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आस्था के अनूठे आयाम

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भक्ति, भोग, सरोकार, कारोबार, शांति, अशांति जैसे विविध और विरोधाभासी रंगों का गवाह बनी इस बार कालचक्र पूजा. बिहार के गया में हुए बौद्धों के इस प्रसिद्ध आयोजन से लौटकर आए निराला की रिपोर्ट. फोटो विकास कुमार

दुनिया के 63 देशों से आधिकारिक तौर पर आए हुए डेढ़ लाख से अधिक और अनाधिकारिक तौर पर दो लाख से अधिक बौद्ध धर्मावलंबी. बोधगया और उस छोटे शहर की पूरी परिधि में चहुंओर लामा ही लामा. एक छोटे दायरे में इतना विशाल जमावड़ा लेकिन कोई हो-हंगामा नहीं. भीड़ का चरित्र बहुत हद तक भारतीय भीड़ से अलग. दूसरे शब्दों में कहें तो स्व-अनुशासित मानवों का महाकुंभ. होटलों, गेस्टहाउसों में जगह नहीं मिलने के कारण संकरी गलियों व बजबजाती नालियों के बीच दलितों-महादलितों के लिए बने इंदिरा आवासों में भी प्रतिदिन एक कमरे के लिए तीन-तीन हजार रुपये तक किराया देकर रुके बौद्ध धर्मावलंबियों का जीवट और धर्म के प्रति समर्पण का रंग बिल्कुल अलहदा.

बुद्ध से ज्यादा दलाई लामा की बिकती तसवीरें संतों को ही देवता बना देने की परंपरा की बौद्ध धर्म में घुसपैठ दिखाती हैं 

ये गया में बौद्धों के धार्मिक अनुष्ठान कालचक्र पूजा की झांकियां हैं. कंपकंपाती ठंड और बीच-बीच में हुई बारिश में भी खुले खेत में टेंट लगाकर रह रहे बौद्ध धर्मावलंबी धर्म और जीवन के रिश्ते के सामंजस्य को अलग तरीके से दिखा गए. अपने धर्मगुरु दलाई लामा का प्रवचन सुनने के लिए विशालकाय पंडाल में जगह न बचने के बाद शांति से सड़कों पर, गलियों में, कब्रिस्तान में कब्रों पर ध्यानस्थ-एकाग्र भाव से बैठे बच्चे-बूढ़े बौद्ध धर्मावलंबियों को देखना एक अलग ही अनुभूति थी. हॉलीवुड नाम की मायानगरी से आए चर्चित कलाकार रिचर्ड गेरे सभी मायाओं से मुक्त होकर कालचक्र में दस दिन तक जमे रहे. दलाई लामा और कालचक्र पूजा के साथ गेरे को कवर करने के लिए दुनिया भर के मीडियाकर्मी 16 भाषाओं के अलग-अलग दुभाषियों के जरिए यहां संवाद कायम करते रहे.

दलाई लामा के प्रवचन स्थल कालचक्र मैदान और महाबोधि मंदिर के बीचोबीच एक नुक्कड़ पर एक निजी संस्था हर दिन एक नामी कंपनी के औसतन हजार से ज्यादा कंडोम भी बांटती रही. धर्म के इस महाकुंभ में एड्स जागरूकता के नाम पर उन्मुक्तता के इस सेवायोग की भी खूब चर्चा रही. हर शाम महाबोधि मंदिर से थोड़ी दूर पर एक मैदान में चलने वाली एक सांस्कृतिक संध्या में रात चढ़ते ही दलाई लामा की बड़ी तसवीर वाले मंच पर शीला की जवानी जैसे गीतों पर लगने वाले ठुमके कइयों में अखरन पैदा करते रहे.

ऐसे ही कई रंगों के बीच 31 दिसंबर, 2011 से 10 जनवरी, 2012 तक बुद्ध की नगरी बोधगया में आयोजित 32वीं कालचक्र पूजा का समापन हुआ. दस दिन तक धर्म और धन, सरोकार और व्यापार गहरे द्वंद्व के साथ एक-दूसरे से टकराते रहे. बाहर से आए बौद्ध धर्मावलंबियों में अधिकतर के लिए धर्म प्रमुख था, स्थानीय बाशिंदों के लिए धन. होटलों ने, निजी मकानवालों ने और देखादेखी इंदिरा आवासवालों ने भी अपने हिसाब से ठहरने का रेट तय किया. बोतलबंद पानी का कारोबार करने वाले बबलू पांडेय का तर्क सुनिए, ‘ हम जानते हैं कि इस आयोजन में धर्म के जरिए यहां पहुंची संस्थाएं डोनेशन आदि के नाम पर करोड़ों कमाने के कारोबार में लगी हुई हैं. यहां से करोड़ों बटोरकर ले जाएंगी. हम यह भी जानते हैं कि कालचक्र में करोड़ों की आमदनी होने के बावजूद उससे बोधगया के लोगों के लिए कुछ स्थायी बंदोबस्त नहीं किया जाना है. पूजा खतम, खेला खतम, इसलिए हम लोग भी इस अवसर को व्यापार के माध्यम के रूप में देखते हैं.' अरुणाचल प्रदेश से आए एक नौजवान तेंजिंग ने इसे दूसरे नजरिये से समझाया. उनका कहना था, 'सब ठीक है लेकिन हम लोग तो अपने ही देश से आए हैं. फिर हमारा भी दोहन इस कदर क्यों किया जाता है यहां. रिक्शेवाले भी दस की जगह सौ से कम में नहीं मानते.'

विश्वशांति के इस आयोजन में स्थितियां कुछ ऐसी बनीं कि चलाचली की बेला आते-आते अशांति की छाया मंडराने लगी

तेंजिंग का कहना सच भी है क्योंकि जिस चाय की दुकान पर हमने एक चाय के लिए पांच रुपये अदा किए, उसी दुकान पर बौद्ध धर्मावलंबी वेशधारी से दो-तीन लाइन तिब्बती बोलकर चायवाले ने 20 रुपये वसूले. गया निवासी और फिल्म लेखक शैवाल कहते हैं, 'यह सब तो हर रेले-मेले की कथा-कहानी है. व्यापार से गहरा रिश्ता जुड़ने पर ही धर्म का फलक व्यापक रूप लेता है.' कालचक्र के दौरान करीबन 300 करोड़ रुपये के कारोबार का अनुमान लगाया गया है, इसलिए व्यापार का रूप आश्चर्य में नहीं डालता लेकिन धर्म के स्थलों पर देह की माया इतनी तगड़ी क्यों रहती है, यह समझ में नहीं आता. पुष्कर जैसे हिंदू धर्मस्थलों पर तो देखा ही जाता रहा है, अब बुद्ध की नगरी में भी कंडोम का बंटना थोड़ा सोचने पर विवश करता है. शैवाल बातों को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं, 'बुद्ध ने तो कहा था कि निवार्ण की प्राप्ति के लिए देह के मोह को छोड़ना होगा, यहां हजारों की संख्या में बंट रहे कंडोम बता रहे हैं कि देह हावी है.'

बोधगया में ही इस सवाल से भी सामना हुआ कि बुद्ध की नगरी में दुकानों पर बुद्ध से ज्यादा दलाई लामा की तसवीरें बिकती नजर आईं. व्यक्ति पूजा और संतों को ही देवता बना देने की परंपरा तो हिंदू धर्म में अब एक विकृत रूप में भी मौजूद है. सवाल यह भी उठा कि जिन कर्मकांडों और दिखावे के विरोध में बुद्ध ने अलग राह अपनाई, कुछ उसी तरह का तामझाम, कर्मकांड और दिखावा किसी बौद्ध धर्म के आयोजन में भी दिखे तो यह हजम नहीं होता. इतिहासकार डॉ एचएस पांडेय कहते हैं कि इसमें किसी को आश्चर्यचकित या दुखी होने की जरूरत नहीं. महायानी बौद्ध कमोबेश हिंदू की राह पर ही चलते रहे हैं. कर्मकांड, तंत्र-मंत्र में उनकी आस्था रहती है और वे मूर्तिपूजा-व्यक्तिपूजा को महत्व देते हैं. हिंदुओं से समानता कुछ इस कदर रही थी कि गुप्तकाल में बुद्ध को विष्णु का नौवां अवतार भी घोषित किया गया था.

इस सबके बीच सबसे अलग किस्म का सवाल बोधगया की मस्तीपुर बस्ती में रहनेवाले और भाजपा से चुनाव लड़ चुके युवा नेता विजय मांझी उछालते हैं. वे कहते हैं, 'आप खुद गौर कीजिए. आखिर कोई वजह तो होगी कि बुद्ध की नगरी होने के बावजूद, सालों भर बुद्ध के जरिए ही कारोबार-व्यापार करने के बावजूद, बौद्ध धर्मावलंबियों के जरिए ही बड़ी से बड़ी कामयाबी हासिल कर लेने के बावजूद यहां के स्थानीय बाशिंदे बौद्ध धर्म क्यों नहीं अपना सके हैं अब तक!' 

कारोबार-व्यापार की बातें छोटी-छोटी हैं. बोधगया के ही छोटे दायरे में सिमटकर रह गईं. बड़े दायरे में फैलने वाली बड़ी बात यह हुई कि विश्वशांति के लिए हुए कालचक्र के इस आयोजन में स्थितियां कुछ ऐसी बनीं कि चलाचली की बेला आते-आते अशांति की छाया मंडराने लगी. कालचक्र के केंद्र में विश्वशांति की जगह तिब्बत और चीन का मसला आ गया. नुक्कड़ से लेकर कालचक्र मैदान तक चीन छा गया.

यह अंदेशा पहले ही दिन से था. एक तो इस खास आयोजन में दलाई लामा का यहां दस दिन तक रहना पहले से ही तय था. उसके बाद जब बोधगया में आए धर्मावलंबियों में आधे से अधिक संख्या तिब्बतियों की देखी गई, निर्वासित तिब्बती सरकार के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री लोबसांग सांग्ये पहुंच गए, तिब्बत की स्वायत्तता के बहाने चीन पर निशाना साधा गया और बोधगया की सड़कों किनारे तिब्बत में चीन द्वारा किए जा रहे दमन की दारूण कथा का पोस्टर आदि से संबंधित खुलेआम प्रदर्शन शुरू हुआ, तभी से यह आशंका भी जताई जाती रही कि चीन की हनक किसी न किसी रूप में यहां सुनाई पड़ेगी. पहले खुफिया के हवाले से यह खबर फैली कि चीन के जासूस बोधगया में पहुंचे हुए हैं. फिर संयोग ऐसा बना कि बिहार के नक्सलप्रभावित और गया से सटे जहानाबाद जिले में छह जनवरी को नक्सलियों के पास से विस्फोटक-डेटोनेटर आदि बरामद हुए. अगले दिन एक हलके बाद में हवा उड़ी कि नक्सली और आतंकी एक साथ मिल गए हैं और यह जखीरा बोधगया तक पहुंचाने के लिए था. फिर गया के एक मोहल्ले में सुरखी मिल से कुछ विस्फोटक आदि बरामद हुए. गया के एसएसपी विनय कुमार कहते हैं, 'यह साफ हुआ है कि माओवादियों के प्रतिबंधित सिमी से जुड़े हुए हैं.' कुछ ने इसका कनेक्शन भी बोधगया से जोड़ने की कोशिश की, लेकिन सिर्फ इतने से तुर्रा और तर्क चल न सका. उसी बीच बोधगया की फिजा में चीन की वह खबर भी तैरती रही कि वहां के सिचुआन प्रांत में दो बौद्ध भिक्षुओं ने तिब्बत की आजादी और दलाई लामा की वापसी के पक्ष में आत्मदाह कर लिया.

कंपकंपाती ठंड में भी सबसे ज्यादा तपिश सात जनवरी को महसूस की गई और देखते ही देखते विश्वशांति अभियान वाले पूजा में अशांति की गहरी छाया मंडरा गई. यह तब हुआ जब फर्जी पहचान पत्र बनवाकर वीआईपी इलाके में पहुंचे दो लामाओं को पकड़ा गया. पहले इन दोनों लामाओं में से एक की पहचान तिब्बती लामा और दूसरे की पहचान हिमाचल के लामा के रूप में हुई. बताया गया कि ये दोनों लामा फर्जी पास के जरिए दलाई लामा के मंच तक पहुंचना चाहते थे लेकिन उसके पहले ही उन्हें पकड़ लिया गया. कालचक्र मैदान के पंडाल में हुई इस घटना की खबर जंगल में आग की तरह फैली. बोधगया के दायरे से बात निकलकर बहुत दूर तक गई और फिर कई लामाओं में चीन की परछाई की संभावना तलाशी जाने लगी. नुक्कड़ की गपशप से लेकर स्थानीय मीडिया तक में. हालांकि दूसरे ही दिन यह साफ हो गया कि संदिग्ध रूप से पकड़े गये दोनों लामा तिब्बती इंस्टीट्यूट, सारनाथ के छात्र हैं और इन्होंने फर्जी पास इसलिए बना लिए क्योंकि पूजा समिति ने पूजा का पास बनाना बंद कर दिया था. गया के सिटी एसपी सत्यवीर सिंह ने भी इसकी पुष्टि की. पुलिस ने छानबीन के बाद भले उन दोनों लामाओं को तिब्बती संस्थान छात्र के रूप में बताया लेकिन उसका दूसरा असर तुरंत पड़ा. दलाई लामा की सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाई गयी और देखते ही देखते कालचक्र मैदान अभेद दुर्ग में तब्दील हो गया.

खैर, आयोजन अब समाप्त हो चुका है. बौद्ध श्रद्धालु अपने-अपने गंतव्य की ओर रवाना हो चुके हैं. यहां की अमिट स्मृतियां अपने हृदय में बसाए हुए. 

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