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शेयर घोटाला: हर्षद मेहता

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एक ऐसा घोटाला जिसने भारत में शेयर बाजार के नियमन की नींव रखी

इस घोटाले के सामने आने के बाद तमाम निवेशकों और जनता के सामने सबसे बड़ा सवाल ये था कि आखिर मेहता को बैंकों से पैसा मिला कैसे?भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सन् 1990 से 92 का वक्त बड़े बदलाव का वक्त था. देश ने उदारवादी अर्थव्यवस्था की राह पर चलना शुरू ही किया था. इसी दौर में एक ऐसा घोटाला हुआ जिसने भारत में शेयरों की खरीद-फरोख्त की प्रक्रिया में आमूलचूल परिवर्तन कर दिए. 1990 की शुरुआत से ही शेयर बाजार में तेजी का रुख था. इस तेजी के लिए जिम्मेदार शेयर ब्रोकर हर्षद मेहता, कारोबारी मीडिया में ‘बिग बुल’ का दर्जा पाकर शेयर बाजार को अपनी अंगुलियों पर नचाने वाला व्यक्ति बन चुका था. वह शेयर बाजार में लगातार निवेश करता जा रहा था और इसके चलते बाजार में तेजी बनी हुई थी. लेकिन किसी को भी ये अंदाजा नहीं था कि आखिर मेहता को बाजार में निवेश के लिए इतना पैसा कहां से मिल रहा है.

23 अप्रैल 1992 को टाइम्स ऑफ इंडिया में पत्रकार सुचेता दलाल का एक लेख छपा. इसमें बताया गया था कि किस तरह मेहता बैंकिग के एक नियम का फायदा उठाकर बैंकों को बिना बताए उनके करोड़ों रुपए शेयर बाजार में लगाकर अकूत पैसा कमा रहा था. ये बात सामने आते ही शेयर बाजार तेजी से नीचे गिरा और निवेशकों को करोड़ों की रकम गंवानी पड़ी. माना जाता है कि इस घोटाले में कई बैंकों को सम्मिलित रूप से तकरीबन पांच हजार करोड़ रुपए का नुकसान हुआ.   

इस घोटाले के सामने आने के बाद तमाम निवेशकों और जनता के सामने सबसे बड़ा सवाल ये था कि आखिर मेहता को बैंकों से पैसा मिला कैसे?दरअसल आमतौर पर बैंक  आपस में अल्पावधि (अधिकतम 15 दिन) के लिए ऋण का लेनदेन करते हैं. एक बैंक को जब अपनी तत्काल नकद आपूर्ति बढ़ानी होती है तब वो दूसरे बैंकों के पास सरकारी प्रतिभूतियां गिरवी रखकर पैसा उधार ले लेता है. लेकिन इस तरह के सौदों में वास्तविक रूप से सरकारी प्रतिभूतियों का लेनदेन नहीं होता. जिस बैंक को नकद की जरूरत है, वो एक बैंक रिसीप्ट (बीआर) जारी करता है जो ऋण उपलब्ध कराने वाले बैंक को दी जाती है. बीआर इस बात की गारंटी होती हैं कि उधार लेने वाले बैंक की सरकारी प्रतिभूतियों पर ऋण देने वाले बैंक का अधिकार है. दो बैंकों के बीच इस तरह का लेनदेन बिचौलिए के माध्यम से किया जाता है. मेहता को बैंकों के इस लेनदेन की सारी बारीकियों का पता था. शेयर बाजार में उसकी अच्छी खासी साख थी जिसका फायदा उठाते हुए उसने दो छोटे बैंकों- बैंक ऑफ कराड (बीओके) और मेट्रोपॉलिटन को-ऑपरेटिव बैंक (एमसीबी) से फर्जी बीआर जारी करवाईं. इनके बदले मेहता ने कई बैंकों से नकद पैसा लिया और उसे शेयर बाजार में लगाया. इससे वह फौरन मुनाफा कमाता और बैंकों का पैसा उन्हें लौटा देता. जब तक शेयर बाजार ऊपर चढ़ता रहा तब तक तो इसकी भनक किसी को नहीं लगी लेकिन अप्रैल 1992 में मेहता के इस खेल का अंत हो गया. इस घोटाले का सबसे अहम परिणाम यह हुआ कि सरकार शेयर बाजार में नियमन को लेकर सजग हो गई. और उसने बाजार पर निगरानी और नियमन के लिए भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) का गठन कर दिया.

पवन वर्मा  

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sebi 17/05/2013 23:50:26
tera saki naka
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arun jain 15/05/2013 23:24:45
me b iske jaise ban na chahta hu or kam karna chahta hu. any contact 8696935710
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