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   पथरीली डगर, पथिक अग्रसर
अपने आलोचकों और सलाहकारों की अनदेखी कर वो वहां जा रहे हैं जहां शायद अब कोई नहीं जाता. वो कर रहे हैं जो शायद अब कोई नहीं करता. आम आदमी की तो बात ही क्या बड़े-बड़े राजनीति के धुरंधर भी इससे अचंभित हैं. मगर ऐसा क्यों किया जा रहा है? क्या उनका ऐसा करना गांधी नाम के तिलिस्म को एक बार फिर से रच पाएगा या आने वाले समय में गांधी एक दूसरा राजनीतिक नाम भर रह जाएगा, ये सवाल उठा रही हैं शोमा चौधरी .
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से करीब 300 किलोमीटर दूर स्थित जगदलपुर में शाम के छह बजे हैं. राहुल गांधी के साथ कुछ दुर्लभ लम्हों की तलाश में दिल्ली से आए, चार जीपों में लदे पत्रकार यहां मौजूद हैं. सब कुछ घड़ी के कांटों के मुताबिक चल रहा है. राहुल को आदिवासियों के कुछ प्रतिनिधियों से अकेले में बातें करनी है और वो किसी भी क्षण यहां पहुंच सकते हैं. धीरे-धीरे लोग जुटने लगते हैं. कमरे के भीतर जाने से पहले लोगों की तलाशी ली जाती है और पूछा जाता है. क्या आप आदिवासी हैं? आपका कार्ड कहां है? राहुल से मिलने के उत्साह में कई लोग मीलों पैदल चलकर वहां पहुंचे हैं मगर उन्हें बैरंग लौटा दिया जाता है क्योंकि बैठक सिर्फ आदिवासी प्रतिनिधियों से मिलने के लिए है. पत्रकारों को 100 मीटर दूर रोक दिया गया है क्योंकि राहुल इन क्षणों में मीडिया की घुसपैठ नहीं चाहते.
कुछ मिनट बाद, एकदम सही समय पर कड़ी सुरक्षा व्यवस्था से घिरी राहुल की कार नजर आती है. बाहर बहुत गर्मी है और सिर के ऊपर मच्छर भिनभिना रहे हैं. मीडिया की तरफ ध्यान तक दिए बिना वो सीधा कमरे में घुसते हैं और जमीन पर उकड़ूं बैठ जाते हैं. इतनी दूर से अंदाजा लगाना मुश्किल है कि क्या बात हो रहीं है. आधा घंटे बाद राहुल बाहर आते हैं. अंधेरा हो चुका है. बाहर लोगों की भीड़ उनका इंतजार कर रही है. राहुल के पास आने और उन्हें छूने के उत्सुक लोगों पर सुरक्षाकर्मी काबू पाने की कोशिश करते हैं. कुछ समय तक सोच में डूबे राहुल अचानक भीड़ की तरफ बढ़ते हैं और कुछ लोगों से हाथ मिलाते हैं. हर कोई रोमांचित हो जाता है.
ये राहुल गांधी की ‘भारत खोजो’ यात्रा की एक बानगी भर है. मगर सवाल उठता है कि राहुल ये यात्राएं आखिर कर क्यों रहे हैं? एक ऐसा आदमी, जिसके एक इशारे पर कांग्रेस के सारे दिग्गज उसकी ड्योढ़ी पर नजर आएं, बिना किसी दिखावे के पूरे देश का दौरा क्यों कर रहा है? दौरे भी ऐसे जिनमें न विशाल रैलियां हैं न बड़े-बड़े वादे. राहुल बस 50 से लेकर 500 लोगों और कभी-कभार तो सिर्फ एक परिवार से ही मिलते हैं.
सोचिए कि आप एक भूलभुलैया में हैं. एक ऐसी भूलभुलैया जिसमें कई कमरे हैं और कई ऐसे रास्ते भी जो शुरू तो होते हैं पर थोड़ा आगे जाकर खत्म हो जाते हैं. कल्पना कीजिए कि आपके पास एक ऐसा जादुई फॉर्मूला है जो न सिर्फ आपको इस भूलभुलैया से निकाल सकता है बल्कि उसके बाद आपको ऊंचाइयों के शिखर तक पहुंचा सकता है. मगर ये सूत्र तभी सक्रिय हो सकता है जब आप एक चाबी ढूंढ़ निकालें. आपको ये पता नहीं कि चाबी पाने के लिए किस रास्ते जाना है. मगर फिर भी आपको चलना ही होगा क्योंकि चाबी के बिना फॉर्मूला किसी काम का नहीं.
राहुल गांधी खुद को ऐसी ही स्थिति में पा रहे हैं. उनके पास वो जादुई फॉर्मूला है. यानी वो युवा हैं, उनके पास आकर्षक चेहरा-मोहरा और सदवृत्ति है और सबसे बढ़कर वो गांधी परिवार से हैं.
गांधी परिवार की विरासत को आगे ले जाने का ये समय राहुल के लिए बड़ी चुनौती बनकर आया है. असल में उनसे पहले परिवार में जिस ने भी ये विरासत संभाली है उसके लिए इस जिम्मेदारी को संभालते हुए परिस्थितियां इतनी प्रतिकूल कभी नहीं रहीं. कांग्रेस का एकछत्र राज खत्म हुए लंबा समय बीत चुका है. बल्कि कहा जाए तो पार्टी इस समय बुरे दौर में है. इसमें जोश दिखाई नहीं देता और इसका कैडर इससे दूर खिसक चुका है. कांग्रेस मुश्किल से 10 राज्यों में ही सत्ता में है और केंद्र में इसकी सरकार एक मुश्किल और सीमाओं से भरी रही पारी के अंतिम चरण में है.
उधर, बिखरे जनादेश, जाति समीकरण, असहज गठबंधनों के इस दौर में राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य बेहद जटिल हो चला है. अमीर गरीब के बीच की खाई चौड़ी होती जा रही है और महंगाई के चलते आम आदमी निराश है. चुनाव में एक साल का ही समय बचा है. ऐसे हालात में गांधी नाम जादू की छड़ी तो साबित हो सकता है मगर ऐसा अपने आप नहीं होगा.
यानी राहुल को भूलभुलैया में चलना है और जादुई सूत्र की चाबी ढूंढनी है. इतिहास पर नजर डालें तो ये वो बुनियाद नहीं है जिसके साथ किसी भी गांधी ने अपना सफर की शुरुआत की हो. जवाहरलाल नेहरू ने जब विभाजन की त्रासदी के बाद देश की कमान संभाली थी तो वो निर्विवाद भारत के एक रत्न थे और उन्हें और किसी ने नहीं बल्कि खुद राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने ये उपाधि दी थी. लाल बहादुर शास्त्री की असमय मौत के बाद इंदिरा गांधी को भले ही खुद को जमाने के लिए पार्टी को तोड़ना पड़ा हो मगर तब तक भी कांग्रेस भारत की निर्विवादित संरक्षक थी और उन्हें चुनौतियां पार्टी के भीतर से ही मिल रही थीं. उनकी हत्या के बाद राजीव ने जब कमान संभाली तो उनके पास सहानुभूति और उम्मीदों का वो ज्वार था जैसा इस देश के इतिहास ने पहले कभी नहीं देखा था. सोनिया के पास विदेशी मूल का लाभ था और उन्हें सभी हलके में ले रहे थे.
कई मायनों में देखा जाए तो राहुल गांधी का सफर उनकी पिछली पीढ़ियों से अलग है. फर्क सिर्फ हालात का नहीं है. फर्क इस बात का भी है कि राहुल अपनी मर्जी से चल रहे हैं और उनके कदमों को समझना आसान नहीं.
पांच साल पहले एक फ्लाइट के दौरान निजी बातचीत में उन्होंने किसी से कहा था, “चाहे मुझे पर कितना भी दबाव डाला जाए मैं अपने लिए कोई दावा नहीं कर सकता. मैंने अभी खुद के दम पर कुछ भी नहीं किया है. मैं राजनीति में तभी आऊंगा जब इसके लिए तैयार हो जाऊंगा.”
हालांकि तब तक उन पर पार्टी की तरफ से दबाव पड़ने लगा था. एक साल बाद उन्होंने अपने घर आए एक पत्रकार से कहा, “मैं अभी सीखने की प्रक्रिया में हूं. मैं चीजों को समझने की कोशिश कर रहा हूं. मैं अमेठी में ग्रामीण और जिलास्तर पर काम करके गांव और शहर के बीच के आर्थिक संबंध को समझने का प्रयास कर रहा हूं. मैं तब तक हिलूंगा नहीं जब तक मैं तैयार नहीं हो जाता. चाहे मेरी मां ही मुझसे ऐसा करने के लिए क्यों न कहें.”
कुछ महीने बाद जब उन्होंने उत्तर प्रदेश से चुनाव लड़ने का फैसला किया तो राहुल के एक करीबी मित्र ने तहलका को बताया, “राहुल का राजनीति में आने का फैसला उनका खुद का है. वो ऐसे आदमी नहीं कि बिना सोचे समझे फैसले ले लें. राजनीति में प्रवेश करने पर वो खुश और उत्साहित हैं. वो पूरे जोश के साथ ये काम करेंगे.”
राहुल के एक दूसरे सहयोगी ने जोर देकर कहा था, “किसी तरह की गलतफहमी में न रहें. वो इतने मूर्ख नहीं हैं कि राजनीति में ये सोचकर कूद जाएं कि उनका गांधी परिवार से होना ही काफी है. वो शतरंज के खिलाड़ी हैं. वो तब तक कोई चाल नहीं चलेंगे जब तक वो अगली चार-पांच चालें न सोच चुके हों.”
उसके बाद एक लंबे समय तक ऐसा लगा कि जैसे राहुल को अगली चार-पांच चालें सोचने में मुश्किल हो रही हो. वो अमेठी में व्यस्त हो गए. उन्होंने शिक्षा और गैर सरकारी संगठनों का एक नेटवर्क बनाने पर ध्यान केंद्रित किया. पार्टी में उनके बारे में फुसफुसाहटें शुरू हो गईं. कहा जाने लगा कि उनमें वो करिश्मा नहीं है. मीडिया में भी वो सुर्खियां बनने लगे. बातें होने लगीं कि वो लोगों तक नहीं पहुंच पाते और उन्हें पता नहीं कि लोगों से किस तरह जुड़ा जाता है. उनके पास सोच नहीं हैं. उनमें वो आग नहीं है. उनमें कोई दूरदृष्टि नहीं है. लोकसभा में शिक्षा पर दिये गये उनके पहले भाषण की ये कहकर खिल्ली उड़ाई गई कि ये किसी हाईस्कूल के छात्र जैसा था. संसद में उन्होंने जब गन्ना किसानों पर सवाल पूछे तो किसी ने ध्यान नहीं दिया. उनकी करिश्माई बहन प्रियंका की गैरमौजूदगी हर जगह महसूस की जा रही थी.
मगर राहुल डटे रहे. जैसा कि उन्होंने अनौपचारिक बातचीत में एक पत्रकार से कहा था, “मीडिया चाहता है कि हथेली पर सरसों जम जाए. मगर ऐसा नहीं होता. इसमें वक्त लगता है. आप और मैं दोनों मूर्ख होंगे अगर हम ये कहें कि हम एक हफ्ते में ये कर दिखाएंगे. मैं राजनीति अपनी तरह से करूंगा और अपना वक्त लूंगा. कोई भी मुझे कुछ करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता.”
खुद को जिलाने वाले किसी भी तत्व की नामौजूदगी में धीरे-धीरे पार्टी ने हार मान ली और मीडिया ने उनमें दिलचस्पी लेना छोड़ दिया.
फिर अचानक दो महीने पहले चीजें बदलनी शुरू हुईं. मार्च के पहले हफ्ते में राहुल अचानक अपनी भारत खोजो यात्रा पर निकल पड़े. उड़ीसा के कालाहांडी से शुरुआत करते हुए वो राज्य के दलित और आदिवासी बहुल इलाकों में घूमे. वो नियमगिरी की पहाड़ियों में गए जहां स्थानीय आदिवासी वेदांता-स्टरलाइट की प्रस्तावित खदानों के विरोध में मोर्चा खोले हुए हैं. वो कोरापुट जिले में भी पहुंचे जहां उन्होंने एक घंटे तक साढ़े चार सौ स्कूली बच्चों से बातचीत की. वो गोपालपुर और कमालपुर में मछुआरों से मिले. जयपुर ने उन्होंने किसानों की एक रैली को संबोधित किया. एक रात तो वो सुरक्षा को धता बताकर अकेले ही आदिवासियों से मिलने जंगलों में निकल पड़े. साफ था कि वो सीधे तौर पर लोगों से जुड़ना चाहते थे. कर्नाटक में भी वो कई बार सुरक्षा घेरे को तोड़कर लोगों की झोपड़ियों में घुस जाते और बच्चों से हाथ मिलाते. राज्य में जिन आठ जिलों में वो गए उनमें से कहीं भी कांग्रेस मजबूत स्थिति में नहीं थी. मगर राहुल के दौरे चुनावी प्रचार के लिए नहीं बनाए गए थे. अगर ऐसा होता तो वो बड़ी रैलियां करते जिनमें भीड़ जुटाई जाती और खोखले दावे किए जाते. मगर उनके दौरे अलग ही तरह के थे.
राहुल के दौरों का कार्यक्रम इस तरह बनाया गया था कि वो दलितों, आदिवासियों, गैर सरकारी संगठनों और छात्रों से व्यक्तिगत तौर पर संवाद कर सकें, वो भी मीडिया की गैरमौजूदगी में. न पार्टी का तामझाम और न राज्य के वरिष्ठ नेता. राहुल के एक विश्वस्त सहयोगी कहते हैं, “उनके दौरे राजनीतिक नहीं हैं. अगर मीडिया या दूसरे लोगों की भीड़ जमा हो तो वो ईमानदारी से संवाद नहीं कर सकते. अकेले में लोग ज्यादा खुलकर बात करते हैं. इससे उन्हें ज्यादा सीखने को मिलता है.”
एक हफ्ते पहले छत्तीसगढ़ में पत्रकारों के एक दल से राहुल ने कहा था, “मैं सुनना चाहता हूं. मेरा काम है सुनना और सीखना. सत्ता के गलियारों में गरीबों की बात नहीं सुनी जा रही है. हम सही तरह से उनकी पहचान नहीं कर पा रहे. मैं जितना अधिक हो सके ऐसा करना चाहता हूं.”
ये अप्रैल की एक जलती दुपहरी थी. एक स्कूल के कमरे में बैठे लोगों पर सुस्ती छाई थी और हर कोई राहुल के आने का इंतजार कर रहा था. राहुल फुर्ती के साथ वहां दाखिल हुए. वो चप्पलें पहने हुए थे और उनके कुर्ते पर धूल जमी हुई थी. थोड़ी देर खामोशी रही फिर अचानक ही वो उत्साह भरे स्वर में बोले, “आप लोग बहुत सुस्त लग रहे हैं आज. ज्यादा गरमी लग रही है क्या?” उनके इस मस्तमौला लहज़े ने शोरशराबे के बीच सवाल-जवाब का एक अनौपचारिक दौर ही शुरू कर दिया. हर कोई चिल्ला रहा था और माहौल गर्म हो गया था. विशेषकर एक नाराज पत्रकार अपने सवाल, जो कि ऐसा लग रहा था कि वो स्थानीय नेताओं के कहने पर पूछ रहा है, का जवाब न मिलने पर गुस्से से आगबबूला हो रहा था. राहुल ने हंसते हुए कहा, “आप सब लोग तो आपस में ही लड़ रहे हैं फिर आप मुझसे क्यों नाराज हो रहे हैं.” बाद में वो मंच से नीचे आ गए और भीड़ में घिरे राहुल ने उस नाराज पत्रकार को गले लगाते हुए कहा, “आप पॉलिटीशियन हैं कि जर्नलिस्ट.” पत्रकार ने पूरी तरह से हथियार डाल दिए. कमरे में राहुल की मौजूदगी से एक रोमांच पैदा हो गया था. अगले ही पल हेलीकॉप्टर का शोर हुआ और राहुल जा चुके थे.
राहुल राजनीति में ऐसे समय में उतरे हैं जब इस देश में न तो हाल ही में आजाद होने वाली भावुकता बची है और न हालात में कुछ ऐसी असाधारणता है जो दूसरे गांधियों को ऊंचाई पर ले गई थी. ये भी दिलचस्प है कि चार पीढ़ियों के बाद वंशवाद और युवराज जैसी तमाम आलोचनाओं के बीच गांधी नाम असल में लोकतांत्रिक होने और परखे जाने की प्रक्रिया में है. लेकिन पार्टी के भीतर नहीं बल्कि राष्ट्रीय परिदृश्य में क्योंकि पार्टी में तो उनकी जगह निर्विवादित है. गांधी परिवार से होने के कारण राहुल वो तुरुप का इक्का हैं जो किसी दूसरी पार्टी के पास नहीं है. वो एक ऐसे युवा नेता हैं जिनमें सारे भारत को लुभाने की क्षमता है. आजादी के बाद के 60 में से 40 सालों में देश पर उनके परिवार का शासन रहा है. मगर राहुल जानते हैं कि गांधी होना भले ही एक जादुई फॉर्मूला हो, मगर हर पीढ़ी को एक नई तरह से खुद को साबित करना पड़ता है और इसके बाद भी असफलता की संभावनाएं खत्म नहीं होती. इंदिरा गांधी को ही लीजिए जिन्हें इमरजेंसी के बाद 1977 में जबर्दस्त हार का सामना करना पड़ा था. राजीव गांधी भी पांच साल बाद जनादेश खो बैठे थे और 2004 में अपनी पार्टी को जीत दिलाने के बावजूद सोनिया को ‘अंतरात्मा की आवाज’ पर और परिस्थितिवश प्रधानमंत्री पद का बलिदान देना पड़ा था.
तो राहुल का रास्ता क्या होगा? पारंपरिक जादू की छड़ी वाला तरीका (यानी विधानसभा चुनावों से दो दिन पहले हवाई दौरे करना और सोचना कि गांधी नाम का करिश्मा वोटों को अपनी तरफ खींचेगा) तो उत्तर प्रदेश और गुजरात में आजमाया जा चुका है. ये बुरी तरह से नाकामयाब रहा. अब राहुल के ये दौरे नई सोच और नई रणनीतियों का संकेत देते हैं. शुरुआती प्रेरणा, पिता राजीव गांधी द्वारा 1985 में कांग्रेस की स्थापना के शताब्दी दिवस पर दिए गए भाषण में से हो सकती है. शुचिता, सबकी भागीदारी और सुविचारों की राजनीति पर जोर देते हुए हुए
राजीव ने उस भाषण में बरसते हुए कांग्रेस को सत्ता के दलालों की पार्टी बताया था. उन्होंने महात्मा गांधी की इस उक्ति का हवाला भी दिया था, “मैं तुम्हें एक ताबीज देता हूँ. जब भी दुविधा में हो या जब अपना स्वार्थ तुम पर हावी हो जाए, तो इसका प्रयोग करो. उस सबसे गरीब और दुर्बल व्यक्ति का चेहरा याद करो जिसे तुमने कभी देखा हो, और अपने आप से पूछो- जो कदम मैं उठाने जा रहा हूँ, क्या वह उस गरीब के कोई काम आएगा?.”
लगता है कि राहुल कूद पड़े हैं. लगता है कि उन्होंने खुद को दिल्ली की समीकरणों, धोखेबाजियों और दोषारोपणों वाली राजनीति से दूर कर लिया है. एक ऐसी राजनीति जहां जो दिखता है वो वैसा होता नहीं. राहुल ने सबसे गरीब और कमजोर आदमी के चेहरे की तलाश शुरू कर दी है. कभी ऐसी ही यात्रा महात्मा गांधी, नेहरू और कुछ अलग तरह से इंदिरा और सोनिया ने भी की थी. राहुल को इस बात का श्रेय दिया जा सकता है कि वो गरीबों के बारे में कोई बनी बनाई धारणा लेकर नहीं चल रहे हैं. दलित और आदिवासी कांग्रेस का परंपरागत वोटबैंक रहे हैं. उनकी दादी इंदिरा गांधी ने ‘गरीबी हटाओ’ जैसा मशहूर नारा दिया था. मगर उपेक्षा और जाति की राजनीति इस वोट बैंक को कांग्रेस से दूर ले गई. राहुल इस संबंध को पुनर्जीवित करके फिर से एक नई बुनियाद डालने की कोशिश कर रहे हैं.
सवाल उठता है कि क्या ये लंबी पारी वाले एक खिलाड़ी की दूरदृष्टि और चतुरता है या फिर राजनीतिक आत्महत्या? आम चुनाव बस एक साल दूर हैं और मैदान में मायावती, मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, जयललिता, नरेंद्र मोदी और चंद्रबाबू जैसे चतुर विरोधी हैं. युवा कांग्रेस के एक पूर्व अध्यक्ष नाराजगी भरे स्वर में कहते हैं, “उनके सलाहकार उन्हें सीधे मायावती के मुकाबले उतार रहे हैं. ये कितना समझदारी भरा हो सकता है? आप लड़ाई के बीच में खड़े होकर भविष्य के युद्ध की रणनीति नहीं बना सकते. आपके दुश्मन आपको खत्म कर देंगे. वो भले ही दीर्घकालीन योजना बना रहे हों मगर उनकी फौरी योजनाएं क्या हैं?”
एक वरिष्ठ मंत्री कहते हैं, “उनके पास एक अच्छे इंसान वाले सभी गुण हैं. वो विनम्र और ईमानदार हैं मगर सिर्फ गरीबों का समर्थक दिखना और उनके साथ सहानुभूति रखना ही काफी नहीं है. उनकी दृष्टि क्या है? वो पार्टी को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं? औद्योगीकरण, परमाणु समझौते, मायावती..पर उनका रुख क्या है? वो कौन से नए गठबंधन बना रहे हैं? वो कांग्रेस महासचिव हैं मगर क्या वो इस बात का फैसला कर रहे हैं कि किसे टिकट दिया जाना चाहिए? राजनीतिक नेतृत्व का मतलब है कि आप जहां अवसर हो वहां से समर्थन जुटाएं. उन्होंने अब तक कोई ऐसी नेतृत्व क्षमता नहीं दिखाई है. ठीक है वो चापलूसी को नापसंद करते हैं मगर पार्टी में नए लोगों तक सक्रियता से पहुंच भी तो नहीं रहे हैं.”
जाहिर है इन आलोचनाओं से राहुल अनजान नहीं हो सकते. मगर वो अपने मकसद पर कायम हैं. ये मकसद है गरीबों से जुड़ना और पार्टी के युवा कैडर को फिर से जिंदा करना जिसकी पार्टी को सबसे ज्यादा जरूरत है. हाल में उन्होंने कैबिनेट में मंत्री पद ठुकरा दिया ताकि वो अपनी उन प्राथमिक जिम्मेदारियों पर ध्यान लगा सकें जिनके प्रति वो प्रतिबद्ध हैं. ये हैं युवा कांग्रेस और इसका छात्र संगठन एनएसयूआई. वो इस पर जमकर मेहनत कर रहे हैं. वो नए सदस्य बना रहे हैं, कंप्यूटरीकरण कर रहे हैं, डाटाबेस सुधार रहे हैं और जाली सदस्यताओं को खत्म कर रहे हैं.
ये एक अच्छा, चमकदमक हीन और दीर्घकालिक काम लगता है जो राष्ट्रीय राजनीति में होने वाली आम गतिविधियों से अलग है. उड़ीसा में युवा कांग्रेस के अध्यक्ष अशोक तंवर बताते हैं कि राहुल के दौरे के बाद सदस्यता के लिए 44,000 नए आवेदन आए हैं. कर्नाटक में ये आंकड़ा 63,000 है. जमीनी स्तर पर उत्साह साफ महसूस किया जा सकता है. ऐसा बहुत समय बाद हुआ है कि कांग्रेस का कोई बड़ा नेता, खासकर गांधी परिवार से कोई इस तरह के काम में जुटा हो.
जैसा कि राहुल के साथ फ्यूचर चैलेंज कमेटी में शामिल सांसद सचिन पायलट कहते हैं, “वो चुनावी कैलेंडर को देखकर काम नहीं कर रहे. चुनाव तो लोकतंत्र की प्रक्रिया का सिर्फ एक हिस्सा है. वो जमीनी स्तर पर पार्टी को हरकत में ला रहे हैं और संगठन के ढांचे पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं. निश्चित रूप से इसके बड़े राजनीतिक फायदे भी होंगे.”
चार साल पहले एक बार राहुल ने एक अनौपचारिक बातचीत में कहा था, “कांग्रेस में नाकामयाबी का एक डर भरा हुआ है. लोग कहते रहते हैं कि अगर कुछ गलत हो गया तो क्या होगा. अगर इससे बात नहीं बनी तो क्या होगा. मैं जब भी कुछ करना चाहता हूं तो पार्टी में ये डर होता है कि कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाए.”
सलाहों को अनसुना कर अपने विश्वास के बूते काम करने के लिए साहस की जरूरत होती है. पार्टी के भीतर राहुल की जो आलोचना हो रही है उसमें से ज्यादातर को एक बड़े चुनाव में उतरने जा रहे खिलाड़ियों की हड़बड़ाहट मानकर खारिज किया जा सकता है. मगर कुछ चीज़ें ऐसी हैं जिन पर राहुल को ध्यान देने की जरूरत होगी. भारतीय लोकतंत्र अपनी असंभावनाओं के लिए जाना जाता है. ये सच है कि कोई भी ठीक-ठीक तरह से नहीं बता सकता कि जनता के साथ सीधे जुड़ने की इन कोशिशों का असर क्या होगा. वैसे जहां तक राहुल के आकर्षण, हाव-भाव और लोगों के साथ उनकी सहजता का प्रश्न है तो पिछले महीने के दौरान इन मोर्चों पर उन्होंने काफी तरक्की की है.
जैसे कि एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता समझाते हैं, "आज एक भी ऐसा नेता नहीं है जिस पर जनता विश्वास करती हो, एक भी ऐसा नहीं है जो खुलेआम बेइमानी नहीं कर रहा हो. किसी को भी राजनीति में सच्चाई और ईमानदारी के महत्व को नकारना नहीं चाहिए." लेकिन ये भी ध्यान रखना होगा कि साफ-सुथरी छवि वाले उनके पिता की अच्छे विचारों और निश्छलता से भरी कहानी अभी इतनी पुरानी थोड़े ही हुई है.
राहुल के सामने सबसे बड़ा सवाल उनकी नीयत नहीं बल्कि दूरदृष्टि को लेकर है. वो किस चीज़ के हिमायती हैं? उनकी बड़ी सोच क्या है? भारत जैसे जटिल देश में सही क़दम उठाना काफी मायने रखता है और अगर उनके बांग्लादेश के निर्माण और बाबरी मस्जिद से जुड़े बयान पर ध्यान न दिया जाए तो वे इस दिशा में सही प्रयास कर रहे हैं. बुंदेलखंड-झांसी का उदाहरण सामने है जहां वे विरोध कर रहे किसानों के साथ सड़कों पर बैठ गए और फिर एक बस में बैठकर उन्हें नौकरी दिलाने के लिए जिलाधिकारी कार्यालय जा पहुंचे. मायावती हिल गईं. भले ही ये एक हाथी को किसी छोटे कीड़े के काटने जैसा हो पर इस दंश की कुछ पीड़ा तो थी ही.
जब उन्होंने एक दलित परिवार के झोपड़े में रात बिताई और अगले दिन इटावा में उस परिवार के पास पहुंचे जिसके छह सदस्यों की हत्या हो गई थी तो मायावती ने ताना मारा कि दलितों से मिलने के बाद दिल्ली पहुंचने पर राहुल विशेष साबुन से नहाते हैं. (छत्तीसगढ़ में अपनी प्रेसवार्ता में साबुन के बारे में पूछने पर वो अपने धूल भरे कपड़ों की ओर इशारा कर हल्के से मुस्करा दिए). नियमगिरी के दौरे के बाद उन्होंने आदिवासियों का पक्ष लिया और वेदांता के खिलाफ बयान दिया. बाद में उन्होंने इसमें जोड़ा, "औद्योगीकरण को रोका नहीं जा सकता लेकिन जनता की आवाज़ ही नहीं सुनी जा रही है. उनको भी सुनना होगा."
उनके सार्वजनिक बयानों और सरोकारों का अध्ययन करें तो एक दिलचस्प तस्वीर उभरती है. वे कई तरह के सरोकारों और दृष्टिकोण के विकास की प्रक्रिया दर्शाते हैं मगर दूरदृष्टि का संकेत नहीं देते. शिक्षा, पंचायती राज, सामाजिक न्याय, आर्थिक पुनर्वितरण, ज्यादा प्रभावी वितरण प्रणाली, जन संघर्ष और पार्टी को पुनर्जीवन—नि:संदेह सूची काफी सम्मानजनक और लंबी है. शायद यही वो कारक हैं जो आने वाले समय में लोगों को जात-पांत के बंधनों से ऊपर उठकर वोट देने के लिए प्रेरित कर सकते हैं. लगता है राहुल अपने पिता की तरह ही ऐसी राजनीति करने की कोशिश कर रहे हैं जो जाति और पहचान से परे हो लेकिन प्रश्न ये है कि वो परिस्थितियों को संभालने-सुधारने में किस हद तक सफल होंगे?
उड़ीसा के चार दिनों के दौरे की समाप्ति के बाद उन्होंने प्रेस से कहा, "भारत एक लोकतांत्रिक देश है, लेकिन यहां किसी पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र नहीं है." कुछ दिन बाद कर्नाटक के मंगलोर में छात्रों से मुखातिब राहुल ने कहा, "गांधी नाम का अपना एक फायदा है, लेकिन उस फायदे को खत्म करने के लिए आप जैसे ज्यादा से ज्यादा लोगों को राजनीति में आना चाहिए." छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा, "सरकारें गरीबों के प्रति जिम्मेदार नहीं रह गई हैं. इससे नक्सलवाद को बढ़ावा मिला है." स्पष्ट रूप से राहुल के भीतर ईमानदारी की भूख दिखती है, लेकिन ये भूख कितनी बड़ी है? क्या वो इस भूख को पूरी तरह से शांत करने के प्रति दृढ़ हैं? क्या उनके भीतर असल लड़ाई के लिए भी भूख है? क्या उनके पास कोई बड़ी योजना है जो वर्तमान राजनीतिक सच्चाइयों की जगह ले सके?
सामाजिक टिप्पणीकार प्रताप भानु मेहता कहते हैं, "राहुल के बारे में जो चीज़ मुझे चिंता में डालती है वो ये कि वो अच्छे विचारों की राजनीति की बात करते हैं लेकिन हमें अभी भी ये पता नहीं है कि वो आखिर चाहते क्या हैं?" वो हमेशा मुद्दों से बचने की कोशिश करते दिखते हैं. महासचिव के तौर पर उन्हें पार्टी की नीतियों की व्याख्या करनी चाहिए. भारत, जो विश्व अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन रहा है, इस पर उनकी सोच क्या है? परमाणु समझौते पर उनके क्या विचार हैं? कृषि सुधारों पर वो क्या सोचते हैं? क्या वो अपने दौरों से लौटकर फिर पहले जैसे हो जाते हैं? बात ये है कि उनमें पर्याप्त मौलिकता नहीं है. जब वो युवाओं और भविष्य की बात करते हैं तो उन्हें युवा नेताओं को भी पेश करना चाहिए. ज्योतिरादित्य को मध्य प्रदेश में क्यों नहीं पेश किया जाता? अपनी यात्राओं के दौरान वो सचिन पायलट, मिलिंद देवड़ा, संदीप दीक्षित जैसे चेहरों को क्यों नहीं आगे लाते? क्या वो पुराने लोगों को हटाकर नयों को लाने के लिए की इच्छा रखते हैं या फिर जो है जैसा है ठीक ही है? राहुल के लिए ये बड़ा सवाल है.
कर्नाटक दौरे पर बंगलोर में भारतीय विज्ञान संस्थान के छात्रों को संबोधित करते हुए उन्होंने युवाओं से कांग्रेस में शामिल होने का आह्वान किया. सम्मेलन में मौजूद एक युवती पर इसका कोई खास असर नहीं पड़ा. उसका कहना था, "वो अपनी वाक क्षमता की परीक्षा ले रहे थे और कुछ नहीं. नज़रिए का सर्वथा अभाव था, हां जोश जरूर था ."
एक पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री कहते हैं, "आप अभी से कुछ भी क्यों सोचते हैं? वो पार्टी का नेतृत्व करेंगे लेकिन वो अभी सिर्फ 37 साल के हैं. उन्हें बड़ा होने दीजिए. उनके सामने एक लंबी पारी पड़ी है. अगर इंदिरा गांधी की हत्या नहीं हुई होती तो 1985 में राजीव गांधी ने कमान थोड़े ही संभाली होती."
हो सकता है उनकी बात में दम हो. पीढ़ियों के अंतर के साथ उम्मीदों का बोझ भी बढ़ता जाता है लेकिन फिर भी प्रशिक्षण की जरूरत तो होती ही है.
राहुल इस समय असमंजस में हैं. वो खुद को मांजना और लंबी पारी खेलना चाहते हैं लेकिन उनकी पार्टी चाहती है कि वो 2009 के चुनावों में पार्टी की जीत सुनिश्चित करें. वर्तमान में उन्हें प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में पेश करने की सुगबुगाहट चुनावों के नजदीक आने के साथ ही और तेज़ी पकड़ सकती है. लेकिन फिर भी पार्टी उन्हें अपने चुनावी अभियान के मुख्य चेहरे के रूप में पेश करने का ख़तरा नहीं उठाना चाहती. मजे की बात ये है कि पुराने कांग्रेसियों के रिश्ते राहुल के साथ बहुत सहज नहीं हैं. राहुल उनका तुरुप का इक्का है और वो उनसे प्रदर्शन की उम्मीद भी करते है लेकिन उन्हें इस बात का भरोसा नहीं है कि जीत के बाद राहुल की प्राथमिकताओं में उनकी जगह क्या होगी.
राहुल पार्टी में किसी तरह की दखलअंदाजी और पार्टी में किसी तक पहुंचने की कोशिश नहीं करते. वो एक छोटी, मजबूत और बहुत ही लो-प्रोफाइल विशेषज्ञों की टीम से घिरे रहते हैं जिनमें मनोज मुत्तू (पूर्व वायु सेना अधिकारी), कनिष्क सिंह (सहपाठी, कंप्यूटर इंजीनियर, पूर्व विदेश सचिव और राज्यपाल एस के सिंह के पुत्र), जितेंद्र सिंह(पूर्व युवा कांग्रेस नेता और वर्तमान में एआईसीसी सचिव), मीनाक्षी नटराजन (पूर्व एनएसयूआई अध्यक्ष और वर्तमान एआईसीसी सचिव), किशोरी शर्मा और सचिन राव (मिशीगन यूनिवर्सिटी से एमबीए) शामिल हैं.
समय और चुनौतियां ही तय करेंगी कि क्या राहुल अपने पूर्वजों की तरह एक दिग्गज राजनेता बनेंगे जिसमें साहस, रचनात्मकता, चालाकी, निर्णय लेने की क्षमता और संबंध विकसित करने वाली काबिलियत हो. जो चीज़ पहले से ही उनके पक्ष में है वो है उनकी विनम्रता और उद्देश्यों की पवित्रता जो आज की राजनीति में दुर्लभ है. और ये सहज ज्ञान भी कि दिल्ली में बैठकर कोई भी आज तक चुनाव नहीं जीता. राहुल जानते हैं कि वे एक एक लंबे और पथरीले रास्ते के मुसाफिर हैं. उन्हें पता है कि उन्हें जनता के पास जाना ही होगा. कांग्रेस भले ही जल्दी में हो लेकिन राहुल के दौरे उनकी यात्रा की शुरुआत भर हैं. और साथ ही उस चाबी की खोज भी जो गांधी नाम के जादू को एक बार फिर से दुनिया के सामने ला सके.
(फोटो : शैलेंद्र पांडेय)
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कुल टिप्पणियां: 8
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प्रेषक : D.Sangeetha raoDear sir,During UP elections Rahul ji had made some statements that on Ayodhya and Bangladesh. When some news papers written about the statements. In dainik jagaran Sh. Kuldeepnayyar ji wrote a article on the subject and suggested to Rahul ji to read his Nanaji's "Discovery of India" So after read the book Rahul ji started his Bharat yatra to find out what in India.Because he did not know what is poor and hungry, So he search for poor and hungry in the country. Thank you sir,
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प्रेषक : naresh mittaldoing good job irrespective of any and every criticism, let others at least try, has anybody dared to bear the chills he is doing out of the air conditioners?
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प्रेषक : राकेशराहुल गांधी से विस्तृत जान-पहचान कराने के लिए आपका शुक्रिया. बस एक अनुरोध, राहुलजी तक यदि पहुंचाया जा सके तो कृपया ज़रूर प्रयास कीजिएगा: जिस ग़रीबी, मुफ़लीसी, दलितों और आदिवासियों की बदहाली को जानने, समझने, महसूसने के लिए राहुलजी देश के दूर-दराज का दौरा कर रहे हैं; दिल्ली में भी महसूस कर सकते हैं. कैसे मान लें कि वे बंत सिंह को नहीं जानते जिनके हाथ-पांव अमीर जाटों ने काट लिया था पंजाब में ... संभव है व्यस्ताओं की वजह से राहुल तहलका पढ़ने का समय न निकाल पाते हों पर तहलका ने बंत सिंह के इलाज के लिए जो अभियान छेड़ा था आर्थिक मदद जुटाने का, राहुलजी की सलाहकार मंडली के किसी सहृदय सदस्य ने उन्हें शायद बताया भी हो (बशर्ते उन्होंने ख़ुद महसूस किया हो). नर्मदा से लेकर नेतरहाट, कोयल कारो ... तमाम जगहों पर आदिवासियों के साथ हो रहे छल से राहुलजी वाकिफ़ तो होंगे ही. केरल में जारी मछुआरों के संघर्ष ने भी कभी राहुलजी की चेतना को दस्तक दी हो. शायद राहुलजी को किसी ने ये भी बताया हो कि फिलहाल कॉमनवेल्थ गेम्स विलेज प्रॉजेक्ट में मज़दूरी करने वालों में दलितों और आदिवासियों की ही बड़ी तादाद है. दिल्ली में भवनों और सड़कों के निर्माण में लगे कामगारों में दलितों और आदिवासियों की वही आबादी शामिल हैं जिनके नाते-रिश्तेदारों को कहीं नक्सली तो कहीं फिरकापरस्त बता कर सलाखों के अंदर रखा गया है, और जिनका बहुत बड़ा तबक़ा कहीं-कहीं देश के 'विकास' के नाम पर बेदखल कर दिया गया है. राहुलजी ये भी जानते होंगे कि दलित घरों के बच्चों को आज भी राजधानी दिल्ली के स्कूलों में बहुत मुश्किल से दाखिला मिल पाता है, हज़ारों बाहर ही रह जाते हैं. उनके दोपहर के भोजन को सरकारी कर्मचारी और अधिकारी मिलकर चट कर देते हैं. दुर्व्यवहार झेलने के लिए जैसे वे जाते ही हैं स्कूलों में. राहुलजी भूख, भय और भ्रष्टाचार की चपेट में अकसर दलित और आदिवासी ही आते रहे हैं, समय और स्थान चाहे जो भी रहा हो. जब दौरा कर ही रहे हैं राहुलजी तो कहिएगा दिल्ली में कुछ जगहों पर मैं आपको घुमाना चाहूंगा जहां के दलित बच्चे महानगर में रहने के बावजूद अपने लिए जाति प्रमाण पत्र भी नहीं बनवा पा रहे हैं. ऐसे तो घूमते ही रह जाइएगा आप. विद्वान सलाहकार मंडल तो आपके साथ चिपक कर संगठन में रसूखदार तो बने रहना चाहेंगे ही. उनके पास सलाहों का जखीरा है. आपको देश भर में दौडा-दौड़ा कर थका देंगे उसके बाद आप और कुछ सोचने लायक नहीं रह जाएंगे. मैं नयी बात नहीं कह रहा हूं. समय मिले तो विचार कीजिएगा.
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प्रेषक : amrish shuklarahul ke bare main jitna vistar se is lekh main bataya gaya hai sarahneey hai. ye un logon ke liye bahut helpful hai jo rahul ke bare main jyada janna chahte hain.
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प्रेषक : भागीरथराहुल गांधी आजकल भारत को समझने और जानने के लिए सबसे पिछडे राज्यों के दौरे पर हैं, उसके पीछे उनकी मंशा कतई लोगों का दुख दर्द बांटना या उन्हें उन्हें समस्याओं से निजात दिलवाना नहीं है। वे तो अपना और अपनी पार्टी का उल्लू सीधा कर रहे हैं। मुझे याद है जब वह बुंदेलखंड दौरे पर थे, तो मैं बांदा जिले में उपस्थित था। मुझे उस वक्त लगा वो सचमुच गरीब किसानों का भला चाहते हैं। लेकिन अगले ही दिन मेरा यह भ्रम टूट गया जब मैनें उन्हें आईपीएल के मैच का मजा लेते देखा। एक ही दिन में बुंदेलखंड के किसानों के बदतर हालात को भूलकर कैसे किसी को मैच सुहा सकता है। क्योंकि बुंदेलखंड की गरीबी और किसानों की बदहाली को देखकर किसी संवेदनशील इंसान को नींद तक नहीं आनी चाहिए। वहां भूख से मरते किसानों के मुरझाए चेहरे को भूलकर कैसे कोई अपना मनोरंजन करने के लिए मैच का आनंद ले सकता है। अगर राहुल गांधी सचमुच उनके हितैषी हैं तो उनकी हालात देखकर उनकी नींद और चैन उड जाना चाहिए था।
























