आपबीती

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‘स्वर्णा की कहानी नौकरानी से उघमी होने की कहानी है’

हम दोनों एक ही उम्र के थे और साथ-साथ बढ़े हुए थे. बचपन में हम आधी बनी इमारत के सामने मौजूद रेत के टीलों पर
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‘ जाहिदे तंग नजर ने काफिर मुझे समझा...’

जीवन में खट्टे-मीठे अनुभवों के साथ कुछ ऐसे तीखे और कटु अनुभव भी होते हैं जिनके बाद लगता है कि शिक्षा, डिग्री और समाज के...
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'किन मोरी अवध उजारी रे'

छह दिसंबर, 1992 इस तारीख की कड़वाहट समझने लायक तब शायद मेरी उम्र नहीं थी, लेकिन उस सर्द रात की गर्माहट मैं अब भी महसूस...
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' किसी का भी नाम सिर्फ छोटू या लड़की कैसे हो सकता है '

क्या उनकी जिंदगी में कभी खुशी और रोशनी बिखरेगी? ...
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' अपनी बालकनी से हमने गद्दाफी के टैंकों को देखा '

फरवरी, 2011 में मिस्र में फैली बदलाव की आग से लीबिया में भी विद्रोह की लपटें भड़क गईं. शुरू में जब मैंने अशांति की बातें...
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' स्पर्श करने से गंगा न निर्मल बन सकती है न अविरल '

गंगा की अविरलता और निर्मलता दोनों एक-दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं. उत्तराखंड सरकार हेमा मालिनी और दूसरे सितारों को लेकर गंगा स्पर्श करने की...
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' राजनीति गंदली है तो आचमन करो '

मित्रों के बीच देश की मौजूदा गंदली राजनीति पर बातचीत हो रही थी. मेरे भीतर मुख्यमंत्री मायावती द्वारा कटौती प्रस्ताव के मुद्दे पर कांग्रेस का...
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‘इस बार मुझे अपना गांव बेगाना सा लगा’

मेरा गांव बिहार के वैशाली जिले में आता है, गांव का नाम है बान्थु. इसका सामाजिक ताना-बाना कुछ ऐसा है कि यहां भूमिहारों का बोलबाला...
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‘उस कच्चे पलस्तर में गौतम सर ने कुछ अच्छी लकीरें खींच दी थीं’

उम्र का पलस्तर जब कच्चा होता है तो उसमें पड़ने वाली लकीरें हमेशा के लिए आपमें रह जाती हैं. 1993 की बात है. शिक्षक दिवस...
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‘आडवाणी को उस माइक्रोफोन तक जाने से किसने रोका था?’

5 दिसंबर 1992 को मैं आडवाणी की रैली कवर करने के लिए लखनऊ में था. रात को भाषण के बाद जब पत्रकारों की भीड़ छंटने...
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