तहलका हिन्दी: मां ने कहा था मां ने कहा था ================================================================================ Sanjay Dubey on 19/06/09 12:46:00 मां ने कहा था चार साल का होने पर रोटी का कौर मुंह में रखा ही था मां कह उठी अजी सुनते हो देखो तो इस जितिया को पूरा एकलखोर है इसकी चट्टी अंगुली कैसे उठ रही है मेरी तरफ नासपीटा बड़ा होकर कौन देस जाकर रहेगा अपनी जैसी जोरू के साथ तिरालीस की उमर में अपने हाथ से बेली-सिकी रोटी खाते हुए चट्टी अंगुली को अपनी ओर देख पांच सौ मील दूर गांव में मां के अंतिम स्थान को याद करते हुए आंसुओं से भीग जाता हूं भरी बरसात में पिता के दिए घर में निपट अकेला. मां तो यही समझती है मां अब भी यही समझती है मैं अंगुली पकड़कर स्कूल जाता हुआ बच्चा हूं मां को नहीं दिखते मेरी कनपटी के सफेद बाल चेहरे पर बढ़ते हुए सल जब भी आता है गांव से मां का पत्र हिदायतों की बरसात कर जाता है मुझ पर मैं तरबतर हो जाता हूं उसकी हिदायतों से जितेन्द्र चौहान इस वर्ग की अन्य रचनाएं 'साहित्य की कोपलें ' उभरते हुए अंकुरों को खाद-पानी देने का एक छोटा सा प्रयास है. आप भी इस वर्ग के लिए अपनी रचनाएं (फोटो और संक्षिप्त परिचय के साथ) mailto:hindi@tehelka.comपर ईमेल कर सकते हैं या फिर नीचे लिखे पते पर भेज सकते हैं. तहलका हिंदी, एम-76, एम ब्लॉक मार्केट, ग्रेटर कैलाश-2, नई दिल्ली-48