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संतुलन की जरूरत

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मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने 25 जून को अपने मंत्रालय द्वारा 100 दिनों और उसके बाद में किये जाने वाले कामों का ब्यौरा दुनिया के सामने रखा. इसमें तमाम स्वागतयोग्य कदम तो हैं ही कुछ ऐसे सुझाव भी हैं जिन्होंने तरह-तरह की बहसों को जन्म दिया है.

जैसे नई सरकारों को जमने के लिए ‘हनीमून पीरियडदिया जाता है वैसे ही सिब्बल जैसे मंत्रियों को भी नये विभागों से सामंजस्य बिठाने के लिए कुछ समय मिलना-लेना चाहिए 

सिब्बल चाहते हैं कि दसवीं कक्षा में बोर्ड की परीक्षा देने की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया जाए. उनके मुताबिक यदि किसी को 11वीं कक्षा में दूसरे स्कूल में प्रवेश पाना हो तो-तो ठीक अन्यथा इस परीक्षा की जरूरत ही क्या है? ऐसा करने से नाहक ही बच्चों को एक साल की हिमालयी मानसिक यंत्रणा से गुजरना पड़ता है. सिब्बल की एक दीर्घकालिक मंशा ये भी है कि देश के विभिन्न राज्यों में मौजूद तमाम शिक्षा बोर्डो को खत्म कर एक राष्ट्रीय स्तर की संस्था बनाई जाए जिससे न केवल देश के हर कोने में दी जाने वाली शिक्षा में एकरूपता आएगी बल्कि छात्रों और उच्च शिक्षण संस्थाओं को भी तरह-तरह की समस्याओं से निजात मिलेगी.

दसवीं की परीक्षा खत्म करने के संबंध में कुछ तर्क-वितर्क ये हैं कि आज से कुछ दशक पहले तक जब दसवीं कक्षा तक पढ़े लोगों को भी नौकरियां मिल सकती थीं, इसकी परीक्षा बोर्ड की होना कोई तुक की बात थी. मगर आज जब दसवीं का उच्च शिक्षा से कोई संबंध ही नहीं रहा तो इसकी बोर्ड की परीक्षा उचित नहीं जान पड़ती. दूसरी ओर चूंकि अभिभावक और बच्चे दोनों ही जानते हैं कि दसवीं की बोर्ड परीक्षा के अंकों से कुछ बनने-बिगड़ने वाला नहीं हैं इसलिए ये छात्रों को 12वीं की परीक्षा के जबर्दस्त मानसिक दबाव के लिए तैयार करने का एक बहुत बढ़िया तरीका हो सकती है. आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र सरीखे राज्यों के शिक्षा व्यवस्थापकों की एक समस्या ये भी है कि उनके यहां ज्यादातर स्कूल दसवीं तक ही शिक्षा देते हैं ऐसे में उन्हें बोर्ड की परीक्षा खत्म करने के लिए या इन स्कूलों को 12वीं तक बनाना होगा नहीं तो वहां की स्थिति में ज्यादा कुछ फर्क नहीं आने वाला. एक ही बोर्ड बनाने के विरोध में भी कई राज्यों के तर्क ये हैं कि ऐसा करना विभिन्न प्रदेशों और क्षेत्रों की भिन्न-भिन्न परिस्थितियों को नकारने जैसा होगा. उनका मानना है कि शिक्षा का उद्देश्य तभी सार्थक हो सकता है जब उसमें स्थानीयता का समुचित ध्यान रखा गया हो.

चूंकि वर्तमान सरकार एक तरह से पिछली का ही विस्तार है इसलिए माना जा सकता है कि प्रधानमंत्री ने ठीक ही अपने विभागों को बड़े परिवर्तन लाने के लिए महज 100 दिनों का समय दिया है. मगर जैसे नई सरकारों को जमने के लिए हनीमून पीरियडदिया जाता है वैसे ही सिब्बल जैसे मंत्रियों को भी नये विभागों से सामंजस्य बिठाने के लिए कुछ समय मिलना-लेना चाहिए. दूसरी ओर हालांकि शिक्षा केंद्र-राज्य के अधिकारों के बंटवारे में समवर्ती सूची में है इसलिए इस संबंध में केंद्र  का पलड़ा भारी है मगर हमें ये भी ध्यान रखना होगा कि संविधान निर्माताओं ने इसे मूलत: राज्यों का अधिकार माना था जो कि 42वें संविधान संशोधन के बाद केंद्र और राज्य दोनों के हिस्से में आ गया. इसलिए इतने महत्वपूर्ण विषय पर कोई भी बड़ा निर्णय लेने से पहले यदि सिब्बल राज्य सरकारों की चिंताओं पर भी थोड़ा ध्यान देंगे तो ये बेजा नहीं होगा.

संजय दुबे 

Comments (2 posted)

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dr.anurag 03/07/2009 04:53:47
उससे ज्यादा जरूरी प्राथमिक ओर उसके बाद की शिक्षा का एक जैसा होना ज्यादा जरूरी है .क्यूंकि गाँवों ओर कस्बो के प्रतिभाशाली छात्र भी कई बार अंग्रेजी ज्ञान ओर एक्सपोज़र की कमी से कई नौकरियों में पिचड जाते है ,शिक्षा का उद्देश्य ऐसी प्रतिभायों के साथ समुचित न्याय करना है ताकि वे इस देश की प्रगति में भी अपना योगदान कर सके ओर साथ के साथ मिडिल क्लास के पास जो एक मात्र शिक्षा ही है अपने जीवन यापन को बेहतर बनाने का तरीका ,वो कायम रहे
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प्रो.यशपाल की रिपोर्ट से ज्‍यादा खलबली कपिल सिब्‍बल की बयानों से मची। इसमें कोई दो राय नहीं है कि प्रो.यशपाल ने जो सिफारिशें की हैं वे देश की शिक्षा प्रणाली को पटरी पर ला सकती हैं, लेकिन यह इस बात पर निर्भर करता है कि सरकार इन सिफारिशों को कब और कैसे लागू करती है। शिक्षा को सुदृढ़ करने के प्रयास तो पहले भी खूब हुए हैं। आयोग बने हैं। अपने-अपने ढंग से सिफारिशें भी की गईं। कमोबेश सभी का मकसद अच्‍छा। सरकार की ओर से कदम भी उठाए गए। लेकिन, नतीजे उतने उत्‍साहवर्धक नहीं रहे। सही बात तो यह है कि देश की शिक्षण प्रणाली में सुधार के ईमानदार प्रयास कभी हुए ही नहीं। कभी धन की कमी आडे आई तो कभी राजनीतिक मजबूरियां तो कभी इच्‍छाशक्ति की कमी। ऐसे में प्रो.यशपाल की सिफारिशों से चमत्‍कार की उम्‍मीद करना बेमानी है। इस बात की क्‍या गारंटी है कि राष्‍ट्ीय उच्‍च्‍ शिक्षा व शोध आयोग का हश्र फिलहाल काम कर रहे संगठनों या संस्‍थानों सरीखा नहीं होगा। हमें यह अच्‍छी तरह समझ लेना चाहिए कि 'रिपलेसमेंट' तभी कारगर हो सकता है जब उसकी पुरानी खामियों को दुरुस्‍त कर दिया गया हो। जब तक पुराने सिस्‍टम की खामियों को दूर नहीं किया जाएगी, नई व्‍यवस्‍था भी नाकारा साबित होगी।
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