रविंद्र म्हात्रे हत्याकांड
आतंकवाद की पहली घटना जिसमें भारत के किसी राजनयिक को निशाना बनाया गया था
कश्मीर में 1980 का दशक आतंकवाद के उभार का समय था. इस समय भारत सरकार मानकर चल रही थी कि कश्मीरी आतंकवादियों का सीधा संबंध पाकिस्तान से है. हालांकि सरकार को इस बात की जानकारी भी थी कि कुछ पश्चिमी देशों का रवैया आतंकवादियों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण है और वहां की राजनीतिक पार्टियां इन गुटों का समर्थन करती हैं. तभी 1984 में एक ऐसी आतंकवादी घटना हुई जिससे पूरी तरह साबित हो गया कि पाकिस्तान के अलावा दूसरे देशों में भी कश्मीरी आतंकवादी सक्रिय हैं.
दरअसल, ब्रिटेन में भारत के तत्कालीन उप उच्चायुक्त रविंद्र म्हात्रे का फरवरी, 84 में बर्मिघम से अपहरण कर लिया गया था. इसके पीछे जम्मू कश्मीर लिबरेशन आर्मी (जेकेएलएफ का एक धड़ा) के आतंकवादियों का हाथ था. उन्होंने 10 लाख पौंड की फिरौती और तिहाड़ जेल में बंद आतंकवादी मकबूल बट्ट को रिहा करने की मांग की थी. भारत सरकार ने इन मांगों को मानने इनकार कर दिया जिसके बाद आतंकवादियों ने म्हात्रे की हत्या कर दी.
म्हात्रे हत्याकांड कश्मीर के आतंकवाद से जुड़ा पहला ऐसा मामला था जब विदेश में भारत के किसी राजनयिक को निशाना बनाया गया था. इस मामले में ब्रिटेन की पुलिस ने पाक अधिकृत कश्मीर के दो ब्रिटिश नागरिकों को गिरफ्तार किया. बाद में जब भारत ने इन दोनों आरोपियों को सौंपने की मांग रखी तो इसे ब्रिटेन ने ठुकरा दिया. दरअसल, उस समय तक कश्मीरी विद्रोही संगठनों को ब्रिटेन की लेबर पार्टी का समर्थन हासिल था. इस हत्याकांड में शामिल दोनों आरोपियों मोहम्मद रियाज और अब्दुल कय्यूम राजा को बचाने के लिए ब्रिटेन में बाकायदा एक छोटे से राजनैतिक समूह का गठन भी किया गया था. इन घटनाओं के बाद भारत और ब्रिटेन के संबंधों में खासा तनाव पैदा हो गया था.
म्हात्रे अपहरण और हत्याकांड 20 साल बाद 2004 में फिर चर्चा में आया जब मोहम्मद असलम नाम के एक व्यक्ति को अमेरिका में गिरफ्तार किया गया. म्हात्रे हत्याकांड में शामिल यह तीसरा व्यक्ति था. बाद में असलम पर ब्रिटेन के क्राउन कोर्ट में मुकदमा चला, लेकिन उसे अपहरण और हत्या के आरोप से बरी कर दिया गया.
पवन वर्मा




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