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ऑफ साइड के देवता की दीनता

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बोरिया मजूमदार मानते हैं सौरव गांगुली के बढ़िया खेल का मजा केवल फ्लैशबैक में ही लिया जा सकता है

पिछली सदी की संध्या बेला में जब मैच-फिक्सिंग के जिन्न ने भारतीय क्रिकेट पर अपनी काली छाया डाली थी तो लगा था मानो इस खेल के प्रति भारतीयों के नशे को लकवा मार गया हो. भारतीय क्रिकेट ऐसी अंधेरी सुरंग में प्रवेश कर गया था जिसका कोई अंत ही नहीं दिखता था. एक ही झटके में क्रिकेटर नायक से खलनायक बन गए थे और क्रिकेट छूत का रोग हो गया था. प्रायोजक बिकाऊ मसाले की तलाश में ‘कौन बनेगा करोड़पति’ का दामन थामने लगे थे और खेल का अस्तित्व ही संकट में दिखने लगा था. इसी समय भारतीय क्रिकेट की मंझधार में फंसी नाव को पार लगाने के लिए सौरव गांगुली के रूप में एक खेवनहार का उदय हुआ.

सौरव गांगुली भी मुंबई इंडियन्स के साथ अपने निर्णायक मुकाबले में शून्य पर आउट हो गए. सवाल ये है कि एक प्रशंसक के तौर पर क्या हमें उनसे कहना चाहिए कि अब बल्ला छोड़ने का वक्त आ गया है?

आज भी उन्हें देश का सफलतम कप्तान माना जाता है जिसने देश के बाहर भी भारत की जीत के दयनीय रिकॉर्ड को चुनौती दी. 2001 के बसंत में गांगुली ने अपने घरेलू मैदानों पर सफलता के आसमान में उड़ रही ऑस्ट्रेलियाई टीम की नकेल कसने का चमत्कार दिखाया तो इतिहास में पहली बार 2004 में पाकिस्तान को उसी की सरजमी पर शिकस्त दी. उनकी छत्रछाया में मंझ कर तैयार हुए हरभजन सिंह, वीरेंद्र सहवाग और जहीर खान जैसे खिलाड़ी आज भी क्रिकेट के हर संस्करण में देश की ताकत बने हुए हैं. इतनी सफलताएं गांगुली को देश के प्रतिष्ठित क्रिकेटरों की सूची में शामिल करवाने के लिए पर्याप्त हैं.

सवाल उठता है कि हमारे लिए सौरव गांगुली क्या मायने रखते हैं? एक बात तो साफ है कि सौरव गांगुली, सचिन तेंदुलकर नहीं हैं. दरअसल सचिन तो अतुलनीय हैं और क्रिकेट में कोई दूसरा सचिन पैदा भी नहीं होगा. उनके उलट सौरव पैदाइशी महान खिलाड़ी नहीं हैं. कभी ऐसा नहीं हुआ कि उनके आउट होने पर पूरा देश स्तब्ध रह गया हो. इसके बावजूद वे एक बेहद खास क्रिकेटर हैं. कोलकाता के लिए वे भगवान हैं. उन्होंने बंगाली क्रिकेट को एक नई धार, नई ऊर्जा दी जिसकी लंबे समय से जरूरत महसूस की जा रही थी. उन्होंने हमें ये पाठ सिखाया कि हम दुनिया की सर्वश्रेष्ठ टीमों को भी मात दे सकते हैं. गांगुली से कोलकाता कभी असफल होने की उम्मीद ही नहीं करता. इसलिए जब गांगुली असफल होते हैं तो पूरे शहर को सदमा सा लग जाता है. जब-जब ये शख्स अपनी जिम्मेदारियों से चूकता है तो पूरा शहर अवाक रह जाता है.

पर अब हमें ये सच्चाई मान लेनी चाहिए कि गांगुली ने आईपीएल के दूसरे सत्र में सबको निराश किया है. टूर्नामेंट आधा बीतते-बीतते सौरव गांगुली की नाइट राइडर्स अकेली ऐसी टीम थी जो सेमीफाइनल की दौड़ से बाहर हो चुकी थी. ये किसी भी टीम का आईपीएल टूर्नामेंट में अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन था. टूर्नामेंट के बचे हुए हिस्से में नाइट राइडर्स की लड़ाई सिर्फ इस लक्ष्य तक सिमट गई कि वो सबसे फिसड्डी टीम न साबित हो. एक ऐसा अंत जिसकी गांगुली ने न तो कल्पना की होगी और जो न उनकी काबिलियत के साथ न्याय करेगा.

दक्षिण अफ्रीका के लिए रवाना होने के वक्त तमाम विवादों के बाद उनकी प्रतिबद्धता के बारे में जब मैंने उनसे पूछा था तो उनका जवाब था, ‘सौ बात की एक बात, मेरी अपनी प्रतिष्ठा है और मैं नाइट राइडर्स के प्रति प्रतिबद्ध भी हूं. मैं बढ़िया प्रदर्शन की उम्मीद कर रहा हूं.’ जब मैंने उनसे पूछा कि क्या ये टूर्नामेंट अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में उनकी वापसी का जरिया है तो उन्होंने अपने परिचित अंदाज में जवाब दिया, ‘मेरे लिए हर मंच एक चुनौती है. 2005 में टीम से निकाले जाने के बाद भी मैंने वापसी की और बढ़िया प्रदर्शन किया. ये मेरी प्रतिष्ठा का सवाल है. मुझे इसे बनाए रखना है.’ दुर्भाग्य से वे ऐसा करने में सफल नहीं रहे हैं और एक जमाने में उन्होंने जो प्रतिष्ठा कमाई थी वह अब खत्म होने लगी है.

ज्यादातर कोलकातावासियों के लिए गांगुली ऐसे विरले खिलाड़ी हैं जिसमें प्रतिभा और अनुशासन दोनों का समागम है. बंगाल के लिए खेल कर गांगुली हम कोलकातावासियों पर ऐहसान कर रहे थे कहा जाता है कि समय सदा अच्छा नहीं रहता. महान सर डोनल्ड ब्रैडमैन भी अपनी अंतिम पारी में शून्य पर आउट हुए थे. सौरव गांगुली भी मुंबई इंडियन्स के साथ अपने निर्णायक मुकाबले में शून्य पर आउट हो गए. सवाल ये है कि एक प्रशंसक के तौर पर क्या हमें उनसे कहना चाहिए कि अब बल्ला छोड़ने का वक्त आ गया है? गांगुली उन लोगों में से हैं जिनके पास जवाब हमेशा तैयार रहे. हाल के दिनों में कई बार सवाल खड़े किए गए कि क्या गांगुली आज भी उतने ही बढ़िया खिलाड़ी हैं. इस तरह के सवालों को कुछ साल पहले तक उनकी एक बढ़िया पारी के बाद किनारे रख दिया जाता था और उनके प्रशंसक आलोचकों को ये कह कर निशाना बनाते थे कि उनके देवता पर जान-बूझकर कीचड़ उछाला जा रहा है. बुकैनन द्वारा मैकल्लम को कप्तान बनाने के फैसले के बाद कोलकाता में हुआ विरोध प्रदर्शन गांगुली की लोकप्रियता को साबित करता है.

ज्यादातर कोलकातावासियों के लिए गांगुली ऐसे विरले खिलाड़ी हैं जिसमें प्रतिभा और अनुशासन दोनों का समागम है. बंगाल के लिए खेल कर गांगुली हम कोलकातावासियों पर ऐहसान कर रहे थे. उनके आखिरी रणजी ट्रॉफी मैच पर नजर डालिए. वे पहले ही अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट से रिटायर हो चुके थे. इसके बाद भी बंगाल क्रिकेट एसोसिएशन ने उनसे रणजी टीम की कप्तानी करने का आग्रह किया ताकि टीम निचली पायदान से ऊपर उठ सके. उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया और उनकी 69 रनों की पारी ने बंगाल को फिर से रणजी के इलीट जोन में पहुंचाने में मदद की. जब ऐसे प्रतिभाशाली खिलाड़ी को मुंबई इंडियंस के खिलाफ मैच में जहीर खान की गेंद पर खुद का ही शॉट गच्चा दे दे तो लाखों प्रशंसकों को दुख तो पहुंचेगा ही. उनमें शुरुआत में अविश्वास का भाव जगता है और फिर ये गुस्से में तब्दील हो जाता है. गांगुली के धुर प्रशंसक तक मुंबई मैच के बाद ये मानने को मजबूर हो गए हैं कि संन्यास की घोषणा करके ही सौरव अब अपने प्रशंसकों और खुद के साथ न्याय कर पाएंगे.

एक बार फिर से उस क्षण पर नजर डालते हैं - जहीर खान की बाहर की ओर जाती हुई गेंद सौरव गांगुली के बल्ले का अंदरूनी किनारा लेती हुई ऑफ और मिडिल स्टंप उड़ा ले गई. गांगुली ने ये शॉट काफी देर से खेला था. उनका बल्ला 60 अंश के कोण पर था और उनके पैर एक इंच भी हिले नहीं. दुख की बात ये भी है कि अगर वे उस गेंद को नहीं छेड़ते तो बॉल वाइड करार दी जाती. बाहर जाती गेंद को स्टंप में घसीट लाने वाला ये उनके पूरे करियर का सबसे घटिया शॉट था. एक पल को सौरव ने पिच पर इस तरह से निगाह डाली मानो पिच ने कोई अनपेक्षित कारनामा कर दिया हो और फिर वे वापस पैवेलियन की तरफ लौट पड़े जो शायद उनके लिए सबसे भारी कदम रहे होंगे. शून्य में ताकती निगाहें और झटके में सिर हिलाना उनकी मन:स्थिति को दिखा रहा था. मैच के बाद उन्होंने कुछ नहीं कहा. जबकि उनकी 13 सालों की मेहनत पर खड़ी चमकदार विरासत सवालों के घेरे में है. आलोचक कह सकते हैं कि वे अपना रेशमी स्पर्श खो चुके हैं. बॉल और स्टंप के बीच टकराव का वो पल कोलकातावासियों के लिए किसी भूकंप सरीखा रहा.

अगर आप पुराना सौरव गांगुली चाहते हैं तो अपने वीडियो का रिवर्स बटन दबाइए. उनका सर्वश्रेष्ठ अब सिर्फ फ्लैशबैक में ही देखने को मिलेगा. ये जितना कटु है उतना ही सत्य. लांस आर्मस्ट्रॉन्ग ने कहा था, ‘जब मैं बीमार था तो मरना नहीं चाहता था. जब मैं दौड़ लगा रहा था तब मैं हारना नहीं चाहता था. मरना और हारना एक ही बात है.’ दुनिया के सबसे बेहतरीन साइकिल चालक के ये शब्द गांगुली के क्रिकेटीय दर्शन को सबसे बेहतर तरीके से परिभाषित करते हैं. फिर भी मैं चाहूंगा कि आखिरी बार वे फिर से खड़े हों और मुझे गलत साबित कर दें. आखिरकार वो मेरे सबसे पसंदीदा खिलाड़ी थे और हमेशा रहेंगे.

मजूमदार क्रिकेट इतिहासकार हैं 

Comments (2 posted):

मित्रवर on 27/05/09 07:28:23
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मजुमदार साहब क्रिकेट के अछे और जानेमाने इतिहासकार हैं किन्तु सौरव गांगुली पर लिखे इस लेख पर अगर नज़र डालें तो ऐसा लगता है की वो शायद आज क्रिकेट जगत को ही भूल गये हैं| जब आप किसी भी विषय पर लिखते हैं तो सबसे पहले तो ज़रूरी है की आप उस विषय की पूरी तरह से जानकारी रखें| किन्तु मुझे बड़े अफसोस के साथ कहना पद रहा है की आपने यहाँ जो भी बातें लिखी है उनसे यह बात सपष्ट हो रही है की आपने आई पी एल २ को अछि तरह से देखा ही नहीं|

जनाब सौरव गांगुली पर सवाल उठाने से पहले शायद आपने ये नहीं देखा की जिन लोगों के साथ वो आई पी एल २ में खेल रहे थे वो तो एक टीम ही नहीं थी| वहां तो बस अपने बर्चशव्व की लड़ाई लड़ रहे कुछ क्रिक्केटर नज़र आ रहे थे| और कोल्कता की टीम तो बस आई पी एल २ के ख़त्म होने के इंतज़ार में थी| खेल का या फिर किसी भी लड़ाई का सबसे पहला नियम होता है मिलजुलकर और एक टीम बनाकर, एक साथ खेलना, जो की यहाँ इस टीम में था ही नहीं| और जब यह एक टीम ही नहीं थी तो किसी भी चुनौती से लड़ना संभव ही नहीं था| हाँ ये बात मैं आपकी मानता हूँ की गांगुली अब पहले जैसा नहीं खेल पा रहे| पर फिर गांगुली ही क्यों, सचिन, सहवाग, द्रविड़, किसी ने भी इतना अच्छा प्रदर्शन नहीं किया आई पी एल २ में| जबकि बाकी सभी टीमो में तो कोल्कता जैसा कोई लडाई झगडा भी नहीं चल रहा था|

अत: आपसे मेरा अनुरोध है की जब आप किसी के बारे में भी लिखें और ख़ास कर तहलका में, तो इस बात का ध्यान रखें की आपकी बात बहुत से लोगों तक पहुँच रही है| और किसी भी अधूरी बात के आधार पर कृपया इस तरह की टिप्पणी न करें|

धन्यावाद|

आपका प्रिय
मित्रवर
http://mitravar.blogspot.com
omprakash on 10/06/09 03:52:16
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पता नहीं ऐसा क्यों है कि दादा को बार बार अपने को साबित करना पड़ा है। जहां सचिन एक अच्छी पारी के बाद चाहे पांच पारियों तक कुछ न करे उनके आभामंडल में फर्क नहीं आता ये बात दादा पर कभी लागु नहीं होती। किस्मत की बात कर नहीं सकता क्योंकि उसमें विश्वास नहीं, लेकिन कुछ तो है जो सौरभ को इतनी उपलब्धियों के बाद भी हाशिए पर खड़ा करती है। लाॅर्डस् में जब उन्होंने अपनी कमीज़ लहराई तो मेरा सीना को कम से कम चौड़ा तो हो ही गया था....धन्यवाद दादा।
ओमप्रकाश दास
agniveena.blogspot.com
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