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बदलाव का वाहक?

image संजय दुबे, कार्यकारी संपादक

क्या उत्तर प्रदेश की जनता को उस बदलाव की झलक भी दिखाई दे रही है जिसकी उम्मीद वे अखिलेश से लगाए बैठे हैं?

राजनीति की कई विशेषताओं में से एक यह भी है कि यह कई बार अपनी सहूलियत के हिसाब से भविष्य का अंदाजा लगाती है, उसे हम पर थोपती है और फिर उसी के आधार पर हमारे वर्तमान के साथ खिलवाड़ भी करती है. इस बात को 105 दिन पुरानी सरकार वाले उत्तर प्रदेश के नजरिये से देखते हैं.

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार है. यहां महत्वपूर्ण पदों पर बैठे कई ऐसे लोग हैं जो गंभीर आरोपों के घेरे में हैं. थोड़ा खुलकर कहें तो उत्तर प्रदेश में कई अपराधों के कई आरोपितों और दागियों को, उनके सारे किए-धरे को नजरअंदाज करके, जनता के सर-माथे पर बिठा दिया गया है. ऐसा क्यों हो रहा है, का मानक जवाब कश्मीर से कन्याकुमारी तक हमारी राजनीति में एक ही है - उन्हें किसी अदालत ने अब तक अपराधी घोषित नहीं किया है.

माना कि हमारा संविधान कहता है कि जब तक किसी को सजा न हो उसे अपराधी न माना जाए मगर वह यह तो नहीं कहता कि बड़े और जघन्य अपराधों के आरोपितों को तब तक लाखों-करोड़ों लोगों के भाग्य का विधाता बना कर रखा जाए. एक व्यक्ति को जब तक उसका अपराध सिद्ध न हो अपराधी न मानना अलग बात है, लेकिन इस पर कोई अदालती फैसला आने तक उसे सरकारी खजाने और लोगों के अच्छे-बुरे की चाबी सौंपे रखना कितना सही है? अगर बाद में वह अपराधी साबित हो जाता है तो? तब तक क्या वह देश और इसके वासियों का काफी नुकसान नहीं कर चुका होगा? मगर राजनीति के अनुमान उसे कभी वह अपराधी भी हो सकता है, मानने को तैयार नहीं होते. या मानते भी हैं तो यह नहीं मानते कि उन्हें इसके लिए अदालत से सजा भी मिल सकती है. या फिर वे इस बात को तवज्जो देने लायक ही नहीं समझते.

ऐसे अनर्थ की आराधना में उत्तर प्रदेश का हमेशा से ही एक मुकाम रहा है. मगर इस बार अब तक सामान्य-सी मानी जाने वाली यह बात उतनी सामान्य भी नहीं.

अखिलेश यादव को उनकी पार्टी और मीडिया बदलाव का वाहक, नई राजनीति का प्रतीक, प्रयोगवादी समाजवादी, उत्तर प्रदेश का नीतीश कुमार, देश का भविष्य, राहुल का सपाई जवाब और न जाने क्या-क्या विशेषणों से विभूषित करते रहे हैं. अब अगर वही अखिलेश, राजा भैया को पहली खेप में ही सरकार के जेल और खाद्य सरीखे विभागों का सिरमौर बना देते हैं तो बात सामान्य कैसे रह जाती है? इसके बाद अमरमणि, अभय यादव और विजय मिश्रा जैसे सपा के अपराधी या दागी राजनेता जेल को अपना घर समझ लें तो इसमें आश्चर्य कैसा? अगर नौकरशाही के शीर्ष पर बैठे सचिवालय के सबसे महत्वपूर्ण अफसरों पर ही तरह-तरह के आरोप हों और उनकी नियुक्ति का आधार पिछली सरकार ने उनके साथ कितना बुरा किया और जाति-धर्म आदि हों तो आप ऐसों से चलने वाले प्रशासन से स्वच्छता की कितनी उम्मीदें बांध सकते हैं?

आज उत्तर प्रदेश में सुशासन के मुद्दे पर कोई भी सवाल उठाने पर पहला जवाब मिलता है कि नई सरकार है, नया मुख्यमंत्री है उसे हमें थोड़ा समय देना चाहिए. कम से कम छह महीने. यानी फिर से अपनी सहूलियत वाला अनुमान. भविष्य में सब अच्छा होने वाला है अभी चिंता क्यों करना? चलो मान लिया कि अभी अखिलेश यादव की सरकार को ज्यादा समय नहीं हुआ है मगर उनकी सरकार ने बनते ही अपराधियों को उपकृत करते वक्त यह क्यों नहीं सोचा? उनके लिए क्यों सरकार बदलते ही वक्त बदलने का दौर शुरू हो गया? सवाल यह भी है कि इस राज में कानून व्यवस्था पहले से ज्यादा क्यों बिगड़ गई है. माना कि उसे पिछली सरकार के मुकाबले बेहतर करने में थोड़ा वक्त लग सकता है मगर वह कम से कम यथास्थिति में तो रहे.

हो सकता है कि अब तक की जमी-जमाई राजनीति की कुछ 'व्यावहारिक मजबूरियां हों जिनके चलते अखिलेश इतनी जल्दी चीजों को बदलने की स्थिति में नहीं हों. हो सकता है चीजें पूरी तरह से उनके नियंत्रण में अभी नहीं हो. मगर उन्हें कम से कम कुछ 'पूत के पांव पालने में' दिख जाने वाले कदम उठाने से किसने रोका है. प्रबंधन का एक बड़ा सिद्धांत है कि चीजों को शुरुआत से ही नियंत्रित करना होता है. कुछ संदेश शुरुआत से ही जाने चाहिए और ये जुबानी नहीं बल्कि आपके कदमों और क्रियाओं के होने चाहिए. अगर ऐसा न हो तो चीजों के स्थायी रूप से हाथ से निकल जाने का खतरा खड़ा हो जाता है.

हालांकि अखिलेश से पूरी तरह मोहभंग होने जितनी देर कम से कम अभी नहीं हुई है.

मगर इसमें उतनी देर भी नहीं है.

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