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सिनेमा के सौ साल के उपलक्ष्य में...

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फिल्म इतिहास के सौ साल पूरे होने के सुअवसर पर एक सर्वदलीय बैठक बुलाई गई. तय हुआ कि सभी पार्टियों के लोग साथ-साथ एक फिल्म देखेगें. लेकिन तभी एक बुजर्ग नेता ने सुझाव दिया कि चूंकि हमारा देश एक लोकतांत्रिक देश है, इसलिए मुनासिब यही होगा कि सब अपनी-अपनी पसंद की फिल्में देखें. इस सुझाव को सभी दलों ने फौरन मान लिया. सब अपनी-अपनी पसंद की फिल्म देखने निकल पड़े.

अधिकांश नेताओं ने मनी है तो हनी है को देखना पंसद किया. जैसे कि पांचो उंगलियां एक बराबर नहीं होतीं, वैसे ही सब नेता एक-से नहीं होते, इसलिए बहुतेरों ने वह फिल्म न देखकर दूसरी फिल्म अपना सपना मनी मनी  देखी. मगर कुछ खास नेताओं ने खास वजहों से खास फिल्में देखीं. 

लालकृष्ण आडवाणी जी जिस सिनेमाघर में फिल्म देखने गए, इत्तफाक से वहां उन्हें नरेंद्र मोदी मिल गए. उस सिनेमाघर में चल रही फिल्म का नाम था, एक फूल दो माली. दुआ-सलाम करने के बाद दोनों तय करके अलग-अलग सिनेमाघर में फिल्म देखने गए. आडवानी जी ने देखी वह सुबह कभी तो आएगी तो मोदी ने जागते रहो

ए राजा ने गोलमाल रिटर्न तो कलमाड़ी साहब ने खेल खेल में देखी. करुणानिधि जी ने घात देखी, तो जयललिता जी ने प्रतिघात देखी. यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश जी का पापा कहते हैं देखने का मन था, मगर डैडी  देखी, तो मुलायम सिंह जी ने बेटा देखी.

बहिन मायावती ने देखी गीत गाया पत्थरों ने तो ममता दीदी ने अमानुष देखी. रेलमंत्री मुकुल राय जी एक फिल्म देखने जा ही रहे थे कि उनका पीए उनके कान में कुछ फुसफुसा गया. रेलमंत्री का चेहरा चमक गया. रेलमंत्री ने द बर्निंग ट्रेन न देखकर फिर चलती का नाम गाड़ी देखी.

नीतीश जी खिलाड़ी देखने अपने घर से अभी निकले ही थे कि लालू जी को यह बात पता चल गई, उन्होंने झट खिलाडि़यों का खिलाड़ी देख डाली. जब यह बात नीतीश जी को पता चली तो फिर उन्होंने सबसे बड़ा खिलाड़ी देखी.

शरद पवार जी का मूड तो था सौदागर या काला बाजार देखने का, मगर टिकट न मिलने के चलते कॉरपोरेट देखी. वहीं वित्तमंत्री प्रणब दा ने कर्ज तो गृहमंत्री पी चिंदबरम जी ने कागज के फूल देखी. 

फिल्म के चयन को लेकर सबसे ज्यादा अगर कोई कन्फ्यूजन हुआ, तो माननीय दिग्विजय सिंह जी को. उनकी फिल्मों की सूची लंबी थी. दबंग, जीने नहीं दूंगा, झूठ बोले कौवा काटे वगैरह थी, इसलिए वह इतनी दुविधा में पड़ गए कि कोई फिल्म न देख सके.

प्रधानमंत्री जी भी फिल्म देखने की सोच रहे थे. इस बाबत वे सोनिया जी से मिले. ‘मैडम आप कौन-सी देखने जा रही है?’ ‘जो राहुल दिखाने ले जाए!’ ‘ तो कौन सी फिल्म चुनी है राहुल बाबा ने ?’ ‘मत पूछिए मनमोहन जी, एक हो तो बताऊं! उसकी लिस्ट में तो मुगल-ए-आजम, मुकद्दर का सिकंदर, मदर इंडिया न जाने क्या-क्या है! खैर छोडि़ए! आप कौन-सी फिल्म देखने जा रहे हैं?’ ‘सोच रहा हूं कि राजा हरीश्चंद्र देखूं!’ ‘अरे वह तो मूक फिल्म है!’ ‘तो फिर ‘खामोशी’ कैसी रहेगी!’ ‘ आप पर काम का कितना बोझ है! कोई हल्की-फुल्की मनोरंजक फिल्म देखिए न!’ ‘ एक फिल्म और सोची है मैडम! सोचता हूं वही देख लूं ...’ ‘हां हां, बताइए न! कौन-सी सोची है?’ मनमोहन जी रुककर बोले, ‘...सिंग इज किंग’. यह सुनते ही सोनिया जी मुस्करा दी. मनमोहन जी शरमा गए. 

-अनूप मणि त्रिपाठी

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