सांचे मनके
ऐसे तो सौ भी भले होंगे
छोटे राज्य भला किसे पसंद नहीं आएंगे? पर आज वे जिस बड़े ढांचे में से तोड़कर बनाए जा रहे हैं उसके सारे दोष वे अपनी कुंडली में लेकर ही जन्म लेते हैं
मातृभाषा
जैसे चींटियां लौटती हैं बिलों में कठफोड़वा लौटता है काठ के पास वायुयान लौटते हैं एक के बाद एक लाल आसमान में डैने पसारे हुए हवाई अड्डे की ओर ओ मेरी भाषा मैं...मैं बहुत खुश थी अम्मा ! - अंशु मालवीय
ये कविता, तहलका के एक पाठक कुमार मुकेश ने गुजरात पर तहलका के विशेष अंक में लिखे तरुण जी के संपादकीय पर टिप्पणी करते हुए...जाहिल मेरे बाने - भवानी प्रसाद मिश्र
मैं असभ्य हूं क्योंकि खुले नंगे पांवों चलता हूं मैं असभ्य हूं क्योंकि धूल की गोदी में पलता हूं मैं असभ्य हूं क्योंकि चीर कर...- 'आप’ का क्या होगा?
- चिह्न पर प्रश्नचिह्न
- ह्त्याग्रही गांधी!
- हरेक बात पे कहते हो तुम कि...
- तो हमें तुम्हारी जरूरत ही क्या है मौलाना?
kuchh hi baten yakeen karne layak hai akhir sabhi gawah kaise toot gaye o bhi momdan jinko abhadra kaha tha ik tarfa vivechan theek nahi
khabar ...
itni sari baten ek tarafa varun ke pax me kaise ho sakti hain kuchh huchh baten to theek lagti hain lekin sabhi baton per yakeen ...
Nice Article !!! Agreed
Nice Article !! Agreed
भगत सिंह का दौर गुजरे लगभग सौ साल हो चुके हैं मगर जनमानस में उनकी छवि आज भी वैसी की वैसी ही है. ये तो ...


