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मर्ज कुछ, दवा कुछ

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झारखंड में 2012 लाडली बिटिया वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है. लेकिन एक बड़ी हद तक यह पहल बीमारी कुछ और इलाज कुछ जैसी दिखती है. अनुपमा की रिपोर्ट

झारखंड में राजधानी रांची से लेकर संथाल परगना के किसी सुदूरवर्ती जिला मुख्यालय तक इन दिनों कई नए किस्म के नारों के साथ कुछ होर्डिंग जरूर देखने को मिलते हैं. ये होर्डिंग झारखंड में लडकियों को तरजीह देने की अपील वाले हैं. बिटिया को खास मानने की अपील से भरे हुए. झारखंड में अचानक लड़कियों पर स्नेह की बारिश होने लगी है. सरकार महिलाओं को केंद्र में रख कुछ-कुछ करने की कोशिश करती दिख रही है.

मिसाल के तौर पर लाडली बिटिया योजना को ही लें. सरकार ने चालू वर्ष को लाडली बिटिया वर्ष घोषित किया है. उसके मुताबिक इस योजना का मकसद है लड़कियों का भविष्य संवारना. इस योजना के तहत किसी बच्ची के जन्म पर 6,000 रु डाक घर में जमा करके उसके नाम पर एक खाता खोला जाएगा. अगले चार साल तक हर साल इसमें इतनी ही रकम जमा की जाएगी.

इतना ही नहीं, बच्ची के कक्षा सात में पहुंचते ही उसे एकमुश्त 2,500 रु दिए जाएंगे. कक्षा नौ में यह आंकड़ा चार हजार और कक्षा 11 में साढ़े सात हजार रु हो जाएगा. 11वीं और 12वीं कक्षा की छात्राओें को 200 रु अतिरिक्त दिए जाएंगे. फिर 21 साल की आयु पूरी होने और बारहवीं पास करने पर उसे एक लाख आठ हजार रूपये एक मुश्त दिए जाएंगे ताकि उसका ठीक से विवाह हो सके. शर्त यही है कि विवाह के समय उसकी उम्र कम-से-कम 18 साल होनी चाहिए. सरकार ने इस योजना को चलाने के लिए बजट में अलग से 54 करोड़ रु पारित भी किए हैं. सरकारी दस्तावेज के अनुसार यह योजना पूरे राज्य में बीते 15 नवंबर से लागू हो चुकी है.

लेकिन असल पेंच इस योजना के लागू होने के बाद से ही शुरू हुए हैं. दुमका की चांदमुनी बताती हैं,  'हमारी बिटिया का जन्म तीन महीने पहले हुआ है. जन्म के बाद से ही रजिस्टर में उसका नाम चढ़वाने के लिए यहां-वहां धक्के खा रहे हैं लेकिन अब तक सफलता नहीं मिल पाई है.' थक-हारकर चांदमुनी ने योजना से तौबा कर ली है. वे बताती हैं, ‘तीन-तीन फॉर्म भरने पड़ते हैं. उसके बाद आंगनबाड़ी सेविका से लिखवाना पड़ता है. फिर समाज कल्याण विभाग को एक कापी जमा करनी पड़ती है. फिर उस पर उपायुक्त का रिकमेंडेशन आता है. तब जाकर डाकघर में खाता खुल पाता है.’ झारखंड के अलग-अलग हिस्सों मंे चांदमुनी जैसी कई महिलाएं हैं जिन्होंने दुरूह प्रक्रिया की वजह से इस योजना से तौबा कर ली है.

और बात सिर्फ उलझाऊ प्रक्रिया भर की भी नहीं है. बहुतों को इस तरह की योजना में ही खोट नजर आ रही है. जैसा कि बोकारो में बच्चों के अधिकार पर काम करने वाली ज्योति कहती हैं, 'यह भूल-भुलैया वाली योजना है. अब तक तो झारखंड के ग्रामीण इलाकों में दहेज का चलन नहीं था लेकिन जब एकमुश्त पैसे आएंगे तो दहेज प्रथा का आरंभ यहां हो जाएगा.'

असल मुद्दा

हालांकि इन चीजों को एकबारगी परे भी कर दें तो  झारखंड की महिलाओं को भविष्य का ख्वाब दिखाने से ज्यादा अहम जरूरत इस बात की है कि उनका वर्तमान सुरक्षित और समृद्ध किया जाए. फिलहाल तो यह कई मायनों में भयावह है. सबसे अहम मानक स्वास्थ्य की बात करते हैं. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट बताती है कि राज्य की 70 फीसदी से अधिक महिलाएं अनीमिया (खून की कमी ) की शिकार हैं. किशोर उम्र की लड़कियों की बात करें तो उनकी आबादी में तीन चौथाई से अधिक अनीमिया ग्रस्त हैं. आंकड़े यह भी बताते हैं कि बाल विवाह के मामले में भी राज्य देश में सबसे अगली पांत में है. महिलाओं की तस्करी भी सबसे ज्यादा यहीं से होती है. पिछले दस वर्षों के आंकड़े देखें तो यहां यौन उत्पीड़न 7,563, अपहरण 3,854, दहेज हत्या 2,707 और दहेज उत्पीड़न के 3,398 मामले सामने आए हैं. झारखंड स्टेट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी की मानें तो अब भी राज्य में प्रतिवर्ष औसतन 175 महिलाएं डायन बताकर मारी जा रही हैं. यूनीसेफ की एक रिपोर्ट बताती है कि झारखंड में आधी आबादी के पास अब भी शौचालय नहीं है और न ही पीने का साफ पानी. ऐसे में महिलाओं की अधिकांश आबादी पानी के फेरे में ही अपना अधिकांश समय खपा देती हैं.

झारखंड में 70 फीसदी से अधिक महिलाएं अनीमिया की शिकार हैं जबकि हर साल यहां से लगभग सवा लाख लड़कियां दूसरे राज्यों में पहुंच जाती हैं

अब यदि शिक्षा की स्थिति देखें तो सरकारी आंकड़ों में यह खुशनुमा-सी दिखती है. आंकड़े बताते हैं कि यहां  महिलाओं की साक्षरता दर 56 फीसदी है लेकिन सच यह भी है कि मात्र 11 प्रतिशत लड़कियां उच्च शिक्षा प्राप्त कर पाती हैं. यूनीसेफ की रिपोर्ट को आधार बनाएं तो प्राथमिक शिक्षा में स्कूल छोड़ने की दर यहां काफी ज्यादा है.

महिलाओं की तस्करी के मसले पर कार्यरत संस्था एटसेक के सचिव संजय मिश्र कहते हैं कि झारखंड से हर वर्ष सवा लाख लड़कियां दूसरे राज्यों में पहुंच जाती हैं. लेकिन इस पर अब तक लगाम नहीं लगायाी जा सकी है. इस कारण अधिकांश लड़कियां शारीरिक व मानसिक उत्पीड़न की शिकार होती हैं. जिन लड़कियों को इस मकड़जाल से छुड़ाया जाता है उनके लिए भी कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं है. बात आगे बढ़ाते हुए समाज कल्याण विभाग के अवर सचिव चंद्रशेखर झा कहते हैं कि सरकार की मंशा में महिलाएं शामिल हैं ही नहीं. वे बताते हंै, 'राज्य महिला आयोग महिलाओं के सहयोग के लिए है लेकिन उसके पंख कतर दिए गए हैं ताकि वह उड़ान न भर सके. फिर भी हम सीमित संसाधनों में पिछले डेढ़ सालों मे लगभग 600 मामलों को निपटा चुके हैं.'

झारखंड राज्य में 2006 से ही महिला नीति बन कर तैयार है पर सरकार अब तक उसे लागू नहीं करवा सकी है. महिला आयोग की सदस्य वासवी किड़ो कहती हैं, 'सरकार की मंशा साफ नहीं है. वह महिलाओं को सिर्फ लॉलीपॉप दिखा कर इस्तेमाल करना चाहती है. आयोग के पास सबसे अधिक मामले घरेलू हिंसा के सामने आते रहे हैं. उसके बाद बलात्कार, डायन और संपत्ति के मामले पर सरकार को शायद यह पता ही नहीं है कि राज्य में किस समस्या का समाधान पहले किया जाना है.' झामुमो विधायक सीता सोरेन कहती हैं, 'यह योजना तो ठीक है. यह योजना नाउम्मीद के बीच  उम्मीद की एक लौ की तरह दिखती है. लेकिन इसकी पेचीदगियां इतनी हैं कि लगता है यह सिर्फ शहरी लड़कियों के लिए है, ग्रामीण क्षेत्र के लिए नहीं.' वे यह भी आरोप लगाती हैं कि दलाल इस योजना का बंटाधार करने पर तुले हैं.

क्या है दरकार

सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं कि झारखंड में लाडली बिटिया योजना बनते समय ही कई सवाल थे लेकिन आनन-फानन में इसे तैयार करके लागू करवा दिया गया. बिना कुछ मौलिक बातों पर गौर किए. उनका यह कहना सही भी लगता है. झारखंड के मूलवासियों में तो परंपरागत रूप से बेटियों को हमेशा से ही ज्यादा तरजीह मिलती रही है. लेकिन इस अधिकारी की मानें तो राज्य सरकार दूसरे राज्यों के नकल के चक्कर में फंस गई. दरअसल पड़ोसी राज्य बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी महिलाओं को केंद्र में रखकर कई योजनाएं शुरू की हैं. लेकिन झारखंड सरकार यह भूल गयी कि बिहार और झारखंड में कुछ चीजों में मौलिक फर्क है. दोनों राज्यों का सामाजिक परिवेश अलग है. झारखंड में लड़कियों को अलग से लक्ष्मी और लाडली कहकर विशेष स्नेह या दयामयी कहने की कभी जरूरत ही नहीं रही. उदाहरण के तौर पर, बिहार में लड़कियों को साइकिल की सवारी करते देखना एक बड़े बदलाव की तरह माना जा सकता है. लेकिन झारखंड के ग्रामीण अंचल में किशोरवय आदिवासी लड़कियां पीढि़यों से सरपट साइकिल दौड़ाती रही हैं.

इसी तरह यहां यदि महिलाओं को अलग-अलग मोर्चे पर सक्रिय देखना हो तो आबादी के अनुपात में चर्चित चेहरे झारखंड में ज्यादा मिलते हैं. तीरंदाज दीपिका, पूर्व महिला हॉकी कप्तान असुंता, हॉकी खिलाड़ी सावित्री पूर्ति, समुराय टेटे, सामाजिक कार्यकर्ता दयामनी बरला, मुक्केबाज अरुणा मिश्रा, रेल चलाने वाली रूपाली जैसी कई महिलाएं यहां सहजता से पनपती रही हैं. राज्य ऐसी कई प्रतिभाओं की खान रहा है. जानकार कहते हैं कि ऐसी प्रतिभाओं को बढ़ावा देने की जरूरत है, लेकिन सरकार लड़कियों को लाडली, बिटिया, लक्ष्मी आदि की शब्दावली में फंसाकर सभी मुश्किलों से पार पाने की पुरजोर कवायद में दिखती है.

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