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दो कविताएं

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योग

योग कहीं भी कभी भी

एक लंबी सांस लीजिए

थोड़ा धैर्य रखिए,

दूसरे के अपशब्दों को

उसके संस्कारों का

छिछलापन मानकर

भूल जाईये,

उनके बारे में सोचिए

जो आपको पसंद हैं,

उनकी खुशी को

महसूस करिए

जिनकी सरलता से

आपको खुशी मिलती हो,

अब सांस छोड़ दीजिए

और

खुद के अंदर छिपी

अथाह शांति को

महसूस कीजिए...

सरकारी स्कूल की दीवारें

सरकारी स्कूलों की

दीवारें अक्सर

ज्यादा उंची नहीं होती

बड़ा आसान होता है

उन्हें यूं ही फांदा जाना

मुझे अपने

स्कूल की दीवार कभी ज्यादा

ऊंची नहीं लगी

सरकारी तंत्र की हवा

आसानी से यहां आती जाती रही

जाति..धर्म का एहसास

मास्टरों के दिमाग से होता हुआ

अक्सर मेरे अंदर

घुसपैठ करता रहा

भ्रष्टाचार को

गुरु शिष्य परम्परा

के लबादे में..

कई बार सरकारी स्कूल की दीवारें

फांद कर आते देखा..

मास्टरो की डांट

अक्सर

स्कूल की दीवारें

फांद कर उनके घरों में

ट्यूशन पढ़ने के लिए

मजबूर करती रही..

आज भी जब अपने स्कूल

की ओर से गुजरता हूं

तो अपने भीतर की

एक छोटी दीवार का

एहसास हो जाता है...

                           सुबोध राय

सुबोध एक निजी न्यूज़ चैनल में कार्यरत हैं.

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'साहित्य की कोपलें ' उभरते हुए अंकुरों को खाद-पानी देने का एक छोटा सा प्रयास है. आप भी इस वर्ग के लिए अपनी रचनाएं (फोटो और संक्षिप्त परिचय के साथ) mailto:hindi@tehelka.comपर ईमेल कर सकते हैं या फिर नीचे लिखे पते पर भेज सकते हैं.  

तहलका हिंदी, एम-76, एम ब्लॉक मार्केट, ग्रेटर कैलाश-2, नई दिल्ली-48

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