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कारसेवा या चुनावी मेवा!

image अयोध्या के कारसेवकपुरम् में शिलापूजन करते संत

अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए पत्थर तराशने का सालों से बंद पड़ा काम फिर से शुरू होने की क्या वजहें हैं? जय प्रकाश त्रिपाठी की रिपोर्ट

अयोध्या में कारसेवकपुरम् स्थित राम मंदिर निर्माण कार्यशाला में इन दिनों नजारा बदला-बदला सा है. पिछले कई सालों से धूल खाते पत्थरों की चमक और शांत पड़ी छेनी-हथौड़ी की ठक-ठक एक बार फिर से लौटने लगी है. मंदिर निर्माण के लिए पत्थर तराशे जाने का जो काम वर्ष 2007 के बाद रुक गया था उसे एक अक्टूबर से दोबारा शुरू कर दिया गया है. इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ द्वारा विवादित स्थल का फैसला दिए जाने के बाद अब मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है. इधर उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव भी होने वाले हैं. इन हालात में तीन साल से रुका हुआ पत्थर तराशी का काम अचानक शुरू कर देना अयोध्या-फैजाबाद के आम लोगों के साथ ही सियासी गलियारों में भी चर्चा और सवाल खड़े कर रहा है.

पिछले एक दशक के दौरान उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की ताकत लगातार कमजोर पड़ती गई है

उत्तर प्रदेश में पिछले एक दशक के दौरान लगातार हाशिये पर सरकती गई भाजपा विधानसभा चुनाव से पहले केंद्र और राज्य दोनों जगहों पर सरकारों को भ्रष्टाचार के मामले में घेरने का प्रयास कर रही है. भाजपा नेता कभी दिल्ली में केंद्र सरकार तो कभी यूपी में राज्य सरकार के मंत्रियों व अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले उजागर करने के दावे करके मजबूत स्थिति में आने का प्रयास कर रहे हैं. लेकिन कभी भाजपाई राजनीति की धुरी मंदिर मुद्दे पर टिकी होती है. ऐसे में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले इस मोर्चे पर हरकत होने से सवाल उठना लाजिमी है.

महंत परमहंस रामचंद्र दास और विश्व हिन्दू परिषद के वरिष्ठ नेता अशोक सिंघल के नेतृत्व में नौ सितंबर, 1990 को पत्थर तराशने का काम राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण कार्यशाला में प्रारंभ हुआ था. उस वक्त चंद्रकांत भाई सोनपुर द्वारा डिजाइन किए गए मंदिर को बनाने के लिए चार कारीगरों से शुरू हुआ पत्थर तराशने का काम वर्ष 2007 के अंत तक चला. मंदिर के लिए पत्थर राजस्थान के वंशी पहाड़पुर से मंगवाए गए थे. विश्व हिंदू परिषद के मीडिया प्रभारी शरद शर्मा बताते हैं कि 1990 से 2007 तक करीब सवा लाख घन फुट पत्थर तराशा जा चुका है. 268 फुट लंबे, 140 फुट चौड़े और 128 फुट ऊंचे मंदिर के निर्माण में करीब एक लाख 75 हजार घन फुट पत्थर तराशा जाना है. कार्यशाला में काम करने वाले कारीगरों के अनुसार 2007 तक करीब 65 प्रतिशत पत्थर तराशे जा चुके थे. पहली मंजिल पर स्थित अग्रभाग, सिंहद्वार, नृत्य मंडप, रंग मंडप और गर्भ गृह का काम लगभग पूरा हो चुका है. दूसरी मंजिल के लिए 106 स्तंभ बनाए जाने हैं. 14 फुट छह इंच ऊंचे प्रत्येक स्तंभ पर 16-16 मूर्तियां बनाने का काम भी लगभग पूरा हो चुका है.

शर्मा का तर्क है कि 30 सितंबर, 2010 को आए कोर्ट के निर्णय के बाद संत व धर्माचार्यों ने यह महसूस किया कि शेष पत्थर तराशे जाने का जो काम बचा है उसे भी पूरा कर लिया जाए. काम फिर से शुरू करने के लिए संत व धर्माचार्यों तथा श्रीराम जन्मभूमि न्यास के पदाधिकारियों ने अयोध्या के पंडित कमला कांत शास्त्री से मुहूर्त निकलवाया. मुहूर्त के हिसाब से ही शरदीय नवरात्र के एक अक्टूबर की तारीख तय की गई. तय तारीख पर श्रीराम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास तथा विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय संगठन मंत्री दिनेश चंद्र ने शिलाओं का पूजन करके उन्हें तराशी के लिए एक बार फिर से कारीगरों के हाथों में सौंपा. भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष विनय कटियार कहते हैं, 'कोर्ट में जो मामला लंबित है वह थोड़ी जगह का ही है जबकि मंदिर काफी विशाल बनाया जाना है इस लिहाज से काम पूरा कराया जा रहा है.'

प्रदेश के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बंद पड़े काम को फिर से शुरू करने को लेकर बाबरी मस्जिद एेक्शन कमेटी के संयोजक जफरयाब जिलानी कहते हैं, 'इन सब बातों का कोई मतलब ही नहीं है, सब चुनावों को ध्यान में रखकर किया जा रहा है. 'कुछ ऐसी ही धारणा कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता सुबोध श्रीवास्तव की भी है. वे कहते हैं, 'आरएसएस और भाजपा वालों का यह पुराना तरीका है. जैसे ही चुनाव पास आते हैं उन्हें मंदिर का निर्माण याद आने लगता है. आम जनमानस इस बात को अच्छी तरह समझ चुका है लिहाजा इसका कोई बड़ा असर नहीं होने वाला.'

विपक्ष भले ही इसे चुनावी स्टंट करार दे रहा हो लेकिन श्रीराम जन्मभूमि न्यास अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास इन बातों को सिरे से खारिज करते हुए कहते हैं, '2007 में काम इसलिए बंद किया गया था कि धन की समस्या आ गई थी. अब वह दिक्कत दूर हो गई है लिहाजा काम फिर से शुरू किया गया है. उत्तर प्रदेश में होने वाले चुनाव या कोर्ट से इसका कोई लेना देना नहीं है, यह संत-धर्माचार्यों का अपना स्वतंत्र निर्णय है.'

राजनीतिक पार्टियों के लिए विवादित स्थल भले ही चुनावी मुद्दा हो लेकिन अयोध्या व फैजाबाद के आम लोगों में इसे लेकर कोई उत्सुकता नहीं है. चाय का ठेला लगा कर आजीविका चलाने वाले दिनेश विवादित स्थल के बारे में कहते हैं, 'जो है, जैसा भी, वही ठीक है. कम से कम लोग बिना भय के अयोध्या आ तो रहे हैं. जब भी विवादित स्थल को लेकर कोई सुगबुगाहट होती है सबसे अधिक असर छोटे-बड़े व्यापारियों को ही होता है. कुछ भी गड़बड़ होने पर तीर्थयात्री अयोध्या आना पसंद नहीं करते.’ प्रदेश की राजनीति में कई सर्दी-गर्मी झेल चुके एक भाजपा नेता कहते हैं, 'चुनाव सिर पर है, सभी पार्टियों ने अपने-अपने उम्मीदवार लगभग घोषित कर दिए हैं जो क्षेत्र में पकड़ मजबूत करने में लग गए हैं. जबकि भाजपा में अभी भी प्रत्याशियों को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है.' चुटकी लेते हुए उक्त नेता कहते हैं, 'ऐसे में तो भगवान राम ही चुनाव में पार्टी का बेड़ा पार लगा सकते हैं शायद इसीलिए चुनाव से पूर्व एक बार फिर उनकी सेवा शुरू कर दी गई है.'

फिर से शुरू हुए निर्माण के लिए फिलहाल अभी राजस्थान से नए पत्थर नहीं मंगवाए जा रहे हैं. इसके पीछे कारसेवक तर्क देते हैं कि 2007 में जब काम बंद हुआ तब करीब 40 ट्रक बिना तराशा हुआ पत्थर बच गया था. फिलहाल उसे तराशने का काम ही शुरू हुआ है. इधर पत्थर तराशने का काम जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा है, पुरानी कार्यशाला छोटी पड़ने लगी है लिहाजा एक नई कार्यशाला भी बना दी गई है. 

Comments (1 posted)

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uttam 04/11/2011 00:57:11
hinduon ke liye thoda sa kam hote hi tehlka wlon ki neend us jati hai.
hajaron masjiden kabje ki jameen par khadi kar di gayi hai wo inhe nhi dikhti.
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