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तहलका-फुल्का

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खुश रहने का सूत्र

माफ कीजिएगा, आप खुश होना ही नहीं चाहते. आपको तो बस चिकचिक-किचकिच करना है. क्या कहा! आप खुश होना चाहते हैं. मगर कैसे? आपके 'कैसे'
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गांधी-वेवेल वार्ता, स्वर्ग लोक में

देशभक्त, लेखक को माफ करें कि वेवेल (1943 से 1947 तक भारत का वायसरॉय) को भी स्वर्ग में दिखाया गया है, मगर मैं क्या करता...
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उत्तर तो आप ही दे सकते हैं

‘तर्क-वितर्क दोनों करें बाहर प्रस्थान और शोर-शराबा दोनों रहें अंदर विराजमान. अति शीघ्र बताओ उस स्थान का नाम?’ यह यक्ष का पहला प्रश्न था. युधिष्ठिर...
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14 अगस्त का पैगाम 15 अगस्त के नाम

वह यहां के हालात भलीभांति देख-समझ चुका था क्योंकि 14 अगस्त 15 अगस्त से पहले आता है. उसने जो देखा-सुना, महसूस किया, वह 15 अगस्त...
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‘होरी’ के नाम एक बिचौलिए का खत

मेरे प्रिय भाई ‘होरी’! अबे तू उद्दंड काहे होता जा रहा है बे! सरकार जब-जब तेरी जमीन का अधिग्रहण करने जाती है, तब-तब तू बवाल काटता...
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नीर की पीर

वाकया काफी दिलचस्प है. एक टपोरी ने सज्जन को धमकाते हुए कहा, ‘दूं क्या खर्चा-पानी?’ सज्जन तपाक से बोले, ‘खर्चा दे न दे, बस पानी...
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पहले हमाम, अब सरेआम

धृतराष्ट्र की आज्ञा पाकर संजय ने आंखों देखा हाल बताना शुरू किया- ‘महाराज, कदाचित देश के गौरव की रक्षा हेतु एक लाडो ने निर्वस्त्र होने की...
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बरसात की उलझन

ज़मीन पर आवाज़ गूंजी ' यार, ये बारिश क्यों होती है? उफ़्फ, बरसात इस शहर के लायक है ही नहीं....' ये चुभती हुई आवाजें बरसात...
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लखनवी से अजनबी आज का लखनऊ

ये तहलका-फुलका कोना रोज़मर्रा की पत्रकारिता से इतर तहलकाइयों की कोमल-कठोर, छुपी-उघड़ी हर तरह की भावनाओं को ज़ुबान देने का प्रयास है... ...
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झूठ पर सच का कब्जा

पिछले 60 साल से गणतंत्र दिवस मनाया जा रहा है. गणतंत्र दिवस का कार्यक्रम कभी भी कुछ ऐसा कहता-सुनता-समझता नजर नहीं आता जो पहले न...
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