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किस्सा कुर्सी का: संजय गांधी

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राजनीति पर आधारित फिल्म किस्सा कुर्सी का आपातकाल के दौर में खुद राजनीति का शिकार हुई

भारत में फिल्म-निर्माण जिस गति से बढ़ा उसी तेजी से फिल्मों से जुड़े विवाद और विरोध-प्रदर्शन भी बढ़ते रहे हैं. लेकिन 1975 के दौरान बनी फिल्म किस्सा कुर्सी का से जुड़ा विवाद अपने आप में खासा दिलचस्प है. शबाना आजमी की मुख्य भूमिका वाली यह फिल्म एक राजनीतिक व्यंग्य थी. कांग्रेस के सांसद रहे अमृत नाहटा फिल्म के निर्माता-निर्देशक थे. 1975 में जब यह फिल्म रिलीज होनी थी उससे पहले देश में आपातकाल लगाया जा चुका था. चूंकि फिल्म का मुख्य किरदार इंदिरा गांधी से मिलता-जुलता चरित्र था इसलिए सरकार के दबाव में सेंसर बोर्ड ने फिल्म के सार्वजनिक प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी. सेंसर बोर्ड के इस निर्णय के खिलाफ नाहटा ने अदालत का दरवाजा खटखटाया. अदालत ने फैसला दिया कि सार्वजनिक प्रदर्शन के पहले ये फिल्म न्यायाधीशों को दिखाई जाएगी. इससे पहले कि अदालत के सामने फिल्म का प्रदर्शन होता, उसका मूल प्रिंट गायब हो गया. कहा जाता है कि संजय गांधी के  इशारे पर तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल ने मुंबई से फिल्म के प्रिंट जब्त करवाकर उन्हें दिल्ली के पास गुड़गांव स्थित मारुति फैक्टरी परिसर में रखवा दिया जहां बाद में इन्हें नष्ट कर दिया गया.

1977 के चुनावों में अमृत नाहटा जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव जीतकर सांसद बने. उन्होंने संसद में मांग की कि आपातकाल के दौरान जब्त की गई उनकी फिल्म के प्रिंट उन्हें वापस किए जाएं. तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई और तब के सूचना और प्रसारण मंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने यह केस सीबीआई को सौंपने का फैसला किया. सीबीआई के संयुक्त सचिव निर्मल कुमार सिंह ने इस मामले की जांच की और संजय गांधी और विद्याचरण शुक्ल के खिलाफ इस मामले में मुकदमा दर्ज कराया. केस की सुनवाई हुई और दिल्ली की एक सत्र अदालत ने दोनों आरोपियों पर जुर्माना लगाते हुए सजा सुनाई. गांधी और शुक्ल की तरफ से बाद में सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की गई. इस वक्त तक मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री पद छोड़ चुके थे. चौधरी चरणसिंह कांग्रेस के  समर्थन से प्रधानमंत्री थे. बदली राजनीतिक परिस्थितियों में फिल्म को लेकर नाहटा अपने आरोपों से मुकर गए. अंतत: सुप्रीम कोर्ट ने सबूतों के अभाव में संजय गांधी और विद्याचरण शुक्ल को बरी कर दिया.

किस्सा कुर्सी का  मामला इस मायने में भी खास है कि देश में पहली बार अदालत द्वारा सजा सुनाए जाने के बाद भी आरोपियों को चुनाव लड़ने की अनुमति मिली और दोनों उम्मीदवार चुनाव जीते भी. 1977 में अमृत नाहटा ने फिर उसी कहानी पर किस्सा कुर्सी का फिल्म बनाई जो बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह असफल साबित हुई. 

पवन वर्मा 

Comments (1 posted)

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supra shoes 20/12/2010 06:46:49
I really liked your blog article.Looking forward for more such stuff.
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