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एक और साल बढ़ते सवाल

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अपनी लोकप्रिय छवि और लोकलुभावन योजनाओं के बूते शिवराज सिंह चौहान ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर छह साल पूरे कर लिए हैं. लेकिन अब उनके सामने कुछ ऐसी चुनौतियां भी हैं जिनसे यदि वे पार नहीं पाते तो उनके लिए 2013 के विधानसभा चुनाव की राह मुश्किल होगी. बृजेश सिंह का आकलन

सन 2003. मध्य प्रदेश विधानसभा के चुनाव होने वाले थे. भाजपा उमा भारती के नेतृत्व में दिग्विजय नीत कांग्रेस से मुकाबला करने को तैयार थी. उस समय यह सवाल खड़ा हुआ कि राघौगढ़ विधानसभा सीट से दिग्विजय सिंह के खिलाफ कौन चुनाव लड़ेगा. पार्टी ने तब विदिशा सीट से अपने सांसद को टिकट दिया. सभी जानते थे कि इस सीट से लड़ने वाले का नतीजा क्या होगा. हुआ भी वही. वह व्यक्ति चुनाव हार गया. लेकिन पार्टी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को धूल चटाने में सफल रही. भाजपा को भारी बहुमत मिला. 228 विधानसभा सीटों में से पार्टी ने 171 सीटों पर जीत दर्ज की और कांग्रेस सिर्फ 39 सीटें जीत पाई. भाजपा की इस जीत का संदेश सीधा था. जनता कांग्रेस के शासन से बुरी तरह त्रस्त थी और उससे किसी भी कीमत पर मुक्ति चाहती थी. इस जीत के साथ ही उमा भारती के नेतृत्व में भाजपा का लंबे समय से चल रहा राजनीतिक वनवास खत्म हो गया. उस समय किसी ने यह बात सपने में भी नहीं सोची थी कि समय का चक्र कुछ इस कदर घूमेगा कि जिसके नेतृत्व में पार्टी चुनाव जीतकर आई है वही उमा भारती अपनी पार्टी में सिर्फ चंद महीनों की मेहमान हैं. और वह शख्स जिसने पार्टी के कहने पर दिग्विजय सिंह के खिलाफ बलि का बकरा बनना स्वीकार किया, कुछ समय बाद राज्य के सबसे बड़े पद पर आसीन होगा और जिसे लोग मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान कहेंगे.

शिवराज सिंह की मुख्यमंत्री पद पर ताजपोशी स्वाभाविक नहीं वरन एक दुर्घटना का परिणाम थी. उमा के मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद प्रदेश की कमान बाबूलाल गौर के हाथों में सौंपी गई. उमा भारती के विपरीत यहां बाबूलाल गौर के पद से हटने के कोई बड़े कारण नहीं थे लेकिन वे ज्यादा दिन तक मुख्यमंत्री की गद्दी नहीं संभाल पाए. अंततः पार्टी ने तत्कालीन प्रदेशाध्यक्ष शिवराज सिंह चौहान को प्रदेश के मुखिया का पद सौंप कर सत्ता उन्हीं के हाथों में केंद्रित कर दी. मध्य प्रदेश में भाजपा के लिए शुरुआती दो साल (जिनमें प्रदेश की जनता ने तीन मुख्यमंत्री देखे) ' हनीमून पीरियड' की तरह रहे, जहां गलतियों के लिए जनता से माफी की उम्मीद की जा सकती थी. हालांकि बाद के तीन साल में ऐसी गुंजाइश धीरे-धीरे घटती गई और इसी के साथ मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में भाजपा भी मजबूत होती गई. इन सालों में जहां पार्टी 2008 का विधानसभा चुनाव फिर से जीती वहीं शिवराज पार्टी के सबसे लोकप्रिय चेहरे के रूप में स्थापित हुए. इसी 29 नवंबर को मुख्यमंत्री के रूप में अपने छह साल का कार्यकाल पूरा कर रहे शिवराज सिंह इन सालों में काफी मजबूत होकर उभरे हैं लेकिन इस नये कार्यकाल में उनके सामने कुछ नयी चुनौतियां भी साफ-साफ दिख रही हैं. प्रदेश कांग्रेस अब 2003 वाली कमजोर पार्टी नहीं है. धीरे-धीरे ही सही मजबूत हो रहे विपक्ष का एक सीधा संदेश यह है कि 2013 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश की जनता शिवराज को वॉकओवर देने की मनोदशा में नहीं होगी. प्रदेश में अपनी पार्टी की पहचान बन चुके मुख्यमंत्री का तटस्थ आकलन उनकी उपलब्धियों और असफलताओं के आधार पर ही किया जाएगा. यहां हम शिवराज सिंह चौहान के छह साल के कार्यकाल सामने आईं उन चुनौतियों की चर्चा कर रहे हैं जिनसे यदि वे पार नहीं पाते तो उनके लिए 2013 का किला फतह करना उतना आसान होगा.

शासन अपना, प्रशासन सपना

पिछले छह साल से मुख्यमंत्री बने रहने के बावजूद भी शिवराज की आज प्रशासन पर उतनी पकड़ नहीं दिखती जितनी होनी चाहिए थी. इसका सबसे अच्छा उदाहरण पिछले दिनों तब देखने को मिला जब रीवा में मलेरिया से दर्जनों बच्चे मर गए लेकिन मुख्यमंत्री को कानों कान खबर नहीं हुई. अखबार में खबर पढ़कर उन्हें इसका पता चला. इस मामले को लेकर उनकी हैरानी इन शब्दों में अखबारों की हेडिंग बनी ' रीवा में मलेरिया से बच्चे मर रहे हैं और मुझे खबर तक नहीं.' जानकार मानते हैं कि शिवराज सिंह की यही कमी उन्हें एक बेहतर राजनेता बनने से रोकती है. इस में कोई दोराय नहीं कि वे जनता के बीच लोकप्रिय हैं, जनता की नब्ज को पहचानते हैं. लोगों से जुड़ने के लिए जो व्यक्तित्व होना चाहिए वह उनमें है लेकिन एक राजनेता बनने के लिए जो प्रशासनिक दक्षता चाहिए वह उनमें नदारद दिखती है. इसी आधार पर वे अपने समकालीनों से पिछड़ जाते हैं. भाजपा के एक नेता कहते हैं, ' शिवराज भी नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार की तरह एक लोकप्रिय मुख्यमंत्री हैं. लेकिन जैसी पकड़ प्रशासन पर मोदी और नीतीश की है वैसी यहां नहीं दिखती.'

जानकार मानते हैं कि शिवराज धीरे-धीरे नौकरशाह आधारित मुख्यमंत्री होते जा रहे हैं. इस मामले पर राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई का मानना है, ' इस सरकार को भी वही नौकरशाह चला रहे हैं जो दिग्विजय सिंह के काल में थे. ऐसे में अगर मुख्यमंत्री खुद प्रशासन को कंट्रोल नहीं करते हैं तो फिर स्थिति बिगड़ती ही जानी है. शिवराज सिंह की प्रशासनिक कमजोरी हर साल प्रदेश में होने वाली जूनियर डॉक्टरों की हड़तालों में भी दिखती है. इन डॉक्टरों की हड़ताल से हर साल लोग मरते हैं लेकिन सालों से चली आ रही इस समस्या का सरकार अब तक कोई इलाज नहीं ढूंढ़ पाई है.' पार्टी के एक पूर्व नेता कहते हैं, ' शिवराज सिंह प्रदेश और विकास को उसी चश्मे से देख रहे हैं जिसे नौकरशाहों ने उन्हें पहनाया है. इसी कारण हर दिन छोटे से लेकर बड़े अधिकारियों के भ्रष्टाचार (पैसे और संपत्ति के अलावा भी) की खबरों से अखबार रंगे रहते हैं. अरविंद जोशी और टीनू जोशी का उदाहरण सामने हैं. मुख्यमंत्री की नाक के नीचे काम करने वाले इन अधिकारियों ने कैसे करोडों–अरबों की अवैध संपत्ति बना ली. पटवारी से लेकर हर छोटे बडे अधिकारी के यहां आए दिन पड़ने वाले छापों में करोड़ों से कम की संपत्ति निकलती ही नहीं.'

भाजपा की तरफ से शिवराज सिंह को कोई संकट दिखेगा तो संघ का अंधानुकरण उनकी मजबूरी बन जाएगा

प्रशासनिक अक्षमता की एक बानगी इसे भी समझा जा सकता है कि बिजली, सड़क और पानी के जिन मुद्दों पर दिग्विजय सिंह को हराकर भाजपा सत्ता में आई, उस दिशा में भी कोई उल्लेखनीय सुधार आठ साल के दौरान दिखाई नहीं दे रहा है. हाल में राज्य सरकार प्रदेश की जनता के बीच यह संदेश देने के लिए कि उसने कितने अच्छे काम किए हैं, एक विकास यात्रा पर निकलना चाहती थी. लेकिन विधायकों और संगठन कार्यकर्ताओं  से यह फीडबैक मिलने के बाद कि बिजली, खाद न मिलने की वजह से अभी किसानों सहित बाकी जनता में काफी नाराजगी है, सरकार को यात्रा रद्द करनी पड़ी. सड़कों की स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लालकृष्ण आडवाणी की जनचेतना यात्रा के मध्य प्रदेश में आने से पूर्व जल्दी-जल्दी में उन रास्तों को दुरुस्त किया गया जहां से रथ गुजरना था.जहां तक लॉ ऐंड ऑर्डर बात है तो इस मोर्चे पर सरकार के प्रदर्शन का अंदाजा आप इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले दो साल से प्रदेश बलात्कार के मामले में पहले स्थान पर है. दलितों पर अत्याचार के मामले में प्रदेश पूरे भारत में दूसरे स्थान पर है. साथ ही दूसरे राज्यों की पुलिस के मुकाबले प्रदेश पुलिस के खिलाफ सबसे ज्यादा शिकायतें हैं. बच्चों के खिलाफ अपराध में भी मध्य प्रदेश अव्वल है. अनुसूचित जातियों, जनजातियों को प्रताड़ित करने के मामले में भी पूरे भारत में प्रदेश ने बाकियों को पीछे छोड़ा हुआ है. इसके अलावा स्वास्थ्य के मानकों पर प्रदेश सरकार की मशीनरी बेकाम साबित हुई है. मध्य प्रदेश में 60 फीसदी से अधिक बच्चे कुपोषित हैं. आए दिन खंडवा और शिवपुरी आदि इलाकों से बच्चों के कुपोषण से मरने की खबरें आती रहती हैं. जहां तक किसानी की बात है तो सरकार ने खुद इस बात को स्वीकार किया है कि प्रतिदिन चार किसान आत्महत्या कर रहे हैं. ये सारे आंकड़े वह आईना हैं जिसमें प्रदेश सरकार के 'स्वर्णिम मध्य प्रदेश' का चेहरा बदसूरत नजर आता है. जानकार मानते हैं कि हालत ऐसे ही रहे तो प्रदेश वापस दिग्गी युग में लौट जाएगा और शिवराज सिंह से बेहतर यह कोई नहीं समझ सकता कि इस स्थिति में उनकी पार्टी और उन्हें क्या नतीजा देखने को मिलेगा.

...ताकि पैर जमे रहें

शिवराज किन परिस्थितियों में मुख्यमंत्री बने इसका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है. उस घटनाक्रम का छिपा अर्थ यह है कि पार्टी ने एक ऐसे शख्स को सीएम बना दिया जिसके मुख्यमंत्री बनने के बारे में किसी ने मजाक में भी कल्पना नहीं की थी. खैर, वे मुख्यमंत्री बने तो पार्टी के नेताओं ने उन्हें स्वीकार कर लिया, लेकिन धीरे-धीरे शिवराज की बढ़ती लोकप्रियता ने पार्टी में उनके विरोधियों की भी फौज खड़ी कर दी. हालांकि ऊपरी तौर पर पार्टी में सब कुछ ठीक दिखाई दे रहा है. लेकिन सतह के नीचे का उबाल गाहे-बगाहे दिख ही जाता है. शिवराज से नाराज चल रहे ये वे लोग हैं जिन्हें ये आशा थी कि देर-सवेर शिवराज एक असफल मुख्यमंत्री साबित होंगे और पार्टी फिर उन्हें मौका देगी. कुछ समय तक यह पीड़ा छिपी रही लेकिन अब इन नेताओं को यह लग रहा है कि मध्य प्रदेश में भी पार्टी गुजरात की तर्ज पर चल रही है. अर्थात नरेंद्र मोदी की तरह ही प्रदेश में शिवराज सिंह सर्वेसर्वा बन गए हैं. पार्टी ने तो अभी से घोषणा कर दी है कि 2013 का विधानसभा चुनाव शिवराज सिंह के नेतृत्व में लड़ा जाएगा. ऐसे में इन नेताओं को यह एहसास हो चला है कि शिवराज के प्रदेश में रहने तक उनका प्रोमोशन नहीं हो पाएगा. इन्हीं लोगों में से कई इन दिनों मुख्यमंत्री सहित अपनी ही सरकार की योजनाओं पर सवाल उठाते रहते हैं.

पार्टी के एक नेता नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, ' पार्टी में इस समय कोई ऐसा नेता नहीं है जो शिवराज के बराबर या उसके आसपास भी लोकप्रियता रखता हो. शिवराज की यह सबसे बड़ी ताकत भी है और सबसे बड़ी चुनौती भी. पार्टी में एक तबका है जो शिवराज ने नाराज चल रहा है. इसलिए नहीं कि वे गलत हैं बल्कि इसलिए कि ज्यादा लोकप्रिय हो गए हैं. ऐसे में ये तबका उन्हें नीचे गिराने की कोशिश जरूर करेगा.' एक अन्य नेता कहते हैं, ' जब उमा भारती निपट सकती हैं तो फिर शिवराज क्या हैं?'
इन हालात में शिवराज को अपने अघोषित विरोधियों पर विजय पानी होगी. इनके अलावा भी पार्टी के कई ऐसे नेता हैं जो सरकार में उनके साथ होते हुए भी शिवराज सरकार के परफॉर्मेंस की या तो आलोचना करते हैं या फिर यह पूछने पर कि सरकार का कामकाज कैसा है,चुप्पी साध लेते हैं. शिवराज के साथ एक अन्य चुनौती उनकी अपनी खुद की छवि भी है. वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक गिरिजाशंकर कहते हैं, ' शिवराज की छवि बीजेपी में जननायक की बनाई गई है. यह उनका मजबूत पक्ष होने के साथ ही एक चुनौती भी  है. अर्थात जननायक माने जाने के कारण चुनाव जीतने का पूरा दारोमदार उन पर ही है. ऐसा लगता है मानो पार्टी के नेताओं ने उन्हें आगे करके खुद को जिम्मेदारी से मुक्त कर लिया है. एक बात ये भी है कि शिवराज सिंह का बीजेपी में कोई गुट नहीं है. ये पार्टी के लिए अच्छा है.' हालांकि पार्टी में अपना कोई गुट न होने की बात को कई राजनीतिक प्रेक्षक उनके लिए एक खतरे की तरह देखते हैं. ऐसे ही एक राजनीतिक विश्लेषक जो सरकार के काफी करीबी माने जाते हैं, इस बारे में कहते हैं, ' यह शिवराज के लिए नुकसानदायक भी हो सकता है क्योंकि कल को अगर वे कमजोर पड़ते हैं तो कोई उनके साथ खड़ा नहीं दिखेगा. दूसरी तरफ सरकार की कोई बहुत उपलब्धियां भी नहीं हंै जिसे वे भुना सकें. ऐसे में शिवराज के पास जो है वह सिर्फ और सिर्फ उनकी साफ-सुथरी छवि जिसे बनाए और बचाए रखना उनके लिए चुनौती है.'

धर्मनिरपेक्षता बनाम भगवा का संतुलन

भाजपा की छवि अल्पसंख्यकों खासकर मुसलिम समुदाय के एक बड़े तबके के बीच कैसी है, यह अलग से बताने की जरूरत नहीं है. इसके बावजूद यह भी एक तथ्य है कि राष्ट्रीय स्तर से लेकर प्रदेश स्तर तक भाजपा के नेताओं को दो भागों में विभाजित करके देखा जा सकता है. इनमें से ज्यादातर संघ के विद्यालय से समान शिक्षा ग्रहण करने के बाद ही निकले हैं लेकिन सोच के स्तर पर एक दूसरे से अलग हैं. इनमें एक तरफ हैं संघ के पोस्टर ब्वॉय मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी जैसे नेता और दूसरी तरफ हैं शिवराज सिंह चौहान जैसे नेता. भले ही शिवराज सिंह चौहान के मानसिक कल-पुर्जों का निर्माण संघ की वैचारिक फैक्ट्री में ही हुआ है लेकिन उनकी सोच बाकियों से अलग है. भाजपा शासित मध्य प्रदेश ही शायद एक ऐसा राज्य है जहां बड़ी संख्या में अल्पसंख्यक रहते हैं और वे सरकार की तरफ शंका की नजर से नहीं देखते. इस स्थिति में मुख्यमंत्री की बड़ी भूमिका है. वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई कहते हैं, ' शिवराज सिंह ने राज्य में फिरकापरस्ती को बढ़ावा नहीं दिया. भले ही प्रदेश में सुशासन नहीं आया हो लेकिन दंगे और दबंगई भी नहीं होने दी.'  उदाहरण देते हुए वे अपनी बात आगे बढ़ाते हैं, ' पहले इंदौर में खूब दंगे हुआ करते थे लेकिन शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में उस पर रोक लगी. इसी तरह धार स्थित भोजशाला की एक घटना है. उस दिन शुक्रवार था. नमाज का दिन. और उसी दिन सरस्वती पूजा भी थी. उन्माद फैला हुआ था. ऐसा लग रहा था मानो दंगा हो जाएगा लेकिन शिवराज सिंह ने सूझबूझ का परिचय देते हुए मामले को नियंत्रित कर लिया. उस दिन सरस्वती पूजा भी हुई और नमाज भी.'
जानकार बताते हैं कि मध्य प्रदेश का अल्पसंख्यक शिवराज पर विश्वास करता है. बड़ी मेहनत से मुख्यमंत्री ने एक ऐसी छवि गढ़ी जिससे मुसलिम समुदाय आसानी से जुड़ जाता है. यही कारण है कि जब पिछली बार विधानसभा चुनाव के समय नरेंद्र मोदी के प्रदेश में आकर पार्टी का प्रचार करने की बात उठी तो शिवराज ने उसे खारिज कर दिया. उनका कहना था कि मोदी जी बड़े नेता हैं लेकिन चुनाव जीतने के लिए हमें उनकी जरूरत नहीं है.

पिछले दिनों कांग्रेस  में हुए फेरबदल के बाद विपक्ष की कमजोरी का फायदा शिवराज सिंह नहीं उठा पाएंगे

अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि बनाने के मामले में अभी तक शिवराज सिंह ने काफी चतुराई दिखाई है. गुजरात में अपने सद्भावना उपवास के दौरान नरेंद्र मोदी ने जहां मुसलिम टोपी पहनने से इनकार कर दिया तो वहीं शिवराज सिंह चौहान ईद और बाकी त्योहारों के अवसर पर मुसलिम टोपी पहनकर मुसलमानों से गले मिलते दिखाई देते हैं. वे भाजपा के संभवत: एकमात्र ऐसे मुख्यमंत्री हैं जो हज जाने वाले यात्रियों को एयरपोर्ट पर छोड़ने जाते हैं.

इस तसवीर का एक दूसरा पहलू भी है. तमाम सुखद विशेषताओं के बावजूद शिवराज गाहे-बगाहे संघ राग अलापने से परहेज नहीं करते. हाल ही में संघ से जुड़े एक संगठन के कार्यक्रम में उन्होंने स्कूलों में गीता अनिवार्य रूप से पढ़ाए जाने की बात कही. इसकी काफी आलोचना हुई और लोग वर्तमान सरकार पर राज्य का भगवाकरण करने का आरोप लगाने लगे. उनके मुताबिक चाहे योजनाओं के नामकरण (बलराम ताल योजना, सूर्यनमस्कार योजना इत्यादि) का मामला हो या फिर पुरस्कार प्रदान करने से लेकर राज्य में विभिन्न पदों पर लोगों कि नियुक्ति का, हर जगह संघ और उसकी विचारधारा से जुड़े हुए लोगों और प्रतीकों को ही प्रमुखता दी जा रही है. माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय जैसे उत्कृष्टता संस्थानों में अकादमिक योग्यता के ऊपर संघ की पृष्ठभूमि (कुलपति बीके कुठालिया ) से जुड़े लोगों की नियुक्तियां हो रही हैं. वहीं मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान रहे भोपाल स्थित भारत भवन में इस समय एक अघोषित सेंसरशिप लागू है जिसके तहत सांस्कृतिक कार्यक्रमों में सरकार विरोध की बात नहीं हो सकती. ये ऐसे कुछ उदाहरण हैं जो बताते हैं कि धर्मनिरपेक्ष छवि और संघ की विचारधारा के बीच संतुलन शिवराज के लिए एक बड़ी चुनौती है. मुख्यमंत्री की समस्या ये है कि उन्हें सत्ता में बने रहना है और इसलिए संघ को लगातार खुश रखना है. अब सबसे बड़ा पेंच यहीं है. यदि भविष्य में भाजपा संगठन की तरफ से शिवराज सिंह कोई संकट महसूस करते हैं तो ये उनकी मजबूरी होगी कि वे अपनी छवि की परवाह न करते हुए पूरी तरह से संघ की मर्जी पर चलने लगें. तब भाजपा के लिए अपनी उदारवादी छवि के जरिए अल्पसंख्यकों और बहुसंख्यकों के उदारवादी धड़े को अपने साथ जोड़े रखना काफी मुश्किल होगा.

विपक्ष का एकता राग

शिवराज के सामने एक अन्य चुनौती प्रदेश कांग्रेस की बढ़ती हुई ताकत है. दिग्विजय सिंह के सत्ता के बाहर होने के बाद कुछ साल तक कांग्रेस ऐसी हालत में रही जैसे पूरी पार्टी कोमा में हो. पिछले आठ सालों में शायद ही पार्टी ने भाजपा सरकार के खिलाफ कोई बड़ा मोर्चा खोला हो या फिर उसे असहज करने की कोशिश क हो. प्रदेश में होने वाले चुनाव वह एक सिरे से हारती चली गई. विपक्ष की इस कमजोरी का भाजपा ने खूब फायदा उठाया. लेकिन अब ऐसी स्थिति नहीं है. कुछ महीने पहले हुए प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व परिवर्तन ने लाचार और मरणासन्न दिख रही कांग्रेस में जान डाल दी है. कांतिलाल भूरिया के कांग्रेस अध्यक्ष बनते ही प्रदेश की पूरी इकाई दिग्विजय सिंह के कब्जे में आ गई है. कांग्रेस में फिलहाल दिग्गी ही ऐसे नेता हैं जिनकी पूरे प्रदेश में स्वीकार्यता भले ही न हो लेकिन प्रभाव हर हिस्से में है. इसी एकजुटता या 'एकगुटता' का असर है कि विपक्ष अब सरकार के प्रति काफी आक्रामक हो गया है. पिछले समय में हुए विधानसभा के सभी उपचुनाव और नगरीय निकायों के सभी चुनाव भाजपा ने जीते. कुक्षी, सोनकच्छ और जबेरा जैसे कांग्रेसी गढ़ में भगवा फहराने के साथ ही भाजपा  लगातार चुनाव जीतती जा रही थी लेकिन यह सिलसिला अचानक हरदा नगरपालिका चुनाव में कांग्रेस की जीत के साथ ही थम गया. हालांकि नगरपालिका चुनाव परिणाम के प्रभाव को बहुत बड़े स्तर पर नहीं देखा जा सकता है. और कोई राज्य होता तो शायद इसकी चर्चा भी नहीं होती लेकिन पिछले कुछ समय से मध्य प्रदेश में नगरपालिका चुनाव भी कुछ इस अंदाज में हो रहे हैं मानों लोकसभा का चुनाव हो रहा है. इन नगरीय निकाय चुनावों तक में भाजपा मुख्यमंत्री से लेकर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज समेत तमाम मंत्री और विधायकों को झोंक रही है. जब नगरपालिका जीतने के लिए इस तरह से युद्धस्तर की तैयारी की जा रही हो तो फिर परिणाम महत्वपूर्ण हो जाता है. कुछ ऐसी ही तैयारी से भाजपा ने मंडीदीप नगरपालिका पर अपना  परचम फहराया. लेकिन इस बार हरदा में उसे हार का सामना करना पड़ा.

इसके बाद से कांग्रेस ने सड़क से लेकर विधानसभा तक में भाजपा को घेरना शुरू कर दिया है. इस बार के विधानसभा सत्र में कांग्रेस ने भाजपा के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया है. भले ही पर्याप्त संख्या बल होने के कारण भाजपा और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को इस बात का यकीन हो कि उनकी सरकार को कोई खतरा नहीं है, लेकिन पिछले आठ साल से चल रही भाजपा सरकार के खिलाफ कांग्रेस का यह पहला अविश्वास प्रस्ताव है. इसलिए इसे प्रदेश कांग्रेस के अंदर सरकार के विरुद्ध आती आक्रामकता के रूप में देखा जा सकता है. प्रशासनिक कमियों, भगवाकरण और भ्रष्टाचार के मसलों पर यदि शिवराज सरकार सावधान नहीं होती है तो निश्चित रूप से ये मुद्दे कांग्रेस के लिए संजीवनी बूटी और शिवराज सिंह के लिए गले की हड्डी बन सकते हैं.

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