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बेपरवाही में सवासेर

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पन्ना के बाघों से खाली होने के बाद मध्य प्रदेश से टाइगर स्टेट का दर्जा छिन गया है. एक के बाद एक तीन जांच कमेटियां कह चुकी हैं कि इसकी वजह अवैध शिकार है और जल्द ही कुछ किया जाए. लेकिन मध्य प्रदेश सरकार की नींद है कि टूटती ही नहीं. प्रियंका दुबे की रिपोर्ट

इस साल अप्रैल में बाघों की ताजा राष्ट्रीय जनगणना जारी हुई तो यह मध्य प्रदेश के लिए बड़ा झटका थी. पांच टाइगर रिजर्वों में फैले 300 बाघों की उपस्थिति के साथ सन 2004 तक प्रदेश भारत के 19 प्रतिशत बाघों का घर हुआ करता था. लेकिन ताजा गणना में यहां बाघों की संख्या सिर्फ 257 पाई गई और इस आधार पर प्रदेश का टाइगर स्टेट का दर्जा समाप्त कर दिया गया.

बाघों की संख्या में इस भारी गिरावट की वजह से प्रदेश भर के वन्य जीव संरक्षणवादियों के साथ-साथ आम लोगों की सवालिया निगाहें भी पन्ना टाइगर रिजर्व की तरफ ही उठीं. दरअसल सन 2005 तक पन्ना टाइगर रिजर्व में मौजूद बाघों की संख्या 30-35 के बीच में बताई जाती थी. लेकिन उसके बाद अवैध शिकार के चलते यहां हालात इतने बिगड़ गए कि वन्य प्रशासन ने 2009 में मान लिया कि पन्ना में अब एक भी बाघ नहीं है. जानकारों का मानना है कि प्रदेश में बाघों की जनसंख्या में आई इस भारी कमी के पीछे पन्ना टाइगर रिजर्व के सभी बाघों का अचानक गायब हो जाना एक महत्वपूर्ण कारण है.

पन्ना से बाघों के अचानक गायब हो जाने की इस गुत्थी को सुलझाने के सिलसिले में सबसे चौंका देने वाला हालिया खुलासा पन्ना टाइगर रिजर्व के क्षेत्रीय निदेशक आर श्रीनिवासमूर्ति की अति गोपनीय जांच रिपोर्ट उजागर होने से हुआ है. इस साल की शुरुआत में प्रदेश के मुख्य वन संरक्षक-वन्यजीव (पीसीसीएफ-वाइल्ड लाइफ) डॉ एचएस पाबला को सौपीं गई इस रिपोर्ट में बाघों के अवैध शिकार के लिए सीधे-सीधे खाल तस्करों और वन अधिकारियों के आपराधिक गठजोड़ को जिम्मेदार ठहराया गया है. रिपोर्ट के अनुसार सन 1989 से सन 2010 तक मारे गए कुल 19 बाघों में से छह तो अकेले 2005 में ही शिकार किए गए. पन्ना टाइगर रिजर्व के प्रशासन और आला वन अधिकारियों की कुख्यात खाल तस्करों से मिलीभगत की ओर इशारा करते हुए श्रीनिवासमूर्ति ने लिखा है, ' यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि वन विभाग के ढुलमुल रवैये की वजह से क्षेत्र के प्रभावी लोग बाघों के अवैध शिकार से जुड़े अपने दुष्कर्मों को छिपाने में कामयाब रहे. प्रशासन की चूकों और लापरवाही की वजह से इतने बाघों का अवैध शिकार हुआ. फॉरेस्ट गार्ड से लेकर एसडीओ तक, पन्ना टाइगर रिजर्व का प्रशासन इस आपराधिक कृत्य में सहभागी रहा है....'

छह महीने की जद्दोजहद के बाद वन्य जीव कार्यकर्ता अजय दुबे ने यह बहुप्रतीक्षित रिपोर्ट सूचना के अधिकार के तहत हासिल की है. तहलका के पास इस अति गोपनीय रिपोर्ट के साथ-साथ मामले से जुड़े तमाम दस्तावेजों की एक-एक प्रति मौजूद है.यह पहला मौका नहीं है जब पन्ना में बाघों की घटती संख्या पर कोई जांच समिति बनी हो और इसके लिए अवैध शिकार को जिम्मेदार ठहराया गया हो. 2007 में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) ने मध्य प्रदेश सरकार से पन्ना में बाघों की घटती संख्या की जांच सीबीआई से कराने की सिफारिश की थी. बाद में राज्य सरकार की उदासीनता को देखते हुए खुद एनटीसीए ने डॉ पीके सेन की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन कर दिया. सन 2009 में मामले पर अपनी रिपोर्ट जमा करते हुए इस कमेटी ने अवैध शिकार को ही बाघों की संख्या कम होने का मुख्य कारण बताया था. सेन कमेटी ने अपनी सिफारिशों में राज्य सरकार से इन मामलों की सीबीआई जांच कराने की अनुशंसा भी की थी. बाद में बस यह हुआ कि इस कमेटी की सिफारिशों के जवाब में राज्य सरकार ने एक नयी राज्य स्तरीय कमेटी बनाने की घोषणा कर दी. इस राज्य स्तरीय कमेटी ने फरवरी, 2010 में अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपी. इस रिपोर्ट में भी पन्ना में बाघों के विलुप्त हो जाने के लिए बाघों के अवैध शिकार और टाइगर रिजर्व में जारी सघन पर्यटन गतिविधियों को  जिम्मेदार बताया गया था. स्टेट कमेटी ने अपनी जांच में यह भी बताया कि बाघों का शिकार उनका जनसंख्या घनत्व बढ़ने,  नर बाघों के बीच अपने क्षेत्र को लेकर लड़ाई और शिकार की कमी के कारण उनके रिजर्व से बाहर निकलने की वजह से हुआ.

सन 2004 तक 30-35 बाघों का घर माने जाने वाले पन्ना टाइगर रिजर्व में 2009 तक सारे बाघ गायब हो गए

इन तमाम कमेटियों की सिफारिशों के बाद आई आर श्रीनिवासमूर्ति की अध्यक्षता में तैयार की गई पन्ना टाइगर इंटेलिजेंस सेल की यह जांच रिपोर्ट. पुरानी कमेटियों की सिफारिशों को सबूतों के साथ पुख्ता तौर पर पुष्ट करने वाली इस रिपोर्ट में सन 1989 से लेकर सन 2010 तक पन्ना में जारी अवैध शिकार का विस्तृत वर्णन है. रिपोर्ट के शब्दों में, 'चंद्रनगर रेंज के भूसोर और पल्कोहा सर्कल सन 1989 से ही भारी अवैध शिकार का केंद्र रहे हैं. सन 2005 में अवैध शिकार की छह घटनाएं इसी क्षेत्र में घटी थीं. छह में से पांच घटनाएं पन्ना टाइगर रिजर्व के अंदर हुई थीं पर उन्हें दर्ज नहीं किया गया. उल्टे फॉरेस्ट गार्ड से लेकर अनुभागीय अधिकारियों तक, पन्ना टाइगर रिजर्व के प्रशासन ने सक्रिय तौर पर सबूतों को मिटाने  और मामले को दबाने की कोशिश की. रिजर्व इन्फाॅर्मेशन सेल के प्रयासों के बावजूद सन 2010 और 2011 में 7-7 अवैध शिकारों (बाघ सहित दूसरे जानवर भी) की घटनाएं हुईं.'

अपने निष्कर्ष में मामले की स्वतंत्र जांच के लिए पन्ना टाइगर रिजर्व-हाई पावर स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम बनाने की सिफारिश करते हुए श्रीनिवासमूर्ति ने रिपोर्ट में लिखा है, 'अपराध के इस गठजोड़ में पन्ना टाइगर रिजर्व के कर्मचारियों से लेकर नई दिल्ली में संसारचंद जैसे बड़े खाल तस्कर, स्थानीय पारंपरिक शिकारी कबीले, स्थानीय जनजातियां, क्षेत्र के प्रभावशाली सामंत और मोहम्मद रईस-नवाब खान जैसे बिचौलियों तक सभी शामिल हैं...मामले में रिजर्व के फॉरेस्ट गार्ड से लेकर फील्ड डायरेक्टर स्तर तक के अधिकारियों से पूछताछ की जानी है...लेकिन यह सब मामले में फंस रहे अधिकारियों और एक बड़े प्रभावशाली तबके की आलोचना को आमंत्रित करेगा. इसलिए यह मुश्किल जांच एक फील्ड डायरेक्टर के स्तर पर संभव ही नहीं है. पन्ना टाइगर रिजर्व के पतन की बड़ी तस्वीर सामने लाने के लिए सरकार को तुरंत एक स्वतंत्र हाई पावर स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम बनानी चाहिए.'
गौरतलब है कि श्रीनिवासमूर्ति की जांच रिपोर्ट 20 स्वतंत्र गवाहों के रिकॉर्ड (आडियो और वीडियो) किए गए बयानों, मौलिक जब्ती मेमो, मुख्य शिकायत कार्यालय के दस्तावेजों, मौके से बरामद की गई हड्डियों, चंद्रनगर रेंज ऑफिस से बरामद किए गए दो मेटल ट्रैप जैसे सबूतों और अन्य जरूरी दस्तावेजों के आधार पर तैयार की गई है. रिपोर्ट के साथ डॉ पाबला को भेजी गई चिट्ठी में श्रीनिवासमूर्ति ने यह भी स्पष्ट किया है कि 2002 से 2007 के बीच का दौर बाघों के लिए बहुत खराब रहा. खास तौर पर मंडला सब-डिविजन और चंद्रनगर रेंज के अधिकारियों ने अवैध शिकार के मामलों को दबाने की कोशिश में उन्हें दर्ज ही नहीं किया. श्रीनिवासमूर्ति ने जांच को निष्पक्ष बनाए रखने के लिए दो रेंज अधिकारियों आरटी सनागो और आरके जायसवाल के तबादले की भी सिफारिश की है.

टाइगर स्टेट का दर्जा खो चुके मध्य प्रदेश के लिए यह दर्जा खोने से भी ज्यादा शर्मनाक बात यह है कि श्रीनिवासमूर्ति की जांच रिपोर्ट जमा होने के लगभग दस महीने के बाद भी सरकार और प्रशासन ने इस मामले में कोई ठोस कार्रवाई नहीं की है.सूचना के अधिकार के तहत जानकारियां जुटा कर बाघ संरक्षण की मुहिम चलाने वाले अजय दुबे तहलका को बताते हैं, ' पहले सरकार ने एनटीसीए की सिफारिशों को दरकिनार कर दिया. फिर अपनी खुद की स्टेट कमेटी की रिपोर्ट पर भी कोई कार्रवाई नहीं की और अब श्रीनिवासमूर्ति की रिपोर्ट को भी दबाने का प्रयास किया जा रहा है. वन मंत्रालय और वन विभाग के नौकरशाह इस मामले में कोई जांच शुरू ही नहीं होने देना चाहते. क्योंकि अगर जांच हुई तो कई बड़े नाम घेरे में आ जाएंगे.' अजय ने पन्ना टाइगर रिजर्व में बाघों के अवैध शिकार की सीबीआई जांच की मांग करते हुए जबलपुर हाई कोर्ट में एक याचिका भी दायर की थी. लेकिन कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि 'सीबीआई के पास बाघों के अवैध शिकार की जांच करने से बेहतर कई काम हैं.' हाई कोर्ट के निर्णय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने का मन बना चुके अजय कहते हैं, 'सरिस्का में तो लगभग 20 बाघों के ही गायब होने के मामले पर ही सीबीआई जांच हो गई थी. लेकिन पन्ना का मामला तो उससे भी बड़ा है. राज्य प्रशासन मामले को टालना चाहता है ताकि सबूतों के साथ फेरबदल किया जा सके. हमें लगता है सीबीआई ही इस मामले की निष्पक्ष जांच कर सकती है.'

श्रीनिवासमूर्ति रिपोर्ट पर सरकार और प्रशासन का रुख जानने के लिए जब वन अधिकारियों से लेकर वन मंत्रालय तक से संपर्क किया गया तो सभी जगह लापरवाही भरा रवैया देखने को मिला. एक ओर डॉ पाबला जहां अपने दफ्तर और फोन पर कई बार संपर्क करने के बाद भी उपलब्ध नहीं हो पाए. वहीं तहलका के पास मौजूद दस्तावेजों से यह पता चलता है कि उन्होंने 12 मई, 2011 को श्रीनिवासमूर्ति को लिखे एक पत्र में कुछ चुनिंदा अवैध शिकार के मामलों की जानकारी फिर से मंगवाई है. सूत्रों के मुताबिक श्रीनिवासमूर्ति को अपनी रिपोर्ट का पुनरावलोकन करके उसकी समीक्षा करने के लिए कहा गया है.

इस पूरे मामले में जब तहलका ने प्रदेश के वन मंत्री सरताज सिंह से प्रस्तावित हाई पावर स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम के गठन के बारे में पूछा तो उनका जवाब था, 'अभी तक मैंने श्रीनिवासमूर्ति की रिपोर्ट देखी नहीं है. इस बारे में मैं अभी कोई कमेंट नहीं कर सकता.' वनमंत्री के जवाब पर उंगली उठाते हुए अजय कहते हैं, 'मंत्रालय को मामले की पूरी जानकारी है. दस्तावेजों में मंत्री जी के दस्तखत भी हैं. और अगर इतनी संवेदनशील रिपोर्ट के आने के नौ महीने बाद भी वनमंत्री ने उसे नहीं देखा तो सवाल उनके नौकरशाहों पर भी उठता है. या तो उनके नौकरशाह उन्हें यह रिपोर्ट दिखाना नहीं चाहते या फिर उन्हें कोई परवाह नहीं है कि उनके जंगलों में बाघ क्यों मारे जा रहे हैं.'
इसके बाद तो आगे भी निराशा ही दिखती है.

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