तहलका हिन्दी: ‘मुझे घिसट-घिसटकर चलते रहने की जरूरत नहीं है.’ ‘मुझे घिसट-घिसटकर चलते रहने की जरूरत नहीं है.’ ================================================================================ Sanjay Dubey on 19/08/09 09:10:00 सेंट्रल लंदन की एक गली के किनारे पर काले रंग की एक मर्सेडीज आकर रुकती है. दरवाजा खुलता है और सचिन तेंदुलकर बाहर निकलते हैं. न किसी तरह की भीड़भाड़ न बॉडीगार्डस. वे फोन पर बात करते हुए फुटपाथ पर टहलते हैं मगर कोई क्रिकेट के इस जीनियस की तरफ ध्यान तक नहीं देता. उनका पहनावा ऐसा है कि न जानने वाला उन्हें कोई आम कामकाजी आदमी ही समझे. तेंदुलकर कहते हैं, ‘ऐसे कुछ और भी डरावने पल रहे हैं मगर वो तो सबसे बुरा था. भीड़ काबू से बाहर हो गई थी और लग रहा था जैसे पुलिस पर्याप्त नहीं है. बहुत से लोग मेरे नजदीक आना चाहते थे.’ गर्मियों का मौसम है और व्यस्त गली में इधर-उधर टहलते तेंदुलकर धूप और इस दुर्लभ गुमनामियत का लुत्फ उठा रहे हैं. बाकियों के लिए ये सैर रोजमर्रा की बात हो सकती है मगर उनके लिए ये अलग ही तरह का आनंद है. वे कहते हैं, ‘मुझे यहां अच्छा लगता है. मैं जो भी करना चाहूं उसके लिए यहां पर ज्यादा आजादी है और बाहर निकलने और घूमने-फिरने में भी कोई समस्या नहीं होती. मेरे लिए ये एक अलग ही अनुभव है. मेरी निजता में कोई बाधा नहीं पड़ती जो बहुत अहम चीज है. मैं यहां पार्क में जाकर आराम से सैर कर सकता हूं.’ जब उनके साथी खिलाड़ी ट्वेंटी-20 विश्व कप खिताब की जंग लड़ रहे थे तो तेंदुलकर भी यहां थे. मगर उनका मकसद दूसरा था. वे लंदन स्थित घर में अपने परिवार के साथ समय बिताने आए थे. यहां उन्होंने बहुत से अलग तरह के काम किए : क्रिकेट दर्शक की भूमिका में देखा, विंबलडन के फाइनल और रोजर फेडरर के अद्भुत रिकॉर्ड के गवाह बने, आइसलैंड की यात्रा कर वहां की ठंड देखी, नौ साल के बेटे अर्जुन को लॉर्ड्स पर नेट प्रैक्टिस के लिए ले गए और कैमरों की फ्लैशलाइट्स के बिना सिनेमा और खाने का भरपूर लुत्फ भी उठाया. मैं उनसे पूछता हूं कि क्या वे इनमें से कोई भी चीज मुंबई में कर सकते हैं तो वे हंसते हैं. फिर सवाल पर हैरान होते हुए से कहते हैं, ‘नहीं, नहीं, वहां मैं ऐसा कुछ नहीं कर सकता. वहां मैंने लंबे समय से ये सब नहीं किया है और शायद अब में ये दोबारा कर भी नहीं पाऊंगा.’ उनकी बात में कुछ भी गलत नहीं. भारत में तेंदुलकर का दर्जा भगवान से कम नहीं. उनकी हर बात पर करोड़ों लोगों की नजर रहती है. टीवी, अखबार, होर्डिंग्स..हर जगह उनकी मौजूदगी है. तेंदुलकर कई साल पहले की उस घटना को याद करते हैं जब वे एक सार्वजनिक आयोजन में शिरकत करने के लिए बैंगलोर गए थे. उनके आने की खबर तेजी से फैल गई थी और देखते ही देखते उस जगह पर करीब 7000 लोगों की भीड़ इकट्ठा हो गई थी जिसपर काबू करने के लिए करीब 200 पुलिसवालों को खासी मशक्कत करनी पड़ी थी. जैसा कि तेंदुलकर कहते हैं, ‘ऐसे कुछ और भी डरावने पल रहे हैं मगर वो तो सबसे बुरा था. भीड़ काबू से बाहर हो गई थी और लग रहा था जैसे पुलिस पर्याप्त नहीं है. बहुत से लोग मेरे नजदीक आना चाहते थे. ये सिर्फ उनका प्यार था मगर इससे मैं और दूसरे लोग घायल हो सकते थे.’ ऐसा दोबारा न हो इसलिए तेंदुलकर अब मुश्किल से ही घर के बाहर निकलते हैं. और जब वो ऐसा करते हैं तो पूरी तरह से बदले हुए होते हैं. जैसा कि वे कहते हैं, ‘कभी-कभी ऐसा हुआ है कि मैं टोपी, चश्मा, दाढ़ी और विग लगाकर घर से बाहर निकला हूं ताकि कोई पहचान न ले. वैसे इसमें मुझे थोड़ा सा मजा भी आया. एक बार तो ऐसा हुआ कि मेरा चश्मा गिर गया और कुछ लोगों ने मुझे पहचान भी लिया.’ तेंदुलकर ने एक बार कहा भी था कि संतुष्ट होना ऐसा ही है कि जैसे आप किसी कार के हैंडब्रेक खींच दें और इसके चलते जाने की उम्मीद करें तेंदुलकर को ड्राइविंग बेहद पसंद है. वे कहते हैं, ‘मुझे सुबह पांच बजे ड्राइविंग करना अच्छा लगता है जब सड़कें खाली होती हैं और भीड़ से घिर जाने का खतरा भी नहीं होता. मैं गाड़ी ज्यादा तेज नहीं चलाता, बस 25 मील की रफ्तार रखता हूं और आरामदायक संगीत सुनता हूं. इस दौरान मेरे साथ कोई नहीं होता. मुझे बस अकेला रहना अच्छा लगता है.’ तेंदुलकर आज यहां कान्वेंट गार्डन स्थित ओपस स्टोर तक आए हैं. वजह है उनके ऊपर आने वाली एक किताब का प्रचार जिसका नाम है तेंदुलकर ओपस. 800 पन्नों की इस करीब 30 किलो वजनी किताब में तेंदुलकर के करिअर की समूची कहानी होगी. उनके अलावा सिर्फ डियेगो मेरेडोना ही ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्हें ये सम्मान मिला है. थोड़ी ही देर में तेंदुलकर को एक प्रेस कांफ्रेंस करनी है. जहां ये होनी है वह एक बड़ा सा हाल है जिसमें उनकी विशाल तस्वीरें लगी हैं. शुरुआत एक नर्स द्वारा उनकी लार का नमूना लेने से होती है. इससे उनका डीएनए प्रोफाइल तैयार होगा जो तेंदुलकर ओपस का हिस्सा बनेगा. तेंदुलकर काफी मेहनत से इस बात को स्पष्ट करने की कोशिश करते हैं कि ओपस का मतलब ये नहीं है कि उनका करिअर अब खत्म होने जा रहा है. वे स्पष्ट करते हैं कि 36 साल का हो जाने के बावजूद उन्होंने अपने रिटायरमेंट के लिए कोई समयसीमा तय नहीं की है. जैसा कि वे कहते हैं, ‘मैंने इसके बारे में बिल्कुल भी नहीं सोचा है. मैं आज भी अच्छा खेल रहा हूं इसलिए मैं अभी कुछ और वक्त तक खेलता रहूंगा. मैं आज भी इससे पहले जैसा ही प्यार करता हूं. मेरे लिए ये रोजी-रोटी भी है और जुनून भी. ये मुझे आनंद देता है. क्रिकेट मेरे दिल में बसता है.’ ब्रैडमैन कहते थे कि तेंदुलकर को खेलता देख उन्हें अपने दिनों की याद आ जाती है. ब्रैडमैन की आदर्श टीम में आधुनिक युग का सिर्फ एक ही खिलाड़ी था जो तेंदुलकर थे टेस्ट और एकदिवसीय क्रिकेट में सबसे ज्यादा रन और दोनों ही संस्करणों में सबसे ज्यादा शतकों के साथ तेंदुलकर निर्विवादित रूप से इस खेल के सर्वकालिक महान खिलाड़ियों में से एक हैं. 2002 में विजडन ने भी लिखा था कि खेल के समूचे इतिहास में सिर्फ सर डोनल्ड ब्रैडमैन ही उनसे बेहतर होने का दावा कर सकते हैं. फिर भी उनमें भूख बाकी है. वे अपने खाते में और ज्यादा उपलब्धियां जोड़ना चाहते हैं. तेंदुलकर ने एक बार कहा भी था कि संतुष्ट होना ऐसा ही है कि जैसे आप किसी कार के हैंडब्रेक खींच दें और इसके चलते जाने की उम्मीद करें. जैसा कि वे कहते हैं, ‘मैंने जो किया है मैं अब भी उससे खुश नहीं हूं. सुनील गावस्कर ने मुझसे कहा है कि मुझे 15000 रनों के आंकड़े के पार जाना होगा और अगर मैंने ऐसा नहीं किया तो वे मुझसे नाराज हो जाएंगे. मैं उनका बहुत बड़ा प्रशंसक हूं और इतने सारे रन झोली में होना एक बड़ी उपलब्धि होगी. मगर मेरा मकसद सिर्फ ये ही नहीं है. 2011 का विश्व कप जीतना भी है.’ अपने टेस्ट और एकदिवसीय क्रिकेट करिअर की उम्र बढ़ाने के लिए तेंदुलकर ने ट्वेंटी-20 अंतर्राष्ट्रीय मैचों में नहीं खेलने का फैसला किया है. इस बारे में वे कहते हैं, ‘मुझे लगा कि मैं टीम की कमजोर कड़ी हो जाता. मैं ऐसा नहीं कर सकता था. खेल के इस संस्करण में खुद-के टिक पाने को लेकर मुझे शंका थी. अगर मेरा शरीर इतना मजबूत नहीं कि मैं पूरे टूर्नामेंट में हिस्सा ले सकूं तो ऐसी हालत में मैं नहीं खेल सकता था.’ उम्र के 36 पड़ाव पूरे कर लेने के बाद क्या ऐसा लगता है कि शरीर साथ नहीं दे रहा? थोड़ी देर सोचने के बाद तेंदुलकर कहते हैं, ‘नहीं, ये अब भी मेरा साथ देता है मगर चूंकि मैं अब 36 का हो चुका हूं तो ये अब अलग तरह से होता है. मुझे पहले से ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है. कुछ मौके आते हैं जब मैं कोई चीज करने की कोशिश करता हूं और ये नहीं होती. मगर ऐसा मेरी उम्र की वजह से नहीं होता. मैं हर वक्त दर्द से जूझते हुए खेलता हूं. पिछले तीन महीनों से मैं टूटी हुई उंगली के साथ खेलता रहा. मगर आप जानते हैं कि दर्द सहने लायक है या नहीं और ज्यादातर वक्त मैं ऐसा कर सकता हूं.’ आगे जोड़ते हुए वे कहते हैं, ‘मैं अब भी वह कर सकता हूं जो 25 साल की उम्र में करता था. मगर अब शरीर में बदलाव आ रहे हैं. जब ऐसा होता है तो आपको अपनी सोच में भी बदलाव लाना पड़ता है. मुझे भी अपनी सोच बदलनी पड़ी. अब मैं कम जोखिम लेता हूं.’ कुछ सालों से तेंदुलकर ने अपनी शैली में बदलाव कर लिया है. अब वे ज्यादा संभलकर खेलते हैं. मगर उनका प्रदर्शन पहले जैसा ही शानदार है. पिछले डेढ़ साल के दौरान 52.11 का औसत इसका सबूत है. पिछले साल उन्होंने एक ऐसी पारी भी खेली जिसे वे अपनी सबसे महान पारी मानते हैं, चेन्नई में इंग्लैंड के खिलाफ खेली गई 103 रनों की पारी जो उन्होंने मुंबई हमले के बाद खेली थी. फिर भी खेल से जुड़े कुछ लोग कहते हैं कि तेंदुलकर में अब पहले जैसी बात नहीं रही. इनमें से एक ऑस्ट्रेलिया के पूर्व कोच जॉन बुकानन भी हैं जिनका कहना था कि तेंदुलकर शॉर्ट और तेज गेंदबाजी के सामने सहजता महसूस नहीं करते. इस बारे में पूछने पर तेंदुलकर के चेहरे पर उखड़ने वाले भाव आते हैं मगर फिर वे जोर से हंसते हुए कहते हैं, ‘ये सिर्फ उनका विचार है. जरूरी नहीं कि जॉन बुकानन जो भी बात कहें वह सही हो. अगर मुझे शॉर्ट गेंदों से दिक्कत होती तो मैं अब भी रन नहीं बना रहा होता. शायद उन्हें अपनी राय बदलने की जरूरत है. नहीं तो दुनिया के सभी गेंदबाजों के साथ कोई दिक्कत है जो वे मुझे इतने रन बनाने दे रहे हैं.’ दो दशक तक अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट खेलते हुए रनों का इतना अंबार लगा देने के पीछे क्या राज है? इस सवाल के जवाब में तेंदुलकर कहते हैं, ‘इसका राज है स्थिर रहना और गेंदबाज की क्रिया पर प्रतिक्रिया देना. इसके मायने मानसिक और शारीरिक, दोनों तरह की स्थिरता से हैं. ये अहम है कि आपका दिमाग बहुत सारे विचारों से भरा न हो क्योंकि ऐसे में आपकी प्रतिक्रिया धीमी हो जाएगी. आपको अपना दिमाग खाली रखना होता है. सबसे मुश्किल है अपने दिमाग को साफ रखना. दिमाग हमेशा या तो बीते कल में रहना चाहता है या फिर आने वाले कल में. मैं सबसे अच्छी बल्लेबाजी तब करता हूं जब मेरा दिमाग वर्तमान में होता है. मगर ऐसा अपने आप नहीं होता. आपको इसके लिए अभ्यास करना पड़ता है. हालांकि मैं भी ऐसा हर बार तो नहीं कर पाता मगर जब आप ऐसा कर लेते हैं तो आपको गेंदबाज और गेंद के अलावा कुछ और नहीं दिखता. आपको अपनी सहजवृत्ति को काम करने देना होता है. विश्वास कीजिए. आपकी सहजवृत्ति 99 फीसदी मौकों पर सही साबित होती है. मगर जैसे-जैसे मेरी उम्र बढ़ रही है वैसे-वैसे मुझे ये भी अहसास हो रहा है कि अच्छी बल्लेबाजी के लिए आपका सांस लेने का तरीका भी कितना अहम है. मेरा मतलब ये है कि अगर आप अपनी सांस पर ध्यान केंद्रित करें तो आप बल्लेबाजी करते हुए खुद को सहज बना सकते हैं.’ तेंदुलकर के मुताबिक जब उनके लिए क्रिकेट को अलविदा कहने का वक्त आ जाएगा तो वे तुरंत ही चल देंगे. जैसा कि वे कहते हैं, ‘जब सही वक्त आएगा तो मुझे अहसास हो जाएगा. मुझे घिसट-घिसटकर चलने की जरूरत नहीं है.’ और उसके बाद क्या करेंगे इसके जवाब में तेंदुलकर कहते हैं, ‘मैं खेल के साथ ही किसी तरह से जुड़ा रहना चाहूंगा.’ मगर बिना क्रिकेट खेले क्या उन्हें जिंदगी अजीब नहीं लगेगी? तेंदुलकर जवाब देते हैं, ‘ये सोचकर बड़ा डर लगता है. बचपन से ही ये मेरी जिंदगी का अभिन्न हिस्सा रहा है. ये मुश्किल होगा. मैं बहुत लंबे समय से खेल रहा हूं. मुझे पता है कि आखिरी गेंद के बाद भी मैं सोच रहा होऊंगा कि काश सिर्फ 10 गेंदें और खेलने को मिल जातीं. मगर आपको आगे बढ़ना होता है.’ ब्रैडमैन कहते थे कि तेंदुलकर को खेलता देख उन्हें अपने दिनों की याद आ जाती है. ब्रैडमैन की आदर्श टीम में आधुनिक युग का सिर्फ एक ही खिलाड़ी था जो तेंदुलकर थे. क्या तेंदुलकर भी किसी के बारे में ऐसा सोचते हैं? इस सवाल के जवाब में वे कहते हैं, ‘मैं कहूंगा कि वीरेंद्र सहवाग मेरी शैली के सबसे ज्यादा नजदीक हैं.’ जब तेंदुलकर आखिरकार क्रिकेट को अलविदा कहेंगे तो खेल का स्वरूप क्या होगा? उन्होंने टेस्ट और एकदिवसीय क्रिकेट में खूब नाम कमाया मगर अब टी-20 तेजी से लोकप्रिय हो रहा है. खुद तेंदुलकर भी आईपीएल में मुंबई इंडियंस के कप्तान हैं. वे कहते हैं, ‘टेस्ट क्रिकेट के खत्म होने का सवाल ही पैदा नहीं होता. ट्वेंटी-20 क्रिकेट खाने के बाद मीठे जैसा है. सिर्फ मीठा ही कौन खाना चाहेगा? टेस्ट क्रिकेट खाने जैसा है जिसमें हर तरह के व्यंजन हैं और इसके बाद ही ट्वेंटी-20 जैसा मीठा अच्छा लगता है.’ मगर क्या उन्हें ट्वेंटी-20 क्रिकेट के बढ़ते प्रभाव से चिंता नहीं होती? इस सवाल के जवाब में तेंदुलकर कहते हैं, ‘मैंने क्रिकेट छह साल की उम्र में टेनिस की बॉल से खेलना शुरू किया. इसलिए नहीं कि मैं अरबपति बनना चाहता था बल्कि इसलिए क्योंकि मुझे खेल से लगाव था. हो सकता है कि 10 साल में हालात ऐसे हो जाएं कि लोग क्रिकेट सिर्फ पैसे के लिए खेलने लगें. मगर पैसा सिर्फ संयोग से आना चाहिए. लगाव और जुनून सबसे अहम चीजें हैं. मुझे रनों की चिंता होती है, अनुबंधों की नहीं.’ पाकिस्तान में श्रीलंकाई टीम पर हुए आतंकी हमले और मुंबई हमले से भी तेंदुलकर चिंतित हैं. उनके मुताबिक आतंकवाद से क्रिकेट को खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है. वे कहते हैं, ‘श्रीलंकाई टीम के साथ जो हुआ उससे मुझे काफी धक्का लगा. मेरा हमेशा से सोचना था कि खिलाड़ियों को छोड़ दिया जाएगा और हमें निशाने पर नहीं लिया जाएगा.’ तो क्या अब वे कभी भी पाकिस्तान के दौरे पर सुरक्षित महसूस करेंगे? ‘ये फैसला मैं नहीं कर सकता. पूरी जांच-परख के बाद ये फैसला सरकार पर निर्भर करता है.’ तेंदुलकर कहते हैं. यानी सरकार का फैसला काफी होगा. इसके जवाब में वे कहते हैं, ‘शायद, हां.’ स्टोर में आए हुए तेंदुलकर को कुछ घंटे हो चुके हैं. एक छोटा सा ग्रुप जिसमें ज्यादातर भारतीय छात्र हैं बाहर जमा हो गया है. वे खिड़कियों से मास्टर ब्लास्टर की फोटो लेने की कोशिश कर रहे हैं. वे हक्के-बक्के रह जाते हैं जब अचानक ही तेंदुलकर उनसे मिलने बाहर निकल आते हैं और उन्हें ऑटोग्राफ देते हुए आगे बढ़ जाते हैं. उनके साथ दरवाजे पर खड़े होने वाले दो गार्ड हैं जिनके साथ फोटो खिंचवाने के लिए वे कॉन्वेंट गार्डन में जा रहे हैं. उनके पीछे-पीछे एक फोटोग्राफर भी है. मगर पहले की तरह अब भी उन पर कोई ध्यान नहीं दे रहा और तेंदुलकर को यही अच्छा भी लग रहा है.