Home | स्तंभ | अन्य स्तंभ | सांचे मनके | ऐसे तो सौ भी भले होंगे

ऐसे तो सौ भी भले होंगे

image अनुपम मिश्र

छोटे राज्य भला किसे पसंद नहीं आएंगे? पर आज वे जिस बड़े ढांचे में से तोड़कर बनाए जा रहे हैं उसके सारे दोष वे अपनी कुंडली में लेकर ही जन्म लेते हैं

एक के दो भले? ये टुकड़े कम से कम लोगों के बीच तो नहीं चले. ये  सब उदाहरण देख लें. एक था मध्य में प्रदेश. उसके भले से दो टुकड़े किए गए, बिना ज्यादा बड़ा आंदोलन चले. उत्तर प्रदेश के दो टुकड़े कब करोगे- यह तो बहुत बड़ा प्रश्न रहा कई सालों तक. उत्तर पाने के लिए लोगों ने सड़कों पर, 'तिराहे' तक पर अपनी जान की बाजी लगाई. उन्हें बाद में टुकड़ा मिला, खंड मिला पर उस नाम से नहीं जिसके लिए वे इतने बरस तक लड़ते रहे. यों उत्तरांचल और उत्तराखंड में भला क्या फर्क था, पर खंड करने वाली सत्ता को लगा होगा कि सारा श्रेय आंदोलन को क्यों जाए. उधर पूरब में एक बिहार का खंड बना झारखंड.

ये सब ‘एक से दो भले’ हमारे भले के लिए ही बने थे, पर भला हो उस राजनीति का जिसमें अनीति के सारे अवगुण राज कर रहे हैं. इसलिए इन नये प्रयोगों से क्या निकलना चाहिए था पर निकल क्या बैठा- इसकी जांच-पड़ताल न राज करने वालों ने की और न उस समाज ने जिसने यह माना था कि इस सपने से सुख न सही, उसके दुख तो कुछ कम हो जाएंगे.
अखंड भारत के ये खंड नये नहीं हैं. आजादी के साथ ही एक तरफ तो लोहे का एक पुरुष छोटी-छोटी देशी रियासतों की तंग सीमाएं तोड़कर उन्हें एक नये भारत में मिला रहा था तो दूसरी तरह लोहे के इस ढांचे में ऐसी जंग लग रही थी कि कुछ ही समय बाद भाषावार प्रांतों में इसके नये टुकड़े होने जा रहे थे.

पर यह बंटवारा भी निर्विघ्न नहीं था. जीभ या जुबान तो काट दे कोई पर क्या जुबान, भाषा नक्शे पर काटकर अलग-अलग की जा सकती है? उस समय पंजाब-हरियाणा के बीच अबोहर और कर्नाटक-महाराष्ट्र के बीच बेलगांव ऐसी फांस बना कि उन्हें लेकर पुरानी तो क्या, नयी उभरी निर्माण-सेनाओं ने भी विध्वंस के मोर्चे संभाल लिए हैं.

छोटे राज्य भला किसे पसंद नहीं आएंगे? पर आज वे जिस बड़े ढांचे में से तोड़कर बनाए जा रहे हैं, उसके सारे दोष वे अपनी कुंडली में लेकर ही जन्म लेते हैं. केंद्रीयकरण उस सरकारीकरण का ऐसा कुंभकरण है जिसकी नींद विकेंद्रीयकरण की मांग के बड़े से बड़े आंदोलनों के ढोल-नगाड़ों से भी नहीं खुलती. इसलिए होता तो यही है कि विकेंद्रीयकरण के नाम पर केंद्रीयकरण के टुकड़े होते जाते हैं. विनोबा ने कई बरस पहले पंचायती राज के संदर्भ में उस एक बड़े पत्थर की याद दिलाई थी जिसके यदि आप सौ छोटे-छोटे टुकड़े भी कर दें तो उन छोटे पत्थरों का स्वभाव भी बड़े पत्थर की तरह ही कठोर रहेगा. वह मृदु, नरम या मक्खन तो होने से रहा.

इतना जरूर है कि भीमकाय प्रदेशों के टुकड़े हो जाने से राजधानियों की दूरियां जरूर कम हो जाती हैं. जब मध्य प्रदेश एक था तो बस्तर के एक कोने से भोपाल राजधानी तक किसी को मामूली से सरकारी काम के लिए भी कम से कम चार दिन की छुट्टी लेनी पड़ती थी. ऐसे ही चमोली, पिथौरागढ़ आदि से लखनऊ तक आने में धीरज की परीक्षा भी हो जाती थी. लखनऊ के बदले देहरादून, भोपाल के बदले रायपुर, पटना के बदले रांची- बहुत नजदीक हो गए हैं. भौगोलिक दूरी भले ही कम हुई हो, गांव-शहरों और राजधानियों की मानसिक दूरियां अभी भी उतनी ही हैं, कहीं-कहीं तो वे बढ़ी ही हैं.

नक्शे की तरह इस नक्शे को संभालने का वादा या दावा करने वाली पार्टियों के भी टुकड़े हो चले हैं. कांग्रेस पहले अंग्रेजी वर्णमाला के एक-एक अक्षर 'आई' और 'ओ' में टूटी. फिर ये कम पड़े तो विदेशी मूल के विरोध में उठी आवाज ने इसे तीन अक्षरों एनसीपी में तोड़ा. कांग्रेस दल का नाम तो अंग्रेजी से निकला था तो ये टुकड़े भी अंग्रेजी वर्णमाला से निकलते रहे. फिर बाद में हुए एक और विभाजन ने साहित्य, दर्शन, संस्कृत सबसे मदद ली- वह तृणमूल बन गई. सभी जगह बिखराव और फिर उससे कुछ न मिल पाने से मजबूरी में जुड़ाव भी देखने को मिलता है. चिरंजीवी दल चाहे जब अल्पजीवी हो सकते हैं. नक्शे और दल के इन टुकड़ों के खेल के गगन में जगन भी मगन हैं.

नतीजा? देश की राजनीति बद से बदतर हो चली है. जब अरहर की दाल सबसे महंगी बिकी थी उसी दौर में कार सबसे सस्ती बिकी थी. आसमान छूने के लिए जमीन पर खड़ी महंगाई को पहले कुछ कम तो करना पड़ता था. अब तो वह बिना किसी कारण सीधे आसमान में ही पहुंच गई है. इधर जमीन पर रोज 'जमीन से जुड़े' नये टके सेर दल पनप रहे हैं. जो जहां से अलग हो रहा है, वह अपने बड़े टुकड़े के स्वभाव से अलग नहीं होना चाहता. राजनीति की इस 'पूर्णता' का खोखलापन कब तक सहेंगे? इसे भरने के लिए हम कब एक होंगे? इसमें तो एक से दो क्या सौ भी भले ही होंगे. 

 

Comments (2 posted)

avatar
Dr. Tarik Farooq 12/05/2011 03:40:17
Very interesting and as always, clear, concise and well-written story..........
avatar
Kuldeep Singh 28/02/2011 18:28:57
its really very hurting that UP is divided into Uttrakhand .in everywhere there is always corrpted politics and people have to face thyese prblem if u created another part of the state there is no solution in dividing states.politicians jst want to enhance their party there is no hope of improvement.they just want to be the Chief minister of the state whether its small state or big.they jst want to fullfil their greed of being cm.if a staet is divided then it hurts our feeling of unity.
So my friends Please avoid it and try to oppose it becoz its not our country's favour!!!
total: 2 | displaying: 1 - 2

Post your comment

  • Bold
  • Italic
  • Underline
  • Quote

Please enter the code you see in the image:

Captcha
  • email Email to a friend
  • print Print version
  • Plain text Plain text
Rate this article
3.00