सिद्धार्थ- द प्रिजनर : महानगरीय सांचे में ढली नीतिकथा
बचपन में पंचतंत्र की कहानियां सुनकर बड़ी हुई हिंदुस्तानी जनता के लिए सिद्धार्थ-द प्रिजनर की कहानी अपरिचित नहीं है. लालच बुरी बला का पाठ हम सभी ने सीखा है. इस तरह की कहानियों को हम नीति कथाएं कहते हैं. सिद्धार्थ और मोहन की कहानी एक ऐसी ही नीति कथा का मल्टीप्लेक्सीय संस्करण है जो अपना रिश्ता ऋग्वेद और बुद्धनीति से जोड़ती है. फिल्म के मुख्य किरदार के नाम सिद्धार्थ में भी यही अर्थ ध्वनि व्यंजित होता है. कहानी की सीख है : इच्छाएं ही इंसान के लिए सबसे बड़ा बंधन हैं.
मैंने यह फिल्म पिछले साल ओशियंस में देखी थी जहां रजत कपूर को इस फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला था. ऑन पेपर इस फिल्म का मूल प्लॉट हिंदी सिनेमा इतिहास में आई थ्रिलर फिल्मों में सबसे आकर्षक था. कुछ ही समय पहले जेल से रिहा हुए और अब अपनी जिंदगी नए सिरे से शुरू करने की कोशिश में लगे लेखक सिद्धार्थ रॉय की नई किताब की इकलौती पांडुलिपि सायबर कैफे चलाने वाले मोहन के रुपयों से भरे ब्रीफकेस में बदल जाती है. सिद्धार्थ अपनी किताब को लेकर बेचैन है वहीं मोहन की जान उस रूपयों से भरे ब्रीफकेस में अटकी है जो अब सिद्धार्थ के पास है.
आगे इस कहानी में प्यार, रोमांच, धोखा, लालच. झूठ और मौत सभी कुछ है. लेकिन इस चमत्कारी प्लॉट के बावजूद कुछ है जो अटका रह जाता है. थ्रिलर होते हुए भी फिल्म अंत में आपके ऊपर एक उदासी का साया छोड़ जाती है. थ्रिलर होने के नाते शुरुआत में आपको फिल्म की रफ्तार धीमी लग सकती है. लेकिन इच्छाओं के पीछे भागती जिस जिंदगी की व्यर्थता को दर्शाने की कोशिश फिल्म कर रही है उस तक पहुंचने के लिए यह कारगर हथियार है. जेल से छूटने के बाद सिद्धार्थ की रिहाइशगाह के दृश्य मन में कभी न उगने के लिए डूबते सूरज का सा प्रभाव छोड़ते हैं. मेरे लिहाज से फिल्म औसत से एक पायदान ऊपर खड़ी है. ये सिनेमाहॉल से चाहे अनपहचानी ही निकल जाए पर आने वाले वक्त में हमारे धीरे-धीरे विशाल होते डीवीडी संग्रह का हिस्सा जरूर बन सकती है. विज्ञापन जगत से आए प्रयास गुप्ता के लिए सबसे बड़ी तारीफ है. लेकिन अदाकारी में कमाल किया है हैपीडेंट व्हाइट फेम सचिन नायक ने. फिल्म की उदासी उनकी भूमिका से ही सबसे बेहतर व्यंजित होती है. कह सकते हैं कि फिल्म जिंदगी की कतरन है जो बात तो छोटी कहती है लेकिन पूरी साफगोई से कहती है.
मिहिर पंड्या




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