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शहनाई के छंदों की कहानी

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ये पुस्तक बिस्मिल्ला खां से हुई बातचीत और मुलाकातों का एक गुलदस्ता है, जिसे शब्दों में ढालने का महती कार्य किया है यतींद्र मिश्र ने

पुस्तक :     सुर की बारादरी

लेखक :     यतींद्र मिश्र

कीमत :     99 रुपए

प्रकाशक:     पेंगुइन बुक्स

हालांकि लेखक यतीन्द्र मिश्र कहीं भी ऐसा दावा नहीं करते और वे इसे बिस्मिल्ला खां की कला और उनके व्यक्तित्व को अपनी छोटी सी भेंट भर मानते हैं, फिर भी सुर की बारादरी पेंग्विन की जीवनी श्रंखला की पुस्तक है. जीवनियों की अक्सर खासियत होती है कि वे अपने नायक को इतना महान मान लेती हैं कि उनके बचपन की आम घटनाएं भी किशोर पत्निकाओं के प्रेरक प्रसंगों वाला स्तम्भ भरने के काम आ सकती हैं. कुछ अपेक्षाकृत अधिक तटस्थ जीवनियां कुछ अँधेरे कोनों पर से भी पर्दा उठाती हैं. यदि सुर की बारादरी के आकार को हम भूल भी जाएं और उम्मीद करें कि बिस्मिल्ला खां साहब से मुलाकातों के आधार पर लिखी गई यह किताब, जीवनी जैसी कुछ हो सकती है तो भी इसमें ऊपर लिखी दूसरी विशेषता तो है ही नहीं. यह आपके सामने कोई रहस्य नहीं खोलती और ऐसी ही कुछ बातें और यादें आपके साथ बांटती है, जिनकी बिस्मिल्ला खां के स्तर के किसी भी फ़नकार से आप अपेक्षा करते होंगे. चलिए, इसे निबंधों का एक संकलन मान लेते हैं. तब भी ये इतने आदर से भीगे हैं (वैसे यदि आप बिस्मिल्ला खां पर लिख रहे हैं तो यह स्वाभाविक भी है) कि आप आसानी से लेखक की निष्पक्षता को चुनौती दे सकते हैं. मगर अपनी विषयवस्तु में पारंपरिक होते हुए भी ये निबंध अपनी भाषा और शैली में इतने नए और स्वतंत्न हैं कि कहीं कविता जैसे हो जाते हैं, कहीं कहानी जैसे और कहीं अचानक सिर्फ साक्षात्कार बन जाते हैं. यतीन्द्र दशकों पुरानी बातें वर्तमान काल में लिखने लगते हैं और तब चौदह साल के अमीरुद्दीन का रसूलनबाई के कोठे की सीढियों पर बैठकर संगीत की वर्णमाला सीखना किसी दिलचस्प कहानी सा रसीला हो जाता है. किताब की खास बात यह है कि यह अपनी सीमायें नहीं बनाती और न ही क्रम से घटनाएं सुनाती है. अध्यायों का आकार भी निश्चित नहीं है और प्रवाह में बहते हुए कहीं अनीस के मर्सिए बीच में आ जाते हैं और कहीं कबीर के दोहे. बीच में एक फ़कीर चला आता है, जो अमीरुद्दीन को आशीर्वाद देता है, ‘बजा, बजा, जा बेटा मजा करेगा- बजा!और फिर बिस्मिल्ला खां की शहनाई अपने सुरों से दुनिया जीतती चली जाती है.

सन सैंतालीस की पंद्रह अगस्त को आंसुओं में भीगे बिस्मिल्ला लालकले पर राग काफ़ी बजाते हैं और यह सब बताते हुए यतीन्द्र कोशिश करते हैं कि वे भी एक सुर से दुसरे सुर तक बिना टूटे जा सकें. यही बिस्मिल्ला खां का भी सर्वाधिक सशक्त पक्ष था और इस तरह यतीन्द्र अपने नायक की शैली में ही उसकी कथा लिखते हैं. यतीन्द्र यादों को ईमानदारी से क्रमबद्ध करने की कोशिश में थे और वे सफल भी रहे हैं. हां, इस चक्कर में कई बातों का दोहराव जरूर हुआ है क्योंकि यादें फिल्टर होकर नहीं आती, गड्ड-मड्ड होकर ही आती हैं. बिस्मिल्ला खां अपना पूरा काम बनारस और परवरदिगार को

इस तरह समर्पित कर गए हैं और लेखक भी उसमें कोई अवरोध नहीं डालता इसलिए कहीं-कहीं लगता है कि यह पुस्तक संगीत और अध्यात्म के संबंध पर तो नहीं है. आप संगीत का ककहरा जानते हैं तो इस किताब का ज्यादा आनंद ले सकते हैं और नहीं जानते, तो भी पढ़ सकते हैं. कुछ-कुछ जान जायेंगे.

गौरव सोलंकी

Comments (1 posted):

तरुण गुप्ता on 09/10/09 06:31:31
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मैंने अभी तक यह किताब नहीं पढ़ी है. इसलिए तुम्हारी समीक्षा के बारे में कुछ कहने में संकोच हो रहा है होना भी चाहिए. लेकिन हाँ तुमने किताब को पढने की दिलचस्पी ज़रूर पैदा कर दी है.
खैर पुस्तक समीक्षा पढने से पहले तुम्हारी फिल्म समीक्षाएं पढ़ी बहुत अच्छा लगा फिल्म के बारे में तुम्हारी ईमानदारी को देखके. ख़ुशी हुई कि तुम फिल्म में(को) ईमानदार आँखों को(से) देखते हो. औरों के मुकाबले(हालांकि उनके फिल्म को देखने के टूल्स(नजरिया) अलग है) तुम्हारी सिनेमा में ईमानदारी की तलाश ज्यादा भाती है मुझे .
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