहदें धुंधली पड़ी हैं, राष्ट्र राज्यों का लौह परदा गिरा है और बीसवीं सदी में आपस में बुरी तरह लड़ने वाले यूरोपीय देश अब एक सिक्का चला रहे हैं.

यह सिर्फ इत्तिफाक नहीं है कि दुनिया के जिन देशों में राष्ट्रवाद अपने सबसे प्रबल रूपों में बचा है वे सबसे पिछड़े देश भी हैं. अपनी मजहबी और नस्ली लड़ाइयों में डूबा पूरा का पूरा दक्षिण एशिया इसका सबसे बड़ा सबूत है. इस लिहाज से देखें तो यह राष्ट्र राज्य के झड़कर गिरने का मौसम है. राष्ट्र अपनी भूमिका को जितना सिकोड़ेगा, वह नागरिकों को उतने ही अधिकार, उतनी ही आजादी देगा. दुर्भाग्य से भारतीय राष्ट्र राज्य आर्थिक स्तर पर तो अपनी भूमिका खत्म कर रहा है, लेकिन राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर यह काम करने को तैयार नहीं.

कश्मीर का असंतोष एक स्तर पर देश में चल रहे कई दूसरे असंतोषों की तरह भारतीय राष्ट्र राज्य की नाकामी का भी नतीजा है. लेकिन अगर इस राज्य के बाहर जाकर कश्मीर एक नया राष्ट्र राज्य बनाएगा तब भी कश्मीरी खुशहाल होंगे, यह गारंटी नहीं दी जा सकती. क्योंकि तब वहां नई तरह की जटिलताएं होंगी, नए राजनीतिक समीकरण होंगे, कहीं ज्यादा मुश्किल हालात होंगे और अंततः राष्ट्र राज्य की अपनी ज्यादतियां होंगी. यह बात कश्मीर को समझनी होगी और भारत को भी. कश्मीर का दूर जाना भारत में वे दरारें और बड़ी करेगा जो सांप्रदायिक राजनीति पैदा करती रही हैं.

लेकिन सवाल फिर वहीं आकर टिक जाता है- हम कश्मीर का क्या करें, उसके संकट का क्या हल हो. इस सवाल का जवाब फिलहाल इतना ही हो सकता है कि उससे हम हमदर्दी से पेश आएं, बंदूक कम चलाएं बात ज्यादा सुनें. कश्मीरियों को यह महसूस होना चाहिए कि उनके साथ दगा नहीं हो रहा. अगर यह एहसास पैदा हुआ तो वह कश्मीर को आर्थिक पैकेज के नाम पर दी जा रही रिश्वत से ज्यादा बड़ी राहत साबित होगा. फिर सीमा पार के उकसावों से निपटना भी आसान होगा, पाकिस्तान से शांति की बातचीत आगे बढ़ाना भी और पाक अधिकृत कश्मीर के बंधन खोलना भी.

इन सबके लिए बड़ी पहल जम्हूरियत के हामी कश्मीरी नेताओं को ही करनी होगी. लेकिन क्या आपस में ही बुरी तरह उलझे हुए ये नेता यह कर पाएंगे? हमारे पास इंतज़ार, उम्मीद और दुआओं के अलावा कोई रास्ता नहीं है.  

Comments (21 posted)

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rakesh 25/07/2010 13:08:56
sir,
your whole para is philosophical beyond reality. you have forgotten kashmiri hindus who had expelled out from their motherland by these & now are demanding freedom.will u tell me please how much time india as a state attacked on others.we are peace lovers but now this is our wrost face.it is time to get tougher decision.
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man singh 12/08/2010 13:56:17
आप के जेसे सफ़ेद खून के पहरूवे भारत में हो जाये तो आप इसे बेच के खा जाये ?तरस आता हे आप की बुधी पर और आपकी अनुवांशिकता पर ?
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man singh 12/08/2010 14:14:09
आप बिलकूल शर्मनिर्पेक्स हो सर?आगे कुछ कहने में मुझे भी शर्म आती हे ,जो की में नहीं |
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man singh 12/08/2010 15:11:29
आप को पता नहीं इनका एजेंडा,क्या हे |(सारे हिंदुस्तान को इस्लामिक दारुल बनाना )
इस लेख में कश्मीरी पंडितो की पीड़ा उठाई हे आप ने ,{नहीं सफ़ेद खून इजाजत नहीं देता }तो फिर कोई हक़ नहीं गेल चोदी बात करने का ?क्या इस से आप की रोजी रोटी चलती हे ,में आप पे दया करता हूँ की आप से तो अच्छा वो बेंड वादक हे जो हंसी खुशी के माहोल में खुछ अच्छे पेसे कमा लेता हे |आप उन शहीदों के गुनहगार बन रहे जो आप की खातिर शहीद हुवे ,बल्की साली उस सरकार को शह दे रहे जो संकर्मीत हे ,जेसे आप ?
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अनिकेत सिंह राणा 13/08/2010 03:49:26
मान सिंह जी...आप अकेले नहीं हैं जो कश्मीर के बारे में एक रटी-रटाई सोच आगे जाकर कुछ सोच और कह ही नहीं पाते. दीवारों पर गुटका थूकने वाले, जहां मौका मिले मूतने वाले, घर का कचरा सड़क पर फेंकने वाले आप जैसे करोड़ों लोग हैं इस देश में जिन्हें देशभक्ति बस कश्मीर के नाम पर ही याद आती है और इसीलिए आप जैसे लोगों को कश्मीर के नाम पर 50 साल से बेवकूफ बनाया जा रहा है, भारत में भी और पाकिस्तान में भी जहां की सरकारें आपकी बेवकूफी का सहारा लेकर कश्मीर मुद्दे को हल करने में अपनी काहिली छिपा जाती हैं...
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rafat alam 13/08/2010 06:44:03
Likhne to subject per aya tha magar Mr Man singh ki starheen comments ne ji kharab kar diya.Abi to Rana sahib ki balanced comment (though thodi bhasha ki kadvaht se sehmat nahi) se sahmat hote hue bechare Kashmiriyon ke liye shanti ki prathna karta hoon.
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कश्मीर के युवा आक्रोशित क्यों हैं? भारत तो उन जैसों को 60 साल से पाल-पोस रहा है… हमारा मेहनत का अरबों रुपया टैक्स के रुप में कश्मीर जा रहा है, तो क्या हमें सवाल करने का हक नहीं है, कि कश्मीर में यह जो चल रहा है वह "कश्मीरियत" नहीं है, यह विशुद्ध इस्लामी अलगाववाद है…

अगला नम्बर असम और केरल का है… कांग्रेस जैसी गद्दार पार्टी सत्ता में बनी रहेगी और हम स्वायत्तता देते रहेंगे…

लेखक महोदय "भटके हुए नौजवानों"(?) से सहानुभूति दिखाने को कह रहे हैं… कश्मीरी पण्डितों के लिये कौन सहानुभूति दिखायेगा? अमरनाथ यात्रियों के लिये ज़मीन का एक टुकड़ा लेने भर से जो "मासूम" पत्थर लेकर घर से बाहर आ जायें, ऐसों से सहानुभूति कैसे होगी?

अमेरिका क्या कहेगा, पाकिस्तान क्या सोचेगा, संयुक्त राष्ट्र क्या करेगा, चीन से सम्बन्ध खराब तो नहीं होंगे जैसी "मूर्खतापूर्ण और डरपोक सोचों" की वजह से ही हमने इस देश और कश्मीर का ये हाल कर रखा है…

क्या स्वायत्तता का मतलब यही है कि भारत उन लोगों को अपने आर्थिक संसाधनों से पाले-पोसे, वहाँ बिजली परियोजनाएं लगाये, बाँध बनाये… यहाँ तक कि डल झील की सफ़ाई भी केन्द्र सरकार करवाये? उनसे पूछना चाहिये कि 60 साल में भारत सरकार ने जो खरबों रुपया दिया, उसका क्या हुआ? उसके बदले में पत्थरबाजों और उनके आकाओं ने भारत को एक पैसा भी लौटाया? क्या वे सिर्फ़ फ़ोकट का खाना ही जानते हैं, चुकाना नहीं?
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शुभेंदु मुखर्जी 16/08/2010 11:15:27
"यह तथ्य जगजाहिर है कि जहाँ भी इस्लामी आबादी 50% से ऊपर हो जाती है वहाँ "अलगाववादी" बयार चलने लगती है"

चिपलूनकर जी, पूर्वाग्रह को तथ्य क्यों कह रहे हैं भाई. अलगाववाद का लेना-देना मूलत: धर्म से नहीं बल्कि इंसान की पहचान और उसके रोजमर्रा के सरोकारों से जुड़ा होता है. धर्म तो इस पहचान का महज एक हिस्सा है. नहीं तो आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि मणिपुर और असम की 70 फीसदी से ज्यादा आबादी हिंदू है और वहां के ज्यादातर हिस्सों में जाकर देख आइए कि क्या हालत है. दरअसल जहां भी लोगों को यह लगता है कि उनकी संस्कृति और सरोकारों की उपेक्षा हो रही है और बाहरी शक्तियां उनका स्थान ले सकती हैं, वहां इस तरह के प्रतिरोध पैदा होने लगते हैं. ऐसे प्रतिरोधों को कुछ तत्व अपने निहित स्वार्थों के लिए हवा देने लगते हैं और धीरे-धीरे आग फैलने लगती है. मराठी मानुष पर हुआ हंगामा अभी ज्यादा पुरानी बात नहीं हुई है.
तो कश्मीर में भी कुछ वैसा ही हो रहा है. जनता तो हर जगह भेड़ ही होती है जिसे धर्म या भाषा या फिर किसी और चीज की लाठी दिखाकर जैसे चाहे हांका जा सकता है. कश्मीर अगर हाथ से निकलता लग रहा है तो इसमें दोष हांकने वालों, यानी कि दिल्ली वालों की काहिली का ही है जो वास्तव में इस समस्या को सुलझाना ही नहीं चाहते. चाहें भी क्यों, आपको भी पता होगा कि लड़ाई आम जनता के अलावा सबके लिए फायदे का सौदा होती है.
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man 17/08/2010 15:20:35
शूभेन्द्र भाई ,जो तर्क आप ने दिए हे वो आप की जेसे सोच वालो के कारन ही पैदा हुवे हे ,आप इन्हें ले कर श्यापा करते रहिये ?लेकिन आप ने भी माना हे की ये जिनकी संस्कर्ती की उपेक्षा हो रही हे वो ऐसा चाहते हे ,लेकिन एक बात में आप से पूछना चाहता हूँ की कश्मीरी पंडित क्या भारत सरकार के एजेंट थे ?क्या उनकी संस्कति किसी एक ""खास कोम दुवारा"" ख़तम नहीं कर दी गयी?क्या आप इतिहास बोध में फलेष का इस्तोमोल भी करते दिखते हे ?कंही अपनी ......मत भूल जाना ?भेया चिकनी चुपड़ी बाते नेट पर कर लो एक बार आर्मी पेट्रोल पर जा के देखो पिछवाड़े में ठंडक महसूस होगी ?
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शुभेंदु मुखर्जी 18/08/2010 09:49:07
मान सिंह भाई, काम के सिलसिले में कश्मीर जाना हुआ है और आर्मी पेट्रोल के साथ भी रहा हूं. यकीन मानिए, आर्मी वाले भी सरकार को गालियां ही देते हैं. क्यों न दें. नेताओं की काहिली की सजा वे बेचारे भुगत रहे हैं. एक तो ऐसे हालात और ऊपर से परिवार से लंबे समय तक दूर रहने जैसी सजा. इतने परेशान हो जाते हैं कि अफसर छुट्टी न दे तो कई बार अफसर समेत कई साथियों को धड़ाधड़ फायरिंग कर मार डालते हैं और फिर खुद को भी गोली से उडा लेते हैं. अब आप बताओ कि क्या किया जाए. नेताओं का फॉर्मूला सीधा सा है. ऐसे हालात पैदा कर दो कि फौज और जनता एक दूसरे को कट्टर दुश्मन समझते रहें, एक दूसरे का खून बहाते रहें, कश्मीर मुददा कभी हल न हो और नेताओं मौज होती रहे. रहा सवाल कश्मीरी पंडितों का तो अगर सरकार उसी वक्त सख्ती से काम लेती तो किसी की क्या मजाल थी जो उन्हें बाहर निकाल सकता. मगर वो तब भी ढीली थी और आज भी ढीली ही है.
हल सीधा सा है. हाथ को काम, पेट को रोटी और भविष्य को सुरक्षा मिल जाए तो आदमी मस्त रहता है वरना कश्मीर से लेकर बस्तर तक हाल क्या है ये तो आप देख ही रहे हैं.
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