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आम कहां से पाएगा

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अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के मुताबिक महिलायें हैं तो विश्व के आधिकारिक कामगारों का करीब एक-तिहाई हिस्सा पर इस गोल दुनिया के काम का करीब दो तिहाई बोझ उनके सर पर है. इसके एवज में इनकी कुल आमदनी दुनिया की महज दस फीसदी ही है और विश्व की कुल जायदाद का सिर्फ एक फीसदी से भी कम ही इनके नाम है.

कई राजनीतिक दलों के नेता - खासकर पिछड़े समुदाय के - इस बात पर अड़े हैं कि महिलाओं के आरक्षण के भीतर दबे-कुचले और अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं के लिए भी आरक्षण होना चाहिए. मगर उनकी ये मांग बेतुकेपन के सिवा और कुछ नहीं 

साफ है कि महिलाओं के साथ हो रहा इतना बड़ा भेदभाव अपने आप या केवल उनकी खुद की कोशिशों से तो आसानी से दूर होने से रहा. इसीलिये देश की विधायिका में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण लागू करने के प्रयास जारी हैं. मगर 33 फीसदी ही क्यों? शोध कहता है कि यदि किसी संस्था में अल्पसंख्यक समुदाय की 30 फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी हो जाती है तो वो संस्था के निर्णयों को प्रभावित करने की स्थिति में आ जाता है.

मगर महिलाओं के पक्ष में इस सकारात्मक भेदभाव के रास्ते की कई बाधाएं हैं. कई राजनीतिक दलों के नेता - खासकर पिछड़े समुदाय के - इस बात पर अड़े हैं कि महिलाओं के आरक्षण के भीतर दबे-कुचले और अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं के लिए भी आरक्षण होना चाहिए. मगर उनकी ये मांग बेतुकेपन के सिवा और कुछ नहीं. जो विधेयक अभी राज्यसभा के सामने है उसमें ये प्रावधान पहले से ही है कि अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिए लोक सभा और विधानसभाओं में आरक्षित 22.5 फीसदी सीटों पर भी महिलाओं का ये आरक्षण लागू होगा. रही बात पिछड़े समुदाय की महिलाओं की तो पिछड़ा वर्ग के लिए तो विधायिका में कभी भी आरक्षण का प्रावधान नहीं रहा. इसके बिना यदि लालू, शरद, मुलायम जैसे नेता इतने बड़े नेता बन सकते हैं तो यदि वे चाहें तो महिलाओं के मामले में ऐसा न होने की कोई वजह ही नहीं हो सकती. जहां तक अल्पसंख्यक महिलाओं की बात है तो एक धर्मनिरपेक्ष देश में इस आधार पर आरक्षण देश के संविधान की मूल भावना से कतई मेल नहीं खा सकता.

हाल ही में संसद में सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह का ये बयान कि महिला आरक्षण विधेयक लोकसभा के नेतृत्व को नष्ट करने की साजिश है, इन नेताओं के असल डर की ओर इशारा करता है. एक तो आरक्षण लागू होने पर कई नेताओं को अपनी सीटें महिलाओं के सुपुर्द करनी पड़ जाएंगी और दूसरा, विधेयक में एक प्रावधान ये भी है कि अलग-अलग समय में महिला आरक्षण अलग-अलग सीटों पर लागू होगा. यानी कि किसी भी बड़े से बड़े नेता की सीट आने वाले समय में महिलाओं के लिए आरक्षित होकर उस नेता की बरसों की मेहनत मटियामेट कर सकती है. मगर ऐसी कई परेशानियां तो तमाम दूसरे आरक्षण लागू होते समय पीड़ित पक्षों ने हमेशा ही गिनाईं हैं. फिर विधेयक में इस आरक्षण का प्रावधान भी तो केवल 15 सालों के लिए ही है. तो क्या इसका ये मतलब निकाला जाए कि हमारे वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व का एक बड़ा हिस्सा अपने क्षुद्र स्वार्थों की पूर्ति के लिए देश और समाज के बड़े उद्देश्यों को ताक पर रखने से जरा भी नहीं झिझकता ? क्या उन्हें डर है कि जैसा दूसरे आरक्षणों के साथ उन्होंने किया है वैसा ही महिला आरक्षण के साथ होगा और ये हमारी व्यवस्था का एक स्थाई अंग बन जाएगा?

संजय दुबे 

Comments (1 posted):

anand on 02/07/09 07:22:24
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प्रिये संजय
आपने लिखा "जहां तक अल्पसंख्यक महिलाओं की बात है तो एक धर्मनिरपेक्ष देश में इस आधार पर आरक्षण देश के संविधान की मूल भावना से कतई मेल नहीं खा सकता" क्या कोई भी तर्क आपके पास ऐसा है जो ये कह सके की किसी भी प्रकार का आरक्षण सविधान की मूलभावना से मेल खता है सिर्फ धरम निरपेक्ष लिख देने से ही तो देश धरमनिरपेक्ष नहीं हो गया | क्या आपको नहीं लगता की ये सिर्फ एक दिखावा ही होगा और सिर्फ संभ्रांत घरो की महिलाये ही राजनीति मे आएँगी
क्यों ये सही नहीं की हम महिला आरक्षण के अन्दर भी आरक्षण करे ?
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