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दारा जो कभी न हारा

image प्रियदर्शन, वरिष्ठ टीवी पत्रकार

दारा सिंह का जाना उस भारतीय गांव के आखिरी नायक का जाना है जो खुद भी दम तोड़ रहा है.

दारा सिंह का मैं कभी मुरीद नहीं रहा. बचपन में मैं सुनील गावसकर का फैन हुआ करता था. ये सत्तर और अस्सी के वे दशक थे जिनमें पहली बार क्रिकेट दूसरे खेलों को पीछे छोड़कर अपनी एक बड़ी जगह बना रहा था- बेशक, अपनी कामयाबियों की वजह से, नए इलाकों में अपने फैलाव के चलते और सुनील गावसकर के बाद कपिल देव से लेकर सचिन तेंदुलकर तक की उस चमकती हुई परंपरा के कारण, जिसने भारतीय क्रिकेट को एक अलग मुकाम दिया. इत्तिफाक से यही वे वर्ष थे जब भारत के गांव पीछे खिसकते जा रहे थे और शहर बड़े होते जा रहे थे.

नब्बे के दशक में शुरू हुए उदारीकरण ने अचानक इन शहरों की शक्ल कुछ और बदलनी शुरू की, गांवों को कुछ और पीछे धकेलना शुरू किया. इक्कीसवीं सदी तो जैसे बिल्कुल अपनी नगर-योजना और अपना नागरिक एजेंडा लेकर आई, जिसमें नगर महानगर हो गए, घर अपार्टमेंट हो गए, मुहल्ले सेक्टर हो गए और हाट-बाजार मॉल में बदल गए. यह बाजारवाद आज भी स्थानीयता की अलग-अलग खुशबुओं को अपदस्थ करके एक वैश्विक पहचान स्थापित करने में लगा हुआ है जिसके कई आयाम हैं. एक आयाम खेलों की उस दुनिया में दिखता है जिसमें क्रिकेट मेरी तरह के शहरी मध्यवर्ग का शौक, शगल या जुनून भर नहीं रहा, वह बाजार का उपकरण हो गया है जिसका मकसद एक ऐसा इकहरा राष्ट्रीय जुनून पैदा करना है जिसकी मदद से पेप्सी-कोक से लेकर पजेरो-क्वैलिस तक बेचे जा सकें. 

वह पुराना भारत कितना मजबूत था, उसके न दिखने वाले धागे कितनी दूर तक पसरे थे- यह दारा सिंह की लोकप्रियता बताती है

यह लंबी भूमिका बस यह याद दिलाने के लिए लिखी कि इस पूरे परिदृश्य में वह भारतीय भदेस गांव जैसे भूगोल, इतिहास, स्मृति सब कुछ से बेदखल होता जा रहा है जो दारा सिंह को अपना नायक बनाता था. ओलिंपिक में सुशील कुमार या विजेंदर जैसे भारतीय पहलवानों की शानदार कामयाबी के बावजूद कुश्ती या पहलवानी वह खेल नहीं है जिसे तथाकथित संभ्रांत घरों के उच्च मध्यवर्गीय लड़के अपनाएं - वे क्रिकेट के अलावा ज्यादा से ज्यादा टेनिस या फिर शूटिंग जैसे खेलों में दिलचस्पी ले सकते हैं, जहां एक करिअर ऑप्शन फिर भी उनकी नजर में बनता है. यहां आकर हम पाते हैं कि दरअसल दारा सिंह का जाना उस भारतीय गांव के आखिरी नायक का जाना है जो खुद भी दम तोड़ रहा है. यह गांव अगर बचा है तो कुछ भूपतियों की सामंती ऐंठ में बचा है, कुछ बहुत कमजोर लोगों की मजबूरी में, कुछ अपने से लगे शहरों की फूहड़ नकल में और बाकी उन लाखों-करोड़ों विस्थापित जनों की स्मृति में जो महानगर के दैनिक जुए में जुते हुए इस पूरी व्यवस्था को अपने छिले हुए कंधों पर खींच रहे हैं. यह एक नया भारत है जो पुराने भारत को जैसे नेस्तनाबूद करने पर तुला है.

जबकि वह पुराना भारत कितना मजबूत था, उसके न दिखने वाले धागे कितनी दूर तक पसरे थे- यह दारा सिंह की लोकप्रियता बताती है. वे अपने जीवनकाल में किंवदंती और मुहावरे में बदल चुके थे. दारा सिंह होने, दारा सिंह बनने या दारा सिंह को ले आने का मतलब किसी को समझाने की जरूरत नहीं थी. ऐसी अपार शोहरत और पहचान हिंदी फिल्मों के कुछ सितारों के नसीब में आई हो तो आई हो, लेकिन किसी दूसरे खिलाड़ी को अब तक नहीं मिली. इन दिनों बाजार द्वारा रोज भगवान बताए जा रहे सचिन तेंदुलकर भी दारा सिंह जैसी वह पहचान हासिल नहीं कर सके हैं जो उन्हें किसी मुहावरे में बदल दे. और यह सब दारा सिंह ने किस दौर में हासिल किया? जब टीवी नहीं था, जब विज्ञापनों की यह चमकती दुनिया नहीं थी, जब बाज़ार का यह कद्दावर और कानून से भी लंबा हाथ नहीं था, तब दारा सिंह को उनका गंवई और कस्बाई समाज अपने सिर पर लिए घूमता रहा, उनके पोस्टर लगाता रहा, तमाम अखाड़ों में उतारता रहा, लाउड स्पीकरों पर उनका प्रचार करता रहा और उनकी किंवदंतियां बनाता रहा. 

निस्संदेह दारा सिंह की इस लोकप्रियता में कुछ हाथ पेशेवर कुश्ती के उस माहौल का भी रहा होगा जिसमें मिली-जुली कुश्तियां भी लड़ी जाती थीं, और कुश्ती लड़ाने वाले नकली दारा सिंह बनाम असली दारा सिंह का, या फिर दारा सिंह बनाम किंगकांग या दारा सिंह बनाम मैन माउंटेनजैक का तूमार बांधा करते थे. लेकिन दरअसल इन सबका वास्ता उस भोले भारत के हौसले और अभिमान से भी था जिसे लगता था कि उसकी ताकत को दुनिया में कोई चुनौती नहीं दे सकता. दारा सिंह की इस लोकप्रियता को देखते हुए ही हिंदी फिल्मों ने उन्हें अपने बीच जगह दी और जब रामायण जैसे धारावाहिक के लिए अपराजेय हनुमान जैसा चरित्र खोजने की नौबत आई तो रामानंद सागर को दारा सिंह ही दिखे. यह हिंदुस्तान की वास्तविक जनता के दिलों में बैठा रुस्तमे हिंद, रुस्तमे जमां दारा सिंह था जिसको किसी और मुहर की, किसी और मेडल की, किसी और सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं थी.

 कह पाना मुश्किल है कि आज दारा सिंह होते तो उनको वही शोहरत और इज्ज़त नसीब होती जो उस दौर में हुई. कई बार यह लगता है कि आज हम पहले से कहीं ज्यादा परमुखकातर हैं. अपनी श्रेष्ठता पर, अपने सामर्थ्य पर हमको तब भरोसा होता है जब बाहर वाला हमारी पीठ थपथपाता है. हमें फिल्मों के लिए कांस के सर्टिफिकेट और ऑस्कर अवार्ड चाहिए, खेलों के लिए ओलिंपिक मेडल चाहिए, साहित्य के लिए बुकर चाहिए और प्रधानमंत्री पद की दावेदारी या सफलता-असफलता का पैमाना मापने के लिए द टाइम चाहिए. मुश्किल यह है कि ऐसी जगहों पर पहुंचने की अपनी पात्रता होती है जो कुछ उनके जैसा ढलने से भी हासिल होती है. दारा सिंह बहुत सारी भूमिकाओं में ढले, लेकिन अंततः वही भारतीय पहलवान बने रहे जिसने किंगकांग को खूनी पंजा दांव लगाकर चित्त किया था. वे एक दौर के ग्रामगंधी, कस्बाई भारत के अभिमान और आत्मगौरव की निशानी थे- उस भारत के आखिरी नायक, जिनका जाना याद दिलाता है कि इस बीच हमने न जाने कितने नायक खो दिए, उनसे लिपटी कितनी किंवदंतियां खो दीं और कितना आत्मगौरव खो दिया है. 

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