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नियुक्ति बनी नाक का संकट

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वे कौन-से सवाल हैं जिनका अनुत्तरित रहना मध्य प्रदेश में लोकायुक्त नियुक्ति प्रक्रिया को संदिग्ध बना रहा है, बता रहे हैं बृजेश सिंह

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उनके साथ 2007 में जुड़ा और अब खत्म हो चुका डंपर प्रकरण सरकार की छीछालेदर करने वाली दूसरी बड़ी वजह बन जाएगा. प्रकरण यह था कि चौहान की पत्नी श्रीमती साधना सिंह ने तब कर्ज लेकर कुछ डंपर खरीदे थे लेकिन मुख्यमंत्री के आय-व्यय के ब्योरे में उनका जिक्र नहीं था. साथ ही इन डंपरों के पंजीयन से जुड़ी कथित अनियमितताएं भी सामने आई थीं. अब शिवराज सिंह पर यह आरोप लग रहा है कि डंपर प्रकरण से निकलने के लिए उन्होंने कई नियमों को ताक पर रखकर लोकायुक्त पीपी नावलेकर की नियुक्ति करवाई जिन्होंने बाद में मुख्यमंत्री को डंपर प्रकरण में पाक-साफ करार दे दिया. नावलेकर की लोकायुक्त के पद पर नियुक्ति को कई कारणों के आधार पर अनुचित एवं असंवैधानिक ठहराया जा रहा है. फिलहाल यह मामला हाई कोर्ट में पहुंच चुका है.

2009 में नावलेकर की लोकायुक्त पद पर हुई नियुक्ति के बाद से अब तक उनके चयन की वैधानिकता को लेकर सत्तारूढ़ दल भाजपा एवं विपक्षी पार्टी कांग्रेस के बीच छिटपुट तकरार तो देखी जा रही थी, लेकिन हाल ही में वरिष्ठ कांग्रेसी नेता एवं प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के बयान के बाद यह मामला भाजपा सरकार के लिए गले की फांस बनता दिख रहा है. कुछ समय पहले ही भोपाल स्थित पार्टी कार्यालय में दिग्विजय सिंह का कहना था, 'मुझे लोकायुक्त पर कोई भरोसा नहीं है. नावलेकर ने पुख्ता प्रमाणों के होने के बावजूद डंपर प्रकरण में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह और उनकी पत्नी साधना सिंह को क्लीनचिट दी.' पूर्व मुख्यमंत्री ने तो लोकायुक्त की नियुक्ति को लेकर पूर्व नेता प्रतिपक्ष स्वर्गीय जमुना देवी के हस्ताक्षर, जिन्हें राज्य सरकार नावलेकर को नियुक्त करने के संबंध में जमुना देवी की सहमति मानती थी, की सत्यता पर भी संदेह व्यक्त किया. इसके बाद से ही पार्टी ने भाजपा के खिलाफ सदन से लेकर सड़क तक हल्ला बोलना शुरू कर दिया. इसी बीच मध्य प्रदेश के पूर्व डीजीपी एवं पूर्व आईजी लोकायुक्त अरुण गुर्टू तथा प्रयत्न  संस्था के अजय दुबे ने सर्वोच्च न्यायालय में मामले को लेकर जनहित याचिका दायर कर दी. हालांकि कुछ समय बाद ही अदालत ने दोनों को इस मामले में उच्च न्यायालय जाने का आदेश दिया.

उधर, भाजपा सरकार लोकायुक्त नियुक्ति मामले को विपक्ष द्वारा जबर्दस्ती उठाया हुआ एक मुद्दा बताते हुए इसमें मुख्यमंत्री की भूमिका नकार रही है. लेकिन बीते साल में सूचना का अधिकार (आरटीआई) के तहत हासिल किए गए दस्तावेज बताते हैं कि नावलेकर की नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े ऐसे कई सवाल हैं जो उनकी कथित ईमानदार नियुक्ति को संदिग्ध बनाते हैं.

दूसरे उम्मीदवार कौन थे?

22 जून, 2009 को प्रदेश के तत्कालीन लोकायुक्त रिपुसूदन दयाल का कार्यकाल समाप्त होने वाला था. इसलिए सरकार ने नये लोकायुक्त के चयन की प्रक्रिया शुरू की. आरटीआई से हासिल किए गए दस्तावेज बताते हैं कि 18 जून को जबलपुर उच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एके पटनायक ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को इस संबंध में एक पत्र भेजा था. इसमें जस्टिस पटनायक ने पूर्व में मुख्यमंत्री से फोन पर हुई बात का जिक्र किया जिसमें दोनों के बीच नये लोकायुक्त के चयन को लेकर चर्चा हुई थी. पत्र में पटनायक ने पीपी नावलेकर का उल्लेख करते हुए लिखा है कि बाकी योग्य लोगों के बीच वे इस पद के लिए सबसे योग्य हैं.

जस्टिस पटनायक के इसी पत्र से विवाद, संदेह और कलह की शुरुआत होती है. सवाल यह है कि नये लोकायुक्त की नियुक्ति के लिए सरकार ने किसी पैनल का गठन क्यों नहीं किया. अरुण कहते हैं, 'इतने बड़े और महत्वपूर्ण पद पर नियुक्ति के लिए जरूरी था कि सरकार जजों के नामों का एक पैनल तैयार करती, जिसमें से एक नाम रिकमेंड होता. यहां तो एक ही नाम आया, एक ही नाम पर चर्चा हुई और उसे फाइनल कर दिया गया.'
जानकारों के मुताबिक लोकायुक्त की नियुक्ति के संबंध में जो प्रक्रिया अन्य राज्यों में अपनाई जाती है उसमें सबसे पहले लोकायुक्त पद के लिए योग्यता रखने वाले लोगों का एक पैनल बनाया जाता है. फिर उसी पैनल में से चीफ जस्टिस और नेता प्रतिपक्ष से विचार-विमर्श करके उस व्यक्ति को लोकायुक्त चुना जाता है जो सबसे योग्य होता है.  लेकिन यहां यह देखने में आया कि सरकार ने एक ही नाम तय किया, उसे आगे बढ़ाया और अंत में उसे फाइनल कर दिया.

क्या प्रतिपक्ष की नेता से उचित प्रक्रिया के तहत सहमति ली गई थी?

इसे विपक्ष द्वारा जबर्दस्ती उठाया गया मुद्दा बताते हुए सरकार इसमें मुख्यमंत्री की भूमिका नकार रही है

अपने पत्र में जस्टिस पटनायक ने लोकायुक्त की नियुक्ति के लिए प्रतिपक्ष की नेता से ' कंसल्ट ' करने की बात लिखी थी. लोकायुक्त की नियुक्ति नेता प्रतिपक्ष और राज्य के चीफ जस्टिस से परामर्श के बाद करने का प्रावधान है. उस समय जमुना देवी इंदौर के एक अस्पताल में भर्ती थीं. 25 जून, 2009 को मुख्यमंत्री तरफ से उन्हें एक फैक्स भेजा गया. इसमें जानकारी दी गई थी कि लोकायुक्त रिपुसूदन दयाल का कार्यकाल 22 जून, 2009 को समाप्त हो गया है और मुख्य न्यायाधीश ने इस पद पर जस्टिस पीपी नावलेकर की नियुक्ति का परामर्श दिया है. ऐसे में वे (जमुनादेवी) पूर्व में हुई उनसे (शिवराज सिंह चौहान) चर्चा का स्मरण करें और नावलेकर को नियुक्त किए जाने के संबंध में अपना परामर्श दें. उसी तारीख को रात में उस पत्र के निचले हिस्से पर 'प्रस्ताव अनुमोदित' लिखकर और जमुना देवी के हस्ताक्षर व 22-6-09 की दिनांक के साथ वह पत्र वापस सरकार के पास आ गया. इसी पत्र को राज्य सरकार जमुना देवी की सहमति के रूप में प्रस्तुत करती है.

नियुक्ति के इस चरण पर कई तरह के गंभीर आरोप लगे हैं. कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव एवं पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह जमुना देवी के हस्ताक्षर को फर्जी ठहरा रहे हैं तो साथ में एक बड़ा प्रश्न यह भी है कि जो व्यक्ति आईसीयू में भर्ती है, जिसे कैंसर है, जो हाइपरटेंशन से जूझ रहा है, क्या वह इतने गंभीर विषय पर सोच-विचार कर सकता है. इस संबंध में सरकार ने बार-बार यह कहा कि जमुना देवी स्वस्थ थीं और निर्णय ले पाने में सक्षम थीं. ऐसे में यह सवाल भी खड़ा होता है कि अगर वे स्वस्थ और सक्षम थीं तो उन्हें बैठक में आमंत्रित क्यों नहीं किया गया. सरकार इस बारे में यह भी कहती है कि जमुना देवी के स्वस्थ होने और इस प्रक्रिया में उनकी सहमति का प्रमाण यह है कि 29 जून को लोकायुक्त के शपथ ग्रहण समारोह में वे शामिल थीं. इससे स्पष्ट है कि वे पीपी नावलेकर के लोकायुक्त पद पर चयन से सहमत थीं. अगर ऐसा नहीं होता तो फिर उन्होंने विरोध किया होता. इस पर पूर्व डीजीपी अरुण गुर्टू कहते हैं, 'उस दौरान जमुना देवी ऑल्टर्ड सेंसोरियम से पीड़ित थीं. यानी एक ऐसी अवस्था जिसमें पीड़ित कोई तार्किक निर्णय ले पाने में अक्षम होता है. ऐसी गंभीर मानसिक और शारीरिक अवस्था में प्रतिपक्ष की नेता से सलाह मांगी गई.'

नियुक्ति में इतनी हड़बड़ी क्यों?

जमुना देवी से कथित परामर्श कर लेने और उनका कथित सहमति पत्र प्राप्त कर लेने के बाद अगले 24 घंटे में लोकायुक्त की नियुक्ति हो गई. 25 जून से लोकायुक्त की नियुक्ति संबंधित फाइल सामान्य प्रशासन विभाग से लेकर मुख्यमंत्री सचिवालय, राज्यपाल कार्यालय सहित छह प्रमुख टेबलों को 24 घंटे में ही पार कर गई. 26 जून को राज्यपाल ने पीपी नावलेकर की नियुक्ति संबंधी फाइल को हरी झंडी दे दी. 26 जून को ही गजट नोटिफिकेशन जारी हो गया और 29 जून को राज्यपाल बलराम जाखड़ ने नये लोकायुक्त को पद की शपथ दिला दी.

यहां यह उल्लेखनीय है कि 29 जून तत्कालीन राज्यपाल बलराम जाखड़ के कार्यकाल का अंतिम दिन था. अगले दिन से नये राज्यपाल रामेश्वर ठाकुर पद ग्रहण करने वाले थे.  परंपरा है कि राज्यपाल अपने कार्यकाल के अंतिम हफ्ते-दस दिन में बड़े फैसले नहीं लेते. यही वजह है कि इस पूरे मामले में राज्यपाल की भूमिका पर भी संदेह जताया जा रहा है. आलोचक कहते हैं कि राज्यपाल ने इस मामले में मुख्यमंत्री की इच्छा के अनुरूप काम किया. जानकार कहते हैं कि आवश्यकता के सिद्धांत तथा विशेष परिस्थितियों को देखते हुए राज्यपाल को खुद  इस मामले में पहल करनी चाहिए थी. जब वे जानते थे कि लोकायुक्त की नियुक्ति में मुख्यमंत्री का खुद का स्वार्थ निहित है यानी जिस लोकायुक्त का चयन मुख्यमंत्री करने जा रहे हैं वही लोकायुक्त संगठन उनके खिलाफ जांच कर रहा है तो ऐसे में राज्यपाल को खुद मामले में पहल करनी चाहिए थी. पूर्व में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने 'आवश्यकता के सिद्धांत' को मुख्य चुनाव आयुक्त बनाम सुब्रमण्यम स्वामी (1996) 4 एससीसी 104:   मध्य प्रदेश विशेष पुलिस स्थापना बनाम मध्य प्रदेश राज्य, (2004) 8 एससीसी 788:  जैसे कई मामलों में प्रतिपादित और स्वीकार किया है. इन मामलों से यह स्थापित हुआ कि ऐसी परिस्थिति में राज्यपाल लोकायुक्त चयन के मामले में अगर चाहते तो स्वतंत्रतापूर्वक निर्णय ले सकते थे.

बिजनेस रूल का उल्लंघन क्यों हुआ?

लोकायुक्त की नियुक्ति में सरकार द्वारा बिजनेस रुल के नियम सात भाग दो के अंतर्गत कही गई बातों को भी नजरअंदाज किया गया. बिजनेस रुल में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि लोकायुक्त की नियुक्ति संबंधी प्रस्ताव को सर्वप्रथम मंत्रिपरिषद के सामने लाना जरूरी है. उसके बाद ही प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सकता है. लेकिन इस मामले में मंत्रिपरिषद से कोई सलाह-मशवरा नहीं किया गया. नियुक्ति होने के करीब दो महीने बाद पहली बार 25 अगस्त, 2009 को कैबिनेट की बैठक में इस विषय को रखा गया. उसके बाद मंत्री परिषद ने इस पर अपनी सहमति दी. हालांकि बिजनेस रुल में यह प्रावधान है कि मुख्यमंत्री चाहे तो बिना मंत्री परिषद के सामने मामले को रखे ही नियुक्ति की प्रक्रिया आगे बढ़ा सकता है, लेकिन उसके लिए जरूरी है कि ऐसा तभी किया जाए जब ऐसा करना अति आवश्यक हो. लेकिन इस मामले में सरकार ने किसी प्रकार के अति आवश्यक कारण को स्पष्ट नहीं किया है. सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त किए गए दस्तावेजों में उस अति आवश्यक कारण का कहीं भी जिक्र नहीं है.

सरकार के प्रवक्ता नरोत्तम मिश्रा इस मामले पर कोई टिप्पणी न करने की बात कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं. लेकिन मसला जिस तरह से आगे बढ़ रहा है उससे लगता है कि यह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का पीछा इतनी जल्दी नहीं छोड़ने वाला.

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