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'किन मोरी अवध उजारी रे'

image मूलत: बिहार में जहानाबाद के निवासी 25 वर्षीय जयशंकर इन दिनों दिल्ली में एक समाचार चैनल में काम कर रहे हैं.

छह दिसंबर, 1992 इस तारीख की कड़वाहट समझने लायक तब शायद मेरी उम्र नहीं थी, लेकिन उस सर्द रात की गर्माहट मैं अब भी महसूस करता हूं. एक दिन, जिसके बाद मेरा सीधा-सादा शहर अचानक बदल गया था. यह बात मेरी समझ में देर से आई कि क्यों भला उस दिन के बाद मैं तंजिला आपी के घर नहीं जा सकता, जबकि उनके अहाते में लाल गूदेदार अमरूद का पेड़ है. या, मां मुझे सद्दाफ के साथ खेलने से क्यों मना करती है, जबकि वह गणित के उन सवालों को भी चुटकियों में हल कर लेता है जो मेरे माथे के ऊपर से गुजरते हैं. या फिर, कैसे एक रात अचानक घर से मेरे स्कूल की दूरी इतनी बढ़ गई कि हमें हमारा मोहल्ला ही छोड़ना पड़ गया.

ऐसा लगा कि राम और रमजाना के बीच सारी बातें पहले से ही तय हैं. दोनों को अपने हस्तक्षेप का दायरा मालूम था

किताब के पन्नों की तरह दिन और कहानियों की तरह शहर बदलते रहे, लेकिन ये बातें मेरी यादों की गठरी में जस की तस पड़ी रहीं. जब कभी मुंबई में 'हर-हर महादेव' या 'अल्लाह-ओ-अकबर' का शोर बुलंद होता या गुजरात से किसी ट्रेन के जलने की खबर आती तो मन के झोले में ये यादें कुलबुलाने लगतीं. यही वजह थी कि पिछले दिनों जब मुझे अयोध्या जाने का मौका मिला तो मैं फौरन तैयार हो गया. शायद मैं उस जमीन को नजदीक से देखना-परखना चाहता था जहां से उठे एक तूफान ने मेरे बचपन की खूबसूरत यादों का एक बड़ा हिस्सा मुझसे छीन लिया था. मेरे दोस्त, मेरा घर, मेरा शहर जो अचानक एक दिन बदल गए थे. और मैं अपने मासूमियत भरे दिनों के बीच अचानक रेतीली तपिश महसूस करने लगा था.

पहली नजर में इस शहर ने मुझे निराश किया. शहर भी नहीं, शायद एक कस्बा. यहां की हर चीज जानी-पहचानी थी. धूल से सनी सड़कें, चारों ओर पसरी गंदगी, रास्ते पर अघाते जानवर, लोगों के पास चाय की चुस्कियों के लिए बेशुमार समय और किसी भी अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर घंटो बहस करने की काबिलियत. सब कुछ एकदम देखा-दिखाया सा. किसी भी दूसरे शहर की तरह. सिवाय सुरक्षा में तैनात उन जवानों के. जो खाकी की बजाय हरी चितकबरी वर्दी पहनते हैं और जिनके हाथ में लाठी की बजाय लोहे का कोई हथियार होता है. शाम होते-होते मैं उस विवादित ढांचे के दरवाजे पर भी पहुंच गया. रामलला के दर्शन से पहले मैं पूजा सामग्री की एक दुकान में घुसा. दुकान क्या थी, लकड़ियों के पटरों को इटों के सहारे टिकाकर तैयार किया गया एक अस्थायी बंदोबस्त था. दुकान में रामलला को पूजने के लिए हर सामान मौजूद था. फूल, अगरबत्ती, रोड़ी, चंदन, हल्दी, अछत, कसैली और नारियल. बातों-बातों में पता चला कि दुकान की मालकिन मुसलमान है. मेरे पत्रकार मन ने हांक लगाई और मैं उससे बतियाने के लिए वहीं बैठ गया.
50 साल से भी अधिक की रमजाना के पास बताने के लिए जहान भर की बातें थीं. 15 बरस की उम्र में शादी, बीमारी से पति का इंतकाल, बारह धड़ों का कुनबा, पांच बेटियों की जिम्मेदारी और गुजारे के लिए यही एक आसरा.'आपके मजहब के लोग यहां ये सब बेचने की इजाजत देते हैं?' मैंने सीधा सवाल किया.

'कम से कम खुदा हमरा हाथ तो ना पकड़े बाबू!' रमजाना ने खाटी भदेस लहजे में कहा, ‘इ रामलला कउनो बीस बरस से हमरा परिवार के रोजी-रोटी चलावत हैं, तो हम काहे ओकर सेवा आउ साज-सिंगार ना करी.'

ऐसा लगा कि राम और रमजाना के बीच सारी बातें पहले से ही तय हैं. दोनों को अपने हस्तक्षेप का दायरा मालूम था और उनके बीच किसी और के लिए कोई जगह नहीं थी. मुझे यह अब तक धर्म की सबसे आसान परिभाषा लगी.

मैंने सलाह दी, 'यहां से अगर दिल्ली, कानपुर या लखनऊ चले जाओ तो जीवन आसान हो सकता है.' रमजाना ने जो कहा वह दुनिया के सारे सवालों का जवाब हो सकता था. 'हम कहां जाईब बाबू! हम तो इक दिन एही धरती में समा जाईब.' राम अयोध्या छोर सकत हैं, भला  कौशल्या कईसे छोरी’

“किन मोरी अवध उजारि रे

बिलखे कौशल्या...

राम गये..सिया गयी

लखन चले बिसारी रे

कलपे कौशल्या...”

इसके बाद सवालों की गुंजाइश खत्म हो गई थी. वहां से लौटते समय मुझे यह सोचना भी बेमानी-सा लगा कि महज एक तूफान की वजह से कोई अपना घर, शहर और दोस्त छोड़ने को मजबूर हो सकता है. मुझे अपनी जड़ों की गहराई का अंदाजा हो चला था.  

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