नई धारा का समाजवादी
वर्ष 2009 के बाद से अखिलेश यादव हर वह काम कर रहे हैं जो उनके पिता मुलायम सिंह यादव और उनकी पार्टी की अब तक की छवि के उलट है. अतुल चौरसिया की रिपोर्ट
समाजवादी पार्टी इस समय संक्रमण के दौर से गुजर रही है. सपा के अस्तित्व के लिए सबसे जरूरी सूबा उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष अखिलेश इसे इस तरह स्वीकारते हैं, 'चौधरी साहब (राजेंद्र चौधरी) कहां बदले हैं. हमने तो सिर्फ नए और पुराने को मिला दिया है. आप ही आरोप लगाते हैं कि हम पुरातनपंथी हंै. और बदलाव को स्वीकार नहीं कर रहे हैं.'
पार्टी के लिहाज से यह उथल-पुथल अब तक सकारात्मक रही है, लेकिन कुछेक गांठें भी हैं. मुलायम सिंह ने अपनी विरासत एक प्रकार से तय कर दी है. चुनाव से तीन साल पहले साल 2009 में भाई शिवपाल यादव की जगह पुत्र अखिलेश को उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी सौंपे जाने के वक्त कई लोगों की त्यौरियां चढ़ी थीं. लेकिन मुलायम सिंह की चतुर सियासी समझ ने वक्त रहते एक सही फैसला किया था. उनके मन में यह अवश्य रहा होगा कि कांग्रेस ने राहुल गांधी के निवेश का 2009 में जो रिटर्न प्राप्त किया उसका जवाब सपा के पास सिर्फ अखिलेश हैं. हालांकि नतीजों से पहले किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उत्तर प्रदेश जैसे राज्य के मामले में ठीक नहीं है, लेकिन जानकार इस ओर इशारा करते हैं कि सपा अपने दम पर प्रदेश की अगली सरकार भले न बनाए लेकिन 2007 के 97 सीट के आंकड़े को पीछे छोड़ने से उसे कोई नहीं रोक सकता.
सपा में बदलाव की गंध विक्रमादित्य मार्ग स्थित सपा के केंद्रीय कार्यालय के मुख्य द्वार से ही आने लगती है. दो बड़ी-बड़ी इलेक्ट्रॉनिक स्क्रीन पर पार्टी के दिग्गज नेताओं और पुराने समाजवादियों के चित्र और उनके विचार लगातार स्क्रोल होते रहते हैं. अंदर प्रवेश के साथ ही दो दुनियाओं का मेल साफ दिखने लगता है. हालांकि यह मजबूरी का तालमेल भी है. इसके अभाव में पार्टी के भीतर कई तरह की मुसीबतें सिर उठा सकती हैं. मसलन पुराने सपाई खुद को अलग-थलग महसूस कर सकते हैं, परिवार के भीतर सिरफुटौव्वल सतह पर आ सकती है और मुसलिम राजनीति की मजबूरियां भी परेशान कर सकती हैं. इन सबके बीच अखिलेश यादव सावधानी से आगे बढ़ रहे हैं.
मुलायम की दरबारी शैली और ताजी बयार अखिलेश
मुलायम सिंह सुबह-सुबह ही कार्यालय पहुंच चुके हैं. रविवार का दिन होने के बावजूद आज उनकी कोई सभा नहीं है, इसलिए उन्होंने अपना समय कार्यकर्ताओं को देने का फैसला किया है. ग्राउंड जीरो के असली हालात का अंदाजा लगाने का यह मुलायम सिंह का अपना तरीका है. वे एक-एक कार्यकर्ता से मिलते हैं, बात करते हैं और चरण छुआ कर नमस्ते कहते हैं. मगर जनता से जुड़ने और हालात पर नजर रखने के उनके इस तरीके की कुछ सीमाएं भी हैं. इस तरीके की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि जानकारी देने वाला खुद कितनी ईमानदारी से ऐसा कर रहा है. यहीं मुलायम सिंह कई बार गच्चा खा जाते हैं. वे लोगों पर अंधविश्वास के लिए जाने जाते हैं जिसका खामियाजा प्रदेश और उन्हें उत्तर प्रदेश की अराजक कानून व्यवस्था से लेकर निठारी न जाने जैसे फैसलों के रूप में बार-बार उठाना पड़ा है.इसके उलट अखिलेश के बारे में माना जाता है कि उन्हें बरगलाना आसान नहीं है. वरिष्ठ पत्रकार फैसल बताते हैं, 'इसके लिए उनका अपना एक नेटवर्क है जिसमें उनके द्वारा चुने राजनीतिक महत्वाकांक्षा वाले ऐसे विश्वासी कार्यकर्ता हैं जो छात्र राजनीति से उभर कर आए हैं.
मुलायम सिंह की दरबारी शैली के उलट अखिलेश के बारे में आम राय यह है कि वे किसी भी सूचना की क्रॉस चेकिंग करके ही आगे बढ़ते हैं
पार्टी की युवा शाखा के आठ में से छह युवा नेता ऐसे ही हैं. इनकी अपनी कोई राजनीतिक विरासत नहीं है. धरातल पर ये नेता अखिलेश के आंख-कान-नाक हैं.' समाजवादी छात्र सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुनील यादव बड़े उत्साह से बताते हैं, 'भैया ने 42 युवाओं को टिकट दिया है. संग्राम यादव को छोड़कर इनमें से किसी की कोई राजनीतिक विरासत नहीं है. जबकि राहुल गांधी ने जगदंबिका पाल और बेनी प्रसाद वर्मा के बेटों को युवाओं के नाम पर टिकट दिया है.' भुक्कल नवाब का उदाहरण यहां जरूरी होगा. एक जमाने से वे लखनऊ उत्तरी सीट हारते रहे हैं लेकिन मुलायम सिंह निजी संबंधों के चलते उन्हें टिकट देते रहे. इस बार भी ऐसा ही होना था, पर अखिलेश के चर्चित युवा चेहरे अभिषेक मिश्रा की कीमत पर मुलायम सिंह को भुक्कल नवाब की बलि देनी पड़ी.
अपराधियों से तौबा करते दिखने की कोशिश
सपा की एक महिला कार्यकर्ता मजाक-मजाक में कहती हैं, 'जब तक सपाई किसी दरोगा को दो-चार तमाचे नहीं मार लेता तब तक उसे यह सकून और विश्वास नहीं होता कि सूबे में उसकी सरकार है.' यह मजाक ही मुलायम सिंह की सबसे बड़ी कमजोरी रहा है. 2007 में सपा की बत्ती गुल करवाने में अराजक कानून व्यवस्था की भूमिका मायावती के दलित-ब्राह्मण समीकरण से कहीं ज्यादा थी. पूरे देश ने देखा कि किस तरह से सपाइयों ने एक पुलिस अधिकारी को जीप के बोनेट पर बैठाकर हजरतगंज की सड़कों पर घुमाया था. कुछ समय पहले तक यह आम धारणा रही है कि सपा गुंडों-बदमाशों की पार्टी है. लेकिन अखिलेश अपनी पार्टी की इस छवि को तोड़ने की कोशिश करते दिखते हैं. 'इस बात की 200 प्रतिशत गारंटी है कि सपा में किसी गुंडे-बदमाश के प्रवेश का जैसे मैं आज विरोध कर रहा हूं वैसे ही चुनावों के बाद भी करूंगा. कानून व्यवस्था के लिए हमारे पास एक योजना है. अगर हमारी सरकार बनती है तो चाचा रामगोपाल जी के नेतृत्व में एक कमेटी गठित की जाएगी. इसका काम होगा पूरे प्रदेश में एक नेटवर्क के माध्यम से जनता की छोटी से छोटी शिकायत को संज्ञान में लेकर उस पर कार्रवाई करना. लोगों की हम तक पहुंच आसान रहेगी ये मेरा वादा है,' अखिलेश दावा करते हैं.
बाहुबली डीपी यादव को सपा में लेने की शिवपाल यादव और आजम खान की घोषणा पर अखिलेश ने ब्रेक लगा दिया. इसके अलावा भी सपा कार्यकर्ता तमाम घटनाओं का जिक्र करते हैं जिससे साबित हो सके कि अखिलेश वास्तव में अराजक तत्वों के खिलाफ हंै. एक नेता कहते हैं, 'बहुत कम लोगों को पता है कि मुख्तार अंसारी सिर्फ अपनी सीटों पर मुलायम सिंह के साथ गठजोड़ करना चाहते थे लेकिन भैया ने हामी नहीं भरी. अतीक अहमद के लोगों की नेताजी के साथ मीटिंग भी हो चुकी थी. अतीक की पत्नी को सपा के टिकट पर नेताजी की सहमति भी थी. पर भैया ने सीधे मना कर दिया.' परसेप्शन के स्तर पर जो बातें मुलायम के खिलाफ जाती हैं वही जानकारों के अनुसार आज अखिलेश की छवि निखार रही हैं. हालांकि सपा दागियों से पूरी तरह मुक्त हो गई हो, ऐसा नहीं है. गुड्डू पंडित से लेकर कुख्यात डकैत ददुआ के बेटे का टिकट इसका नमूना है. मगर सपा के लोग इसके लिए अखिलेश को जिम्मेदार नहीं ठहराना चाहते.
विरासत और आंतरिक टकराव
लंभुआ का टिकट सात बार क्यों बदला? यह सवाल पूरा होने से पहले ही अखिलेश बोल पड़ते हैं, 'हमारे बीच लट्ठ चल रहे हैं. मेरी और चाचा जी की पटती नहीं है. ये सब बातें आप ही लोगों की चलाई हुई हैं. लंभुआ में पार्टी कार्यकर्ता बार-बार जनता के बीच जाकर ये साबित कर रहे थे कि वे चुनाव जीत सकते हैं और किसी न किसी माध्यम से वे अपनी बात हमारे पास पहुंचा रहे थे. तो हम क्या करते? बेहतर प्रत्याशी चुनना हमारी मजबूरी है.' अखिलेश की यह हड़बड़ी चुगली करती है कि स्थितियां इतनी सपाट नहीं हैं. उनके चाचा शिवपाल यादव फिलहाल पार्टी में तीसरे पायदान पर चले गए हैं. 2009 से पहले तक वे प्रदेश सपा के मुखिया थे. जाती विधानसभा में वे नेता प्रतिपक्ष भी हैं. टिकटों के वितरण से लेकर छोटे-मोटे काम-काज के लिए लोगों का जमघट उनके इर्द-गिर्द लगा रहता था.
2009 के बाद से इसमें लगातार कमी आई है. मौजूदा चुनाव के लिए लगभग 100 नामों की सिफारिश शिवपाल यादव ने की थी. पर एक भी नाम फाइनल सूची में जगह नहीं बना सका. यह अखिलेश का प्रताप था. एक मामला हसनुद्दीन सिद्दीकी का है. ये बसपा सरकार में लोक निर्माण मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी के भाई हैं. एक शाम शिवपाल यादव ने उनके पार्टी में शामिल होने की घोषणा की और अगली ही सुबह अखिलेश ने इस पर वीटो लगा दिया. एक समय में शिवपाल यादव खुद को मुख्यमंत्री पद का स्वाभाविक दावेदार मानते थे. आज उनकी निराशा उनके बयानों से झलकती है, 'सपा में सिर्फ एक ही नेता हैं मुलायम सिंह यादव. अखिलेश केंद्र की राजनीति करेंगे.' मौजूदा हालात में यदि सपा सरकार बनाने की स्थिति में पहुंचती है तो स्थितियों को संभालने के लिए मुलायम सिंह फिर से नेतृत्व संभाल सकते हैं.लेकिन यह व्यवस्था अस्थायी होगी. मुलायम सिंह के निकट सहयोगी भी मानते हैं कि वे अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला कर चुके हैं.
अखिलेश को खतरा बाहर और भीतर दोनों जगहों से है. चाचा शिवपाल नाराज बताए जाते हैं तो आजम खान भी नए नेतृत्व को पचा नहीं पा रहे हैं
यही वह फिसलन भरी जमीन है जहां अखिलेश को बहुत संभल कर चलना है. परिवार के बाहर से भी खतरे तमाम हैं. आजम खान भी हैं जो भले ही तामझाम के साथ वापस सपा में लौट आए हों लेकिन उनकी पुरानी खुशी लौटी हो, ऐसा नहीं है. डीपी यादव को सपा में लेने के मसले पर अखिलेश के आगे शिवपाल और मोहन सिंह के अलावा आजम खान को भी घुटने टेकने पड़े थे. इसका सकारात्मक प्रभाव जनता के बीच जरूर गया होगा.
आजम खान के मामले में अखिलेश के लिए सुकून की एक वजह है. परिसीमन के बाद उत्तर प्रदेश में यह पहला विधानसभा चुनाव है. इसकी वजह से 130 विधानसभा सीटों का पुराना स्वरूप और समीकरण बिलकुल बदल गए हैं. आजम खान के गढ़ रामपुर में भी अचानक ही करीब बीस हजार लोध वोट बढ़ गए हैं. नतीजतन वे अपने ही किले को बचाने में लगे हैं. अमर सिंह भी उनकी नाक काटने के फिराक में पैसा पानी की तरह बहा रहे हैं. लेकिन चुनावों के बाद अखिलेश को इनसे निपटना पड़ेगा. एक और बात, आजम खान को आखिरी बार पार्टी के किसी कार्यक्रम में आधिकारिक रूप से पिछले साल नवंबर में एटा में आमंत्रित किया गया था.
हाईटेक सपा
पहली बार सपा कार्यालय में एक वाररूम काम कर रहा है. एक कॉल सेंटर चल रहा है. एक-एक बूथ का हिसाब-किताब आपको दफ्तर में मिल सकता है. फेसबुक पर समाजवादी पार्टी का अपना पन्ना है. पार्टी की आधिकारिक वेबसाइट भी लोगों की जानकारी समाजवाद के प्रति बढ़ा रही है. ये वे बदलाव हैं जिनसे मुलायम सिंह अब तक पिंड छुड़ाते रहे थे. अखिलेश का यह बदलाव पार्टी में सबको स्वीकार्य हो चला है. अब श्रीराम सिंह यादव उर्फ एसआरएसजी (मुलायम सिंह के पुराने सहयोगी और उनकी ही तरह कंप्यूटर और अंग्रेजी से बिदकने वाले) भी कंप्यूटर की महिमा को पहचान गए हैं.
यहां पर अखिलेश की दूसरी टीम परिदृश्य में उभरती है. राजनीति से उसे कोई लेना-देना नहीं, पर उसे यह जरूर पता है कि आजमगढ़ जिले की अतरौलिया सीट के फलां ब्लॉक के फलां बूथ पर सपा का प्वाइंट परसन कौन है. वहां कितने बैनर-पंफलेट पहुंचाए गए हैं, प्रत्याशी को क्या-क्या दिक्कतें हैं. इनमें अखिलेश के बचपन के दोस्त हैं, ऑस्ट्रेलिया में उनके साथ इंजीनियरिंग कर चुके विजय चौहान जैसे युवक हैं. पार्टी की छोटी से छोटी गतिविधि की जानकारी देने वाला एक मीडिया सेंटर भी है. बूथ से लेकर एक-एक कार्यकर्ता और उम्मीदवार की समस्या का निराकरण खुद अखिलेश यादव करते हैं. लेकिन अपने पिता जी की दरबारी शैली के उलट उनके हाथ में हाईटेक टैब होता है और साथ में कुछेक समर्पित कार्यकर्ता. कहने का अर्थ है कि सपा ने समाजवाद का पुरातन चोला उतार फेंका है और अखिलेश के सिर इस बदलाव का सेहरा है.
युवा खून अखिलेश
विरासत का हस्तांतरण कहीं न कहीं सपा के लिए अस्तित्व से जुड़ा प्रश्न भी रहा है. मुलायम सिंह यादव को भी इस बात का भान था कि 2012 का उत्तर प्रदेश नया है. इसके 45 फीसदी मतदाता तीस साल से कम उम्र के हैं. यह भी बिहार की तर्ज पर कसमसा रहा है. 2007 की अराजक सपाई छवि को लेकर जनता के एक हिस्से में आज भी आशंका व्याप्त है और मुलायम सिंह उसका प्रतिनिधि चेहरा हैं. मायावती ने इन पांच सालों के दौरान भ्रष्टाचार को चाहे भले संस्थागत स्वरूप दे दिया हो लेकिन आम आदमी गुंडों-बदमाशों से महफूज रहा है. ऐसे में चेहरा बदल कर जनता के बीच जाने का मुलायम सिंह का निर्णय समझदारी भरा कहा जाएगा. अखिलेश अपने प्रयासों और वादों से काफी विश्वसनीय लगते हैं. पत्रकारों का सामना करते वक्त उनका आत्मविश्वास भी देखने लायक होता है. यह बात कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के खिलाफ जाती है जिनसे बातचीत से पहले ही उनके प्रबंधक सबको ऑफ द रिकॉर्ड ताकीद कर देते हैं कि इसे राहुल जी का इंटरव्यू या प्रेस कॉन्फ्रेंस न माना जाए. यह हिचक अखिलेश में नहीं दिखती.
पिता-पुत्र के बीच महीन रेखा
मुलायम सिंह अभी भी सपा के लिए सबसे भीड़ जुटाऊ चेहरा हैं, लेकिन फैसलों और काम-काज के स्तर पर संदेश साफ है कि अखिलेश ही सर्वेसर्वा हैं. गली-कूचे और खलिहान खंगालने का काम अखिलेश कर रहे हैं. साइकिल, रथ और पैदल यात्रा के जरिए अब तक उन्होंने 250 से अधिक विधानसभा क्षेत्रों का दौरा किया है. चुनावी मजबूरी और प्रगतिशील छवि को लेकर पिता-पुत्र के बीच एक अद्भुत और चतुराई भरा समझौता दिखता है. अभी भी इमाम बुखारी को पाले में लाने से लेकर मुसलिम आरक्षण या फिर अयोध्या विवाद पर टिप्पणी जैसे काम मुलायम सिंह के जिम्मे हैं. जबकि अखिलेश ने खुद को एक उदार और प्रगतिशील नेता के रूप में ही अब तक पेश किया है. धार्मिक और जातीय पहचानों से परे रहते हुए वे अपनी अलग छवि गढ़ रहे हैं.
इस मसले पर अखिलेश राहुल की खिंचाई भी करते हैं, 'कांग्रेस का घोषणापत्र लोगों को बांटने वाला है. पहले ओबीसी फिर ओबीसी में महाओबीसी. हमारा कहना है कि हम प्रदेश स्तर पर रंगनाथ मिश्रा और सच्चर कमेटी की सिफारिशें लागू करेंगे. सैम पित्रोदा किस जाति के हैं हमें क्या पता. ये तो खुद कांग्रेस और राहुल ने ही दुनिया भर में ढिंढोरा पीटा कि वे बढ़ई हैं, ओबीसी हैं. उनके मन में हमेशा जाति और धर्म रहा है.'
इमाम बुखारी, मुसलिम आरक्षण, अयोध्या जैसे मसले मुलायम सिंह के जिम्मे है जबकि अखिलेश ने अपनी छवि एक प्रगतिशील नेता की बनाई है
जात-पांत की तरह ही उत्तर प्रदेश में बदले की राजनीति भी खूब होती है. हर नई सरकार पुरानी सरकार के कार्यक्रमों और निर्माण पर बुलडोजर चलवाती आई है. पर अखिलेश एक मंजे हुए राजनेता की तरह खुद को इससे अलग करते हैं. उनके चाचा शिवपाल यादव खुलेआम मायावती को गाली देते रहते हैं जबकि अखिलेश कहते हैं, 'जो मूर्तियां लगी हैं उन्हें तो हटाया नहीं जा सकता, पर उनका इस्तेमाल सार्वजनिक हित में किया जा सकता है. हमने मूर्तियों पर बुलडोजर चलाने की बात कभी नहीं कही. अगर उसमें दलितों के लिए अस्पताल और स्कूल बन सकते हैं तो क्या बुराई है. मूर्तियां भी लगी रहेंगी और अस्पताल भी चलेंगे.'
ये चर्चाएं आम हैं कि सपा और कांग्रेस के बीच नरमी का भाव है, लेकिन हाल के दिनों में कांग्रेस ने एकाएक सपा के खिलाफ सारे घोड़े खोल दिए हैं. पहले पहल तो अखिलेश कांग्रेस पर कोई भी वार करने से बचते हैं, लेकिन यह पूछने पर कि खुद राहुल ने सपा को गुंडों-बदमाशों की पार्टी कहा है, उनका रवैया बस जरा सा बदलता है, 'उनको लगता है उधार के प्रत्याशियों से वे सरकार बना लेंगे. कन्नौज, एटा, फिरोजाबाद में सब जगह उन्होंने हमारे ही उधार के प्रत्याशी उतारे हैं. चुनाव के बाद पता चल जाएगा.' मगर वे राहुल का नाम लेने से फिर भी परहेज करते हैं. यह वही रणनीति है जिसकी चर्चा पत्रकारों से लेकर नेताओं के बीच चल रही है. इसके मुताबिक अखिलेश ने पार्टी के लिए रणनीति तय की है कि वे व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप की बजाय मुद्दों के आधार पर विरोधियों को निशाना बनाएंगे.
पुरातन मुलायम की तुलना में आधुनिक अखिलेश काफी संभावनाएं जगाने वाले लगते हैं. उन्होंने सपा का चेहरा तो बदल दिया है लेकिन चाल और चरित्र का सही पता चुनाव के बाद और सरकार बनने की सूरत में ही साफ होगा. गुंडों-बदमाशों से बचे रहना जितना चुनाव से पहले जरूरी है उतना ही जरूरी है चुनाव बाद की स्थितियों में उनसे दूरी बनाए रखना. माया इसमें सफल रही हैं और मुलायम बार-बार असफल. नई सपा गढ़ने वाले अखिलेश के सामने नया उत्तर प्रदेश गढ़ने की चुनौती होगी.





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