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गुटबाजी के गीत

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चुनाव निपटते ही उत्तराखंड भाजपा में दिख रही गुटबाजी संभावित हार का ठीकरा दूसरे पर फोड़ने की कवायद है या अप्रत्याशित जीत का श्रेय खुद लेने की कोशिश? मनोज रावत की रिपोर्ट

विधानसभा चुनाव होते ही उत्तराखंड में भाजपा के भीतर चल रही गला-काट गुटबाजी खुलकर सामने आ गई है. मतदान के बाद हफ्ता बीतते-बीतते पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ और मुख्यमंत्री भुवन चंद खंडूड़ी दोनों दिल्ली जाकर भाजपा आलाकमान के सामने अपने-अपने विधानसभा क्षेत्रों में हुए षड्यंत्रों और भितरघात का रोना रो आए. इससे पूर्व निशंक ने इस बारे में पार्टी अध्यक्ष बिशन सिंह चुफाल से भी शिकायत की थी. दोनों ही नेताओं का दुखड़ा यह है कि उन्हें हराने के लिए उनके विधानसभा क्षेत्रों में उनके विरुद्ध दुष्प्रचार किया गया और पार्टी के ही लोगों ने उनके साथ भितरघात किया. निशंक इस मोर्चे पर मुखर-से दिखे हैं तो खंडूड़ी ने उचित पार्टी फोरम पर शिकायत को प्राथमिकता दी है. राज्य भाजपा के इन दोनों वरिष्ठ नेताओं ने अपनी-अपनी सीट के अलावा राज्य की अन्य  सीटों पर भी पार्टी की हालत और उसके कारण दिल्ली में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को अपनी-अपनी तरह से समझाए.

चुनावों से पहले अपने सारे समर्थकों के टिकट कटने से खिन्न निशंक मतदान निपटते ही सक्रिय हो गए थे. स्थानीय अखबारों में निशंक के साथ भितरघात की खबरों के छपने के बाद मुख्यमंत्री खंडूड़ी का बयान आया कि यदि ऐसा हुआ है तो इसकी शिकायत पार्टी फोरम पर करनी चाहिए.  इसके बाद पांच फरवरी को निशंक दिल्ली जाकर पार्टी के बड़े नेताओं के सामने अपनी बातें रख आए. इसके एक दिन बाद खंडूड़ी भी सरकारी कार्यक्रमों में हिस्सा लेने दिल्ली गए. सूत्रों के अनुसार उन्होंने भी पार्टी अध्यक्ष गडकरी और वरिष्ठ नेताओं के सामने अपनी शिकायतें रखीं. बताया जाता है कि फिलहाल पार्टी के बड़े नेताओं ने सभी को संयमित रहने की नसीहत दी है.

दरअसल पूर्व मुख्यमंत्री ‘निशंक’ के चुनाव क्षेत्र और देहरादून जिले के डोईवाला इलाके में चुनाव प्रचार के आखिरी चरण में व्यंग्य कविताओं का एक संग्रह, कुछ पैंफलेट और एक अखबार की पुरानी प्रतियों की फोटोकॉपियां बंटी थीं. चुनाव से ठीक दो दिन पहले 28 जनवरी को एक स्थानीय चैनल में एक महिला ने पूर्व मुख्यमंत्री निशंक पर संगीन चारित्रिक आरोप लगाए. यह महिला हत्या सहित कई मामलों में आरोपित रही है. अगले दिन डोईवाला में इस खबर की सीडी बंटने लगीं. अंतिम दौर में हुए चौतरफा हमलों के चलते चुनाव से एक सप्ताह पहले ठीक-ठाक हाल में दिख रहे निशंक के चुनावी समीकरण डगमगाते नजर आने लगे.

निशंक समर्थक इसे अपने ही दल के कुछ वरिष्ठ नेताओं की शह पर हुआ सुनियोजित अभियान बता रहे हैं. ऐसे ही एक समर्थक कहते हैं, ‘देहरादून में सभी को पता है कि यह सब किसके इशारे पर छपता है और दिखाया जाता है.’ निशंक समर्थक तो टीम अन्ना के उत्तराखंड भ्रमण को भी प्रायोजित कार्यक्रम बताते हैं. टीम अन्ना के सदस्यों ने उत्तराखंड आकर पूर्व मुख्यमंत्री निशंक पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे और मुख्यमंत्री खंडूड़ी की तारीफ की थी. निशंक समर्थकों का दावा है कि उन्होंने पार्टी अध्यक्ष गडकरी की सहमति से टीम अन्ना को मानहानि का कानूनी नोटिस भेज दिया है.

उधर, खंडूड़ी खेमा भी मुख्यमंत्री के चुनाव क्षेत्र कोटद्वार में अपने विरुद्ध किए गए दुष्प्रचार से व्यथित है. कोटद्वार में भाजपा ने निशंक समर्थक माने जाने वाले विधायक शैलेंद्र रावत का टिकट काट कर मुख्यमंत्री खंडूड़ी को चुनाव लड़ाया. पहले रावत के भी निर्दलीय चुनाव लड़ने की खबरें उड़ी थीं पर बाद में वे खंडूड़ी के सारथी की भूमिका में दिखे. नामांकन के समय माहौल खंडूड़ी के पक्ष में लग रहा था, पर चुनाव आते-आते जमीनी हकीकतें कांग्रेस प्रत्याशी सुरेंद्र सिंह नेगी को मजबूत दिखाने लगीं. खंडूड़ी खेमे का आरोप है कि कोटद्वार में भी खंडूड़ी के विरोध में पांच तरह के पर्चे बांटे गए. इनमें उनके कार्यकाल में मुख्यमंत्री कार्यालय के नजदीक रहे उनके समर्थकों, रिश्तेदारों और अधिकारियों को निशाना बनाया गया था. चुनाव से दो दिन पहले एक भाजपा नेता भुवनेश खर्कवाल की गाड़ी से शराब पकड़े जाने की घटना ने रही सही कसर पूरी कर दी. इसके बाद कांग्रेसी बेकाबू हो गए जिन्हें काबू करने के लिए अर्धसैनिक बलों द्वारा किए गए लाठी चार्ज से शहर का माहौल बिगड़ गया.

अचानक हुई इन घटनाओं को भी खंडूड़ी समर्थक चुनाव से ठीक पहले उनकी साफ छवि को बिगाड़ने की साजिश मानते हैं. इस खेमे के अनुसार मुख्यमंत्री के लिए मुश्किलें खड़ी करने की नीयत से पार्टी के ही एक खेमे ने कोटद्वार में बड़ी मात्रा में पैसा भी पहुंचाया. खंडूड़ी समर्थकों का आरोप है कि इस तरह आसानी से जीती जाने वाली कोटद्वार सीट भाजपा के लिए चुनौती बन गई. उधर, खंडूड़ी विरोधी खेमे का तर्क है कि शैलेंद्र रावत का टिकट काटने के चलते कोटद्वार में क्षेत्रीय और जातीय समीकरण खंडूड़ी के खिलाफ चले गए. उधर, राजनीतिक जानकार अलग ही बात कहते हैं. उनके मुताबिक जमीनी नेता नेगी को कोटद्वार में चुनौती देना जितना आसान समझा गया था उतना था नहीं.

उत्तराखंड भाजपा में खतरनाक गुटबाजी की नींव तो तभी पड़ गई थी जब अलग राज्य का गठन हुआ था

वैसे खतरनाक गुटबाजी की नींव तो उत्तराखंड भाजपा में राज्य बनते ही पड़ गई थी.  2002 के चुनावों में भी मुख्यमंत्री पद के दावेदार कई वरिष्ठ लोगों को भितरघात करके हराने के मामले में आरोप-प्रत्यारोप लगे थे. लेकिन विपक्ष में बैठने की वजह से भाजपा में यह गुटबाजी अपने आप ही शांत हो गई थी. 2007 के विधानसभा चुनावों के बाद राज्य में खंडूड़ी और कोश्यारी दो गुट बन गए थे. तीसरा खेमा निशंक का था. इन पांच वर्षों में उत्तराखंड के इन तीनों बड़े नेताओं में से दो अपनी-अपनी सुविधा और फायदे के लिए एक होकर तीसरे को पटखनी देते रहे.

मार्च 2007- विधायकों का बहुमत भाजपा के उत्तराखंड अध्यक्ष भगत सिंह कोश्यारी के साथ होने पर भी हाईकमान ने खंडूड़ी को मुख्यमंत्री बना दिया था. यहीं से भाजपा में खुली और मुखर गुटबाजी शुरू हुई. कोश्यारी और खंडूड़ी गुट आमने-सामने रहे. निशंक दोनों के बीच संतुलन की राजनीति करते रहे.

अगस्त, 2007- निशंक ने खंडूड़ी विरोधी मुहिम की कमान संभाली.  37 में से 24 विधायक खंडूड़ी को हटाने की मांग के साथ दिल्ली पहुंचे. निशंक और कोश्यारी साथ-साथ थे, लेकिन  वापस आते ही खंडूड़ी और निशंक में समझौता हो गया.

नवंबर, 2007- खंडूड़ी विरोधी खेमे की धार कम करने के लिए कोश्यारी को राज्यसभा भेजा गया.

मई, 2009- लोकसभा चुनावों में राज्य की पांचों सीट हारने पर नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए खंडूड़ी ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया और नाटकीय रूप से इसे अगले दिन वापस भी ले लिया. तब तक खंडूड़ी ने निशंक की मदद से कोश्यारी खेमे के काफी विधायकों का समर्थन हासिल कर लिया था.

10 जून, 2009- खंडूड़ी को मुख्यमंत्री पद से हटाने के लिए दबाव बनाने के लिए 14 विधायक विधानसभा अध्यक्ष को इस्तीफा सौंपकर भारत भ्रमण पर निकल गए. इनमें से अधिकांश कोश्यारी समर्थक थे. दबाव बढ़ाने के लिए कोश्यारी ने राज्यसभा से इस्तीफा दिया और फिर वापस भी ले लिया. इस समय खंडूड़ी और निशंक खेमों में एका हुआ. ज्यादा विधायक खंडूड़ी के साथ थे.

23 जून, 2009- दिल्ली में भाजपा विधायकों की बैठक हुई जिसमें वेंकैय्या नायडू ने खंडूड़ी को इस्तीफा देने का फरमान सुनाया. हाईकमान ने कोश्यारी को भी मुख्यमंत्री बनाने से इनकार किया. खंडूड़ी ने निशंक का समर्थन किया. शक्ति प्रदर्शन में निशंक जीते.

27, जून 2009- निशंक मुख्यमंत्री बने. शुरू में उन्हें खंडूड़ी का खुला आशीर्वाद रहा. कोश्यारी राज्य की राजनीति में अलग-थलग पड़े.

दिसंबर, 2009-  निशंक कार्यकाल में जल विद्युत परियोजनाओं का आवंटन, स्टर्डिया जमीन घोटाला जैसे मामले उच्च न्यायालय पहुंचे. पार्टी की बदनामी और गिरती साख के नाम पर खंडूड़ी और कोश्यारी निशंक को मुख्यमंत्री पद से हटाने के लिए एक हुए.

सितंबर, 2011- खंडूड़ी समर्थक उन पर भाजपा से अलग विकल्प तलाशने का दबाव बनाने लगे. उत्तराखंड जन मोर्चा की खुली बैठक में खंडूड़ी और उनके गुट के कई वरिष्ठ भाजपा नेता शामिल हुए. बैठक के बाद खंडूड़ी दिल्ली पहुंचे. इस बार निशंक को हटाने के लिए खंडूड़ी और कोश्यारी ने हाथ मिला लिया था. भ्रष्टाचार के विरोध में आडवाणी की रथ यात्रा से पहले निशंक को हटाने पर सहमति बनी.

11  सितंबर, 2011- खंडूड़ी ने दूसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. निशंक अकेले पड़े.

जनवरी, 2012- निशंक के अधिकांश समर्थकों के टिकट कटे. कोश्यारी और खंडूड़ी ने मिल कर टिकट बांटे.

अब निशंक समर्थक उत्तराखंड में पार्टी की संभावित दुर्गति के लिए छह महीने पहले राज्य में मुख्यमंत्री बदलने, गलत टिकट वितरण और निशंक को प्रचार अभियान से किनारे रखने जैसे कारणों को जिम्मेदार मान रहे हैं. उधर,  खंडूड़ी समर्थक निशंक के समय गिरी पार्टी की साख और उसे संभालने के लिए मिला खंडूड़ी को मिला कम समय गिनाते हैं. जानकार कहते हैं कि चुनावों में 20 के लगभग सीटों पर भाजपा और संघ पृष्ठभूमि के बागी प्रत्याशी खड़े हुए. इसके अलावा एक दर्जन सीटों पर टिकट वितरण से उपजे असंतोष के कारण भितरघात हुआ. अब पार्टी के उन नेताओं की घेराबंदी की जा रही है जिन पर छोटे नेताओं को अनुशासन में रखने का दारोमदार था.

वैसे मतगणना के नतीजे ही तय करेंगे कि उत्तराखंड भाजपा में शीर्ष नेताओं के बीच शह और मात के ये खेल जीत का सेहरा अपने सिर पहनने के लिए हो रहे हैं या हार का ठीकरा दूसरे पर फोड़ने के लिए.

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