खाने

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 बचपन से देखा था, ढेरों खाने थे

खानों के बाद खाने, बड़े-छोटे, पतले-मोटे

अनगिनत

और इन्हीं खानों से तय होते थे रिश्ते

इन्हीं के आकार के नापे काटे जाते थे संबंध

इससे जिम्मेदारी का सरोकार है

‘‘तो फिर यह बेटा हुआ’’

यह जन्म का जिम्मेदार है ‘‘जाहिर है पिता है’’

इसे देखकर बदन चीखता है ‘‘शौहर है और भला कौन’’

इसे देखकर मन भीगता है  ‘‘चलो महबूब सही’’

शौहर के खाने में महबूब के नाप की इच्छाएं

‘‘दीवानी हो क्या?’’

 भाई में दोस्त का चेहरा ‘‘हटाओ इसे’’

पाला करो सिर्फ उतने ही जज्बात जो इन खानों में आयें

और जो उगे बढ़े जरा भी कुछ ज्यादा तो

 क़तर दो, ये बग़ावत है

और बगावतें भले घरों की लड़कियां नही करती

सोचती हूं खानों के इस गणित में कहां जाते होंगे वोरिश्ते

जिनकी शकल ही पहचान में नहीं आती

जो या तो बिना आकार के अमीबा की तरह मन में पलते हैं

या गर्म पारे की तरह लहू मांस में घुलते है

कब से लिए बैठी हूं तेरा नाम हाथों में

कोई खाना मिले तो रखूं. 

                                                       भावना पांडे

 

 

(लेखिका एक टीवी चैनल में कार्यरत हैं) 

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Comments (7 posted):

virendra jain on 30/05/09 05:23:12
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Bhawana
Please read Amrita Preetam's novel specialy "ESCIMO SMILE" and "AREAL"
and you will find asentimental support towqrds your thoughts
virendra jain
maninder singh bisht on 08/06/09 03:11:56
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mam plz khus reha karen,


ludhiana..
Rakesh on 22/06/09 10:33:40
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Dil chhoo lene wali kavita
santoshsingh on 25/06/09 10:03:45
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congrets bhawana.....such kahne ki takat hai aap me ...ishe zinda rakhiye...aapka nahi to samaj ka bhala jarur hoga...keep it on...
Santosh Singh
Assistant Editor
MLBD.
sharib raza on 15/07/09 07:23:45
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keep it up bhawna
Pankaj Narayan on 12/10/09 01:27:34
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Bahut achhi kavita lagi... apke liye sadar ye panktiya...वह धरती क्योंकि बिछ जाती है। वह आकाश भी है क्योंकि उठना जानती है। वह मां है क्योंकि उसे जन्म देना आता है। वह देवी है क्योंकि घरों ने उसे पत्थर बना दिया है। दो अलग- अलग फैक्ट्रियों में बनते हैं औरत और मर्द। कभी- कभी दोनों फैक्ट्रियों की दूरी मिटती तो ...कभी- कभी मिटाई जाती है। इसीलिए औरतें होती भी हैं और औरत बनाई भी जाती है...
dr anurag on 13/10/09 02:00:05
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गुलज़ार साहब की एक नज्म याद आ गयी....गर रिश्ते भी होते लिबास की तरह ...

यूं भी वक़्त ओर आपका ओहदा रिश्तो को तय करता है....कविता अपने मायने पर खरी है....
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