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'विमर्श अच्छा भी हो सकता है लेकिन साहित्यिक दृष्टि से इसका महत्व गौण है'

image चंदन पांडे - कथाकार

फिलहाल क्या लिख-पढ़ रहे हैं?

फिलहाल एक कहानी लिख रहा हूं जिसका नाम है रिवॉल्वर. इसके पूर्व मेरा कहानी संग्रह भूलना  प्रकाशित हो चुका है. इन दिनों उम्बर्तो इको  का उपन्यास द आइलैंड ऑफ द डे बिफोर पढ़ने में लगा हुआ हूं साथ ही हिंदी पत्रिका तद्भव  भी बड़ी रुचि से पढ़ रहा हूं.

किस विधा में लिखना पसंद है?

एक शब्द में कहूं तो कहानी. सिर्फ कहानी ही लिखता हूं.

किसके जैसा लिखने की इच्छा होती है?

उदय प्रकाश की कहानी तिरिछ मुझे बेहद पसंद है. ज्ञानरंजन  की बहुत सी कहानियां हैं जो मुझे बेहद करीब महसूस होती हैं. इसके अलावा जैसा गालिब ने लिखा है उसी तरह का कुछ गद्य में लिखने की इच्छा है मेरी. 

कोई रचना जो अलक्षित रह गई.

किसी एक रचना का नाम तो नहीं ले सकता लेकिन कुछ कहानियां हैं जो इसका शिकार हो गईं. प्रियंवद की कहानी थी अधेड़ औरत का प्रेम. इसी तरह से नवीन कुमार नैथाणी  की एक कहानी थी पुल जो बिल्कुल अनजान रह गई. 

रचना जिसे बेमतलब की शोहरत मिली.

इस तरह की रचनाओं की लंबी लिस्ट है. मसलन विमर्श पर आधारित उपन्यासों की बात करें तो ये एक बढ़िया विमर्श तो हो सकता है लेकिन साहित्यिक दृष्टि से इनका कोई महत्व नहीं होता. मैत्रेयी पुष्पा  का उपन्यास अल्मा कबूतरी और कही ईसुरी फाग इसी तरह की रचनाएं हैं.

विमर्शों के प्रति क्या विचार हैं?

विमर्श होने चाहिए पर इन दिनों देखने में आ रहा है कि जो लोग साहित्यिक विधाओं को संभालने में नाकाम हो जाते हैं वो विमर्शों की आड़ में खुद को स्थापित करने की कोशिश करते हैं. विमर्श अच्छा भी हो सकता है लेकिन साहित्यिक दृष्टि से इसका महत्व गौण है.

हाल में खरीदी गई पुस्तक?

रेणुजी और मंटो  का समग्र संकलन खरीदा है. इसके अलावा उदय प्रकाश  का कविता संग्रह एक भाषा हुआ करती थी भी खरीदा है. 

अतुल चौरसिया  

Comments (4 posted)

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nandan 28/10/2009 13:40:11
what is the use of publishing the interview on dakhal
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kunal kumar 28/10/2009 20:05:51
who is the guy?what is importance of this interview?
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shailendra 06/11/2009 04:33:57
bhai koi kaam nahi hai kya..kam se kam jiska interview lia hai uska parichay to dia hota.atul chaurasia tum kya sochte ho kuch bhi likhunga to parha jaega.aaj ka pathak hindi sahitya se kyon door ho raha hai aaj pata chala ye tumhare jsise logono ke karan hi sambhav ho saka hai. bhai kuch parho fir logon ka interview lo..mehant se parhai karo.nahi to aise hi doyam darje ke interview chapte-chapte zindagi nikal jaeji
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भाइयों, चन्दन जी युवा कथाकार हैं.कम समय में ही चर्चा के केंद्र बने हैं. वैसे मैं शैलेन्द्र जी कि टिप्पणी से सहमत हूँ. ये बातचीत, सिवाए टाइम पास के कुछ नहीं. कोई गंभीर सवाल नहीं पूछे गए ना ही लेखन प्रक्रिया से संबधित कोई बात हुई. सच है, कम से कम इस तरह कि पत्रकारिता से हिंदी साहित्य का आकर्षण कम होता है और पाठक इससे विमुख होता जा रहा है.
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