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' यह विज्ञापन के दौर है जिसमें किताबों का बेवजह नाम हो जाता है'

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आपकी पसंदीदा विधा कौन-सी है?

शुरू में कविताएं लिखता था. अब आलोचना और संस्मरण लिखता हूं. हाल में हजारी प्रसाद द्विवेदी जी की संस्मरणात्मक जीवनी लिखी है.

इन दिनों क्या पढ़ रहे हैं?

शम्सुर्रहमान फारुकी का उपन्यास कई चांद थे सरे आसमां. यह उपन्यास बताता है कि जब कोई विद्वान कोई रचनात्मक चीज लिखता है तो वह अपने जमाने के ज्ञान को कथानक में कैसे ढालता है. हिंदी में यह क्षमता (हजारी प्रसाद) द्विवेदी जी में थी. फारूकी जितने बड़े विद्वान हैं, उतनी ही खूबसूरती से उन्होंने अपने ज्ञान को कथानक में ढाला है.

आपके पसंदीदा रचनाकार कौन से हैं?

कविताओं में तुलसीदास और अवधी के मर्सिए. कबीर, गालिब, निराला, प्रेमचंद, हजारी प्रसाद द्विवेदी. बाहर के लेखकों में शेक्सपीयर और टॉल्सटाय मुझे बहुत पसंद हैं.

आपकी पसंदीदा कृतियां कौन-सी हैं?

रामचरितमानस, दीवाने गालिब, निराला की अनामिका और कुल्लीभाट, शेक्सपियर का किंग लियर, कबीर बीजक और द्विवेदी जी का अनामदास का पोथा. चार्ली चैप्लिन की आत्मकथा और वॉन गाग की जीवनी लस्ट फॉर लाइफ.

ऐसे रचनाकार या रचनाएं जिन पर नजर नहीं गई?

अवधी के एक कवि थे पढ़ीस. वैसे इस सवाल का तत्काल जवाब मांगना बेइंसाफी है. पर मुझे कुछेक नाम याद आ रहे हैं. जैसे गीतकार शंकर शैलेंद्र को एक कवि के रूप में नजरअंदाज किया गया. इसी तरह शायर यगाना चंगेजी, मखदूम और मजाज का भी कम जिक्र होता है.

ऐसी रचनाएं जो बेवजह मशहूर हुईं?

कई हैं. पर नाम मैं नहीं लूंगा. आजकल ऐसी बहुत किताबें हैं जिनका बहुत नाम हो जाता है क्योंकि यह विज्ञापन का दौर है.

पढ़ने की रवायत कायम रहे इसके लिए क्या किया जाना चाहिए?

एक तो किताबें सस्ती हों और दूसरे, लेखक ऐसा लिखें जिसे लोग पढ़ें. किताबें कम लिखी जाएं पर अच्छी लिखी जाएं.

-रेयाज उल हक

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