आदमी क्या करे

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ये तहलका-फुलका कोना रोज़मर्रा की पत्रकारिता से इतर तहलकाइयों की कोमल-कठोर, छुपी-उघड़ी हर तरह की भावनाओं को ज़ुबान देने का प्रयास है...

ये करे तो मरे
वो करे तो मरे
आदमी क्या करे

ये नहीं सूझता
वो नहीं बूझता
ये नहीं काम का
वो नहीं दाम का

ये करे गलतियां
और सजा वो भरे
आदमी क्या करे

ये जो हैं आफतें
तो वो हैं शामतें
ये हुआ तो अजब
वो हुआ तो गजब

ये नहीं मिल रहा
और वो भी है परे
आदमी क्या करे

विकास बहुगुणा

इस वर्ग की सभी रचनाएं

Comments (2 posted)

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Vipin Panwar 19/11/2008 08:36:38
भाई जी बहुत बडिया कविता लिखीं छ , पढ़ी का बहुत भालू लगी . उम्मीद छ आप और सुंदर लिख लिखला .

शुभकामना
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Lakhmi chand kohli 22/12/2009 09:27:23
बहुत अच्छा लगा... थोड़ी हँसी भी आई। क्योंकि मज़ेदार है।

मैं भी कविता लिखने का स्वाद पहचानता हूँ। लेकिन हमेशा एक चीज़ जो मैं कई कविताओं में पढ़ चुका हूँ वे ये बात है की जब भी कविता चलती है वो अपनी ही पटरी की रहनवाज़ होती है। अगर इंजन दुख का लगा है तो आखिर तक दुख मे चलती है। क्या रेल जब चलती है तो आखिर का स्टेशन पर ध्यान होता है? बीच के स्टेशन पर पानी या कुछ खाने के लिये नही उतरा जाता।

इंसान पंक्तियों में बखूबी मज़ेदार रहता है। मगर जीवन के हर कदम को सवाल भी वही बनाता है और जवाब भी। वो जो करेगा वही उसका सवाल है और जो अंजाम पायेगा वही उसका जवाब। यही तो जीवन का खेल है।

कोई अन्य स्टेशन पर ज़रा रूके तो मज़ा आ जाये।

प्यार के साथ आपका दोस्त
लख्मी
http://ek-shehr-hai.blogspot.com/
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