समंदर : दो कविताएं
1-समंदर की लहरें भी बहुत कुछ कह जाती हैं आते जाते.... मसलन, जिंदगी हारने का नाम नहीं, मेरी ही तरह उठो और आगे बढो मंजिल के करीब पहुंच तुम गिर जाओ तब भी मत हारो हौसला... मसलन, दूर, बहुत दूर चले जाने के बाद भी बुलंदी के साथ वापस आना सीखो और अपने आगोश में ले लो समय को भी तुम......! 2- जिंदगी भी तो कुछ कुछ समंदर की लहरों की मानिंद चलती है, कभी-कभी हौले तो कभी तेज थपेडे दुख के और झोंके सुख के वैसे ही जैसे ज्वार और भाटे हां, एक बात जुदा होना चाहिए जिंदगी और समंदर में, कभी जिंदगी में समंदर सा खारापन न हो कयोंकि फिर मजा नहीं रह जाता जीने का.....! अतुल श्रीवास्तव |
राजनंदगांव, छत्तीसगढ़ के रहने वाले अतुल, एक निजी न्यूज़ चैनल में पत्रकार हैं.
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Comments (11 posted)
मेरी जिंदगी के काफी पल समुन्द्र के आचल में ही गुजरे.
कभी समुद्र का धीर गंभीर शांत रूप , तो कभी रौद्र रूप,
समुद्र के साथ रहकर भी मुझे जिन्दगी का वह मानवीय
स्वरुप इतना समुद्र जैसा दार्शनिक होगा, अंदाज न था.
आपने अपने शब्दों में जीवन के कठोर तथ्य को पिरोकर
जीवन को गर्व से जीने के लिए ऐसा अनमोल उदाहरण
पेस किया है, वह अति सुन्दर है....
बाबा शरद
बनारस
pehle kabhie nahi padhi thi!
जिंदगी की झंकार सिरजती
भावः पूर्ण रचनाएँ....बधाई अतुल.
ज़िंदगी और समंदर की चर्चा के बीच
ज़िंदगी के लिए समंदर से भी गहरा
अर्थ तलाश लेना मामूली बात नहीं है !
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डॉ.चन्द्रकुमार जैन
अच्छी कविता लगी...हमारे प्रयासों पर भी नज़र डालें और हमसे जुड़ें.....
निखिल आनंद गिरि
Bahut hi mazaa aagaya
wah mere yaar aur is tarah acchhe kavitayen likha karen!!
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