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टीआरपी के बनाए और सताए

image संजय दुबे, कार्यकारी संपादक

एनडीटीवी ने चैनलों की दर्शक संख्या यानी टीआरपी जारी करने वाली कंपनी टैम की मातृ कंपनियों पर अमेरिका में धोखाधड़ी का मुकदमा दायर कर दिया है. दूरदर्शन भी ऐसा करने का मन बना चुका है.  बात टैम के कम मीटरों की तो है ही लेकिन उनको लगाने और आंकने में जिस तरह की पर्दादारी है, उसकी ज्यादा है. टैम ने सारे देश की टेलीविजन देखने से जुड़ी रुचियों को नापने के लिए केवल कुछ हजार मीटर कुछ विशेष शहरी इलाकों में ही लगाए हैं. इनसे आंकड़े लेने की प्रक्रिया को कोई स्वतंत्र संस्था भी ऑडिट नहीं करती. तो फिर ऐसे में आंकड़ों के अपने आप गलत होने और जानबूझकर गलत किए जाने की आशंकाओं से कैसे इनकार किया जा सकता है?

यह इतना महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि देशभर के विज्ञापनदाता उस चैनल और कार्यक्रम को सबसे ज्यादा विज्ञापन देते हैं जिसकी टीआरपी सबसे ज्यादा होती है. 100-200 करोड़ रुपयों में स्थापित होने वाले समाचार चैनलों का अस्तित्व ही टीआरपी के आधार पर मिलने वाले विज्ञापनों पर टिका होता है. इसलिए कम टीआरपी वाला चैनल ज्यादा वाले जैसा बनना चाहता है और सभी चैनल अपने उन कार्यक्रमों के जैसा ही बनाते रहना चाहते हैं जिन्हें खूब टीआरपी मिलती हो.

इसका सबसे बड़ा उदाहरण हमारे यहां का एक बहुत बड़ा हिंदी समाचार चैनल है. इस चैनल ने संसाधनों की कमी के चलते बिना मतलब के कुछ ऐसे कार्यक्रम बनाए जिन्हें कुछ समय के लिए बढ़िया टीआरपी मिल गई. बस बाकी चैनल भी थोड़ा सब्र से काम लेने और अपने काम को बढ़िया करने की बजाय उस चैनल जैसा बनने की होड़ में लग गए. नतीजा आज हिंदी चैनलों की घटी हुई साख के रूप में हम सबके सामने है. टीआरपी के इस खेल से उन लोगों-इलाकों से जुड़े मुद्दों-कार्यक्रमों की उपेक्षा हुई जहां टीआरपी के मीटर नहीं लगे हैं. दूसरा अगर टीआरपी की गणना की पूरी प्रक्रिया के ही भ्रष्ट होने की हर गुंजाइश इसमें मौजूद हो तो इसका दुरुपयोग लोगों की रुचियों को बदलने और गलत चीजों को प्रोत्साहित करने आदि के लिए भी तो किया जा सकता है.

सवाल यह है कि बात-बात में चैनलों और अखबारों पर लगाम कसने की धमकी देते रहने वाली सरकार इस मामले में कोई हस्तक्षेप क्यों नहीं करती? भले ही टीआरपी एक विशुद्ध व्यावसायिक प्रतिष्ठान की एक विशुद्ध व्यावसायिक गतिविधि हो मगर यह करोड़ों लोगों के हित-अहित, रुचियों और उनके सुधार आदि से भी तो जुड़ी है. और फिर इससे एक सरकारी प्रतिष्ठान दूरदर्शन के हित भी तो प्रभावित हो रहे हैं.

अगर दूरदर्शन कमाएगा नहीं तो उसे चलाने के लिए सरकार को पैसा खर्चना होगा. पैसा सरकार का न होकर जनता का होगा. तो अंत में जनता के हितों को ही तो नुकसान पहुंचेगा. फिर सरकार ही तो देश की सबसे बड़ी विज्ञापनदाता भी है. तो फिर उसने दूरगामी दुष्प्रभावों वाली इस दोषपूर्ण व्यवस्था को दुरुस्त करने की हरसंभव कोशिश अब तक क्यों नहीं की? मगर जो चैनल आज टीआरपी को पानी पी-पी कर कोस रहे हैं वे भी क्या स्थिति जैसी है उसे वहां तक पहुंचाने के लिए जिम्मेदार नहीं हैं? क्या वे भी एक गलत व्यवस्था का, जब भी वह उनके पक्ष में रही, फायदा नहीं उठाते रहे?

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