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खान का वही पुराना बखान : माय नेम इज खान

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फिल्म समीक्षा

फिल्म माय नेम इज खान

निर्देशक करण जौहर

कलाकार शाहरुख खान, काजोल, युवान, जरीना वहाब, जिमी शेरगिल

यदि ऐसा होता कि अच्छी बातों और अच्छे अभिनय वाली फिल्म को ही अच्छी फिल्म कहा जा सकता तो हम भी माय नेम इज खान को महान फिल्म बता देते, मगर उसमें कई साफ-साफ दिखने वाली कमियां हैं और चाहकर भी हमारा ध्यान उनसे नहीं हट पाता. जैसे शाहरुख के चरित्न रिजवान खान को ऐसी बीमारी है, जिसमें वह पीला रंग देखकर डर जाता है, मगर किसी-किसी दृश्य में करण साहब को यह याद नहीं रहता. शाहरुख ने बहुत मेहनत की है और उनकी जगह कोई थोड़ा भी कम अच्छा अभिनय करता तो फिल्म का भगवान ही मालिक था. जहां तक काजोल की बात है तो उन्होंने जिस मंदिरा को जिया है, वह कभी तो बहुत शालीन और समझदार है और कभी बेवजह अतार्किक और बेवकूफ. वह औरत, जो एक बीमार गैर-मजहबी आदमी से इसलिए शादी कर लेती है कि वह उससे बहुत प्यार करता है, बाद में धुर चरमपंथी धर्म संगठनों की तरह बात करने लगती है. साथ ही फिल्म समाज की सेवा करने और उसे बदलने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ओढ़ लेती है और अमेरिका के गांवों में जाने के चक्कर में बार-बार वह अपनी राह से भटक जाती है.

यह अच्छी बात है कि करण जौहर पहली बार आलीशान महलों से बाहर निकले हैं और उन्होंने बाहरी दुनिया की भूख और गरीबी देखने की जहमत उठाई है. मगर यह उतनी अच्छी बात नहीं है कि फिर भी उन्हें अपना देश नहीं दिखाई दिया. उन्हें एनआरआई दर्शकों को ही लुभाना था इसलिए अमेरिका की समस्याओं में झांकने की जरूरत थी. क्योंकि भारत के मुसलमानों के सामने तो पहचान से जुड़े संकट हैं ही नहीं और न ही भारत में कोई चक्रवातों से मरता है. भारत में गाने गाते हुए नाचा जाता है और शादियां की जाती हैं, इसीलिए हमारे फिल्मकार समस्याएं ढूंढ़ने अमेरिका जैसे आपदाग्रस्त देश में बार-बार जाते हैं. आधी फिल्म न्यूयॉर्क से उठाई गई है, जिसकी प्रेरणा पाकिस्तानी फिल्म खुदा के लिए थी. हमारे फिल्मकारों के पास विचारों का जो अकाल है, उसे माय नेम इज खान अपनी चिर परिचित भव्यता के साथ दिखाती है और क्लासिक कहे जाने के लिए गिड़गिड़ाती-सी है. करण चाहते हैं कि उनके सरोकारों के लिए आप उनकी पीठ ठोकें और बहुत-से लोग ठोक भी रहे हैं.

गौरव सोलंकी 

Comments (6 posted):

chandan pandey on 18/02/10 02:48:19
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bahut sateek review
mujhe film bahut bekar lagi
Sabyasachi Mishra on 19/02/10 04:15:31
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You cannot make a film for Indian viewers, whose story is based in USA. we need local issues and we have. Wonderful review.
Vicky G on 23/02/10 01:05:45
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इस फ़िल्म की ऐसी ही निर्मम समीक्षा की ज़रूरत थी. अगर प्रवचन और सदुपदेशों के आधार पर किसी रचना को महान घोषित किया जाए, तो आसाराम बापू और उनके जैसे बहुत से साधू-संतों के वीडियो को अवार्ड मिलने चाहिए. बिकाऊ मीडिया जिस हिसाब से शाहरुख और उनकी फ़िल्म को महान घोषित कर रहा है, उससे मीडिया की विश्वसनीयता ही खत्म हो रही है. अच्छा हुआ कि तहलका वाले कोई फ़िल्म अवार्ड नहीं देते. वरना शाहरुख खान आपके अवार्ड फ़ंक्शन में भी ज़रूर नाचते और आपको मज़बूरी में उनकी फ़िल्म को महान घोषित करना पडता. इस समीक्षा से यह भी ज़ाहिर होता है कि आपको "दोस्ताना" नामक बीमारी नहीं है. :-D
Dnesh on 23/02/10 03:50:26
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अच्छा हुआ जो ये फिल्म नहीं देखी, मुझे शाहरुक की फ़िल्में फूंक-फूंक कर जाने की आदत है और अब जब ये साफ है कि इसे देखने से अच्छा किसी भिकारी को समोसे खिला दूँ.. तो में ऐसा ही करूंगा.
Vimal Chandra Pandey on 26/02/10 09:35:52
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Ek bahut satahi nazariye se dekhi gayi samasya pe isase achha kaam kiya bhi nahi ja sakta. Samasya Karan ke nazariye me hai aur Shahrukh ki achhi acting karne ki baar baar ki koshish me hai. Film kahin kahin itne bure tarike se khijhati hai ki sar peet lene ka man karta hai jaise....sharukh ka 9/11 ke baad tribute ceremony pe achanak safed libas me soorah fataeh padhna, aur bhi bahut hain, jaise kajol ka achanak cheekhte hue president se milne ko kehna kyonki ye karan ko bahut achha idea laga hoga........
abdullah on 04/03/10 06:11:54
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फिल्म देखने के बाद इस मुहावरे का कोई अर्थ नहीं रह जाता कि ‘कोई भी मजहब आतंकवाद का समर्थन नहीं कर सकता’ या ‘आतंकवादी का कोई मजहब नहीं होता।’

पूरा विश्व आजकल मुस्लिम जेहादी मानसिकता से आतंकित है। एक पांथिक व्यवस्था के रूप में ‘इस्लाम’ सर्वाधिक चर्चित विषय है। भारत में भी इस्लाम को समझने और इसके साथ तालमेल बिठाने का प्रयत्न लोग अपने-अपने ढंग से लगातार करते रहे हैं।
आतंकवादी है नहीं, माना सारी कौम।

सभी जिहादी क्यों मगर, सिर्फ एक ही कौम।
सिर्फ एक ही कौम, बनी क्यों रामविरोधी
बाबर क्यों हीरो है, क्यों यह गाय विरोधी।
कह ‘साधक’ कविराय, प्रश्न से बचना मुश्किल,
इसका उत्तर कर दे, कई समस्याओं का हल मुमकिन।
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