राजनीति का हम्माम और नंगे हुक्काम
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   फिर से राहुल उदय?

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जब वे सांसद बने थे तो इसे भारतीय राजनीति में उनके उदय के रूप में देखा गया था. दूसरी बार राहुल के उदय की बातें तब की गईं जब उन्हें पार्टी में महासचिव का पद दिया गया. अब एक बार फिर से उनके उदय की बातें की जा रहीं हैं...  

अचानक ही जैसे कई चीज़ें बहुत ज़रूरी और महत्वपूर्ण हो गई हैं. अचानक ही अमेठी से सांसद राहुल गांधी नेताओं जैसा व्यवहार करने लगे हैं. वे गंभीर विषयों पर चर्चा करने लगे हैं जैसे कि विदर्भ के किसान, पंचायती राज, राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना आदि-इत्यादि. वे, उन्हें कहां और कब जाना है इस पर भी पूरा ध्यान दे रहे हैं. मसलन उड़ीसा में आदिवासियों के साथ समय बिताने के बाद ज़रूरत होने पर वो तुरंत ही एक दलित परिवार से मिलने के लिए उत्तर प्रदेश पहुंच जाते हैं. अचानक ही गैर-कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्री उन्हें एक राजनीतिज्ञ के रूप में स्वीकार करने लगे हैं. अंदरूनी स्तर पर भी गांधी बदलाव की बयार चला रहे हैं. वे पार्टी में हाईकमान कल्चर पर सवाल उठा रहे हैं और उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी का भी पुनर्गठन करने के प्रयास कर रहे हैं जैसे कि सभी पूर्व अध्यक्षों को इसमें शामिल करना.

तो क्या राहुल अंततः कमान अपने हाथ में लेने जा रहे हैं? हालांकि पार्टी के नेता इसे सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं करेंगे मगर अकेले में वे ये मानते हैं कि राहुल ने उस दिशा की ओर चलना शुरू कर दिया है. “वे असल में दो चीज़ों पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहे हैं: पार्टी के भीतर, वे इसे पुर्नसंगठित करने और इसके ढांचे को आधुनिक बनाने की कोशिश कर रहे हैं. और बाहर वे दलितों के पार्टी से दूर जाने के कारण जानने और उन्हें फिर से अपनी और आकर्षित करने के प्रयास कर रहे हैं.”, एक वरिष्ठ पार्टी नेता, जो कि राहुल गांधी के साथ कांग्रेस की फ्यूचर चैलेंज कमेटी में शामिल हैं, बताते हैं.

यही बात उनके दलित बाहुल्य औऱ सूखे की मार झेल रहे बुंदेलखण्ड के दौरे के पीछे के राजनीतिक गणित की व्याख्या कर देती है जहां उन्होंने अपने भाषणों में बताया था कि कैसे पिछड़े इलाकों के लिए सरकार द्वारा निर्धारित धन भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है. 15 मार्च को अचानक ही वे इटावा पहुंच गए जहां एक दलित परिवार के पांच सदस्यों की हत्या कर दी गई थी.

“कोई नहीं जानता कि हाल ही में उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के युवा कार्यकर्ताओं से बात कर ये जानने की कोशिश की थी कि ऐसा क्या है जो उन्हें बीएसपी की तरफ खींचता है और कांग्रेस में क्या कमियां हैं.”, एक कांग्रेसी नेता गुपचुप तरीके से बताते हैं. 

“कोई नहीं जानता कि हाल ही में उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के युवा कार्यकर्ताओं से बात कर ये जानने की कोशिश की थी कि ऐसा क्या है जो उन्हें बीएसपी की तरफ खींचता है और कांग्रेस में क्या कमियां हैं.”, एक कांग्रेसी नेता गुपचुप तरीके से बताते हैं. उत्तर प्रदेश में एक दलित परिवार के साथ रात गुज़ारने और उड़ीसा में आदिवासियों के साथ खाना खाने के अपने ही मकसद थे. उत्तर प्रदेश में तो पार्टी की राज्य इकाई निराश और नाराज़ बीएसपी कार्यकर्ताओं की पहचान करने और उन्हें कांग्रेस में शामिल करने की संभावनाएं भी तलाश रही है.

उड़ीसा में बिताए चार दिनों में राहुल ने वहां के तीस में से तेरह ज़िलों और भुखमरी के केन्द्र कालांहांडी,बोलांगीर और कोरापुट के दौरे किए. यहां उन्होंने डोंगरिया और झरनियां जैसे पिछड़े आदिवासी समुदायों के सदस्यों से तसल्ली से बातचीत की और एक जंगल बचाओ रैली को भी संबोधित किया. यहां तक कि उन्होंने यहां पर एक प्रेस कांफ्रेंस को भी संबोधित किया जैसा कि वो शायद ही कभी करते हों.  

उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके के झांसी ज़िले में अपने पिता राजीव गांधी की स्मृतियां ताज़ा कराते हुए उन्होंने कहा, “मेरे पिता अक्सर कहा करते थे कि जनता के लिए निर्धारित 100 रुपयों में से केवल 15 पैसे ही उन तक पहुंचते हैं मगर मैं कह रहा हूं कि केवल पांच पैसे ही ज़मीन तक पहुंचते हैं” उनका इशारा राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी योजना में फैले भ्रष्टाचार की तरफ था और वो जहां भी वो जाते हैं उनका ध्यान इस योजना पर रहता ही रहता है. कुछ ही महीनों पहले उन्होंने रोज़गार गारंटी योजना के दूसरे चरण में सुल्तानपुर ज़िले को शामिल करना भी सुनिश्चित कराया था. दरअसल उनका संसदीय क्षेत्र अमेठी इसी ज़िले में आता है.

इस सबके अलावा वे जिस चीज़ पर ध्यान दे रहे हैं वो हैं अपने पिता के दिल के बेहद करीब रहीं पंचायती राज संस्थाएं. बजट पर संसद मे दिए अपने भाषण में उनका कहना था, “पंचायती राज, गरीब से गरीब भारतीय की भी आवाज़ को उसकी ज़िंदगी को प्रभावित करने वाले फैसलों में शामिल कर देता है.”

“उनकी छाप फ्यूचर चैलेंज कमेटी और इसके एजेंडे में साफ देखी जा सकती है”, नाम न छापने के अनुरोध के साथ एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता बताते हैं. कमेटी के अध्यक्ष वीरप्पा मोइली इस एजेंडे को कुछ इस तरह से परिभाषित करते हैं, “हम पार्टी के लिए एक बिल्कुल नयी ‘यूएसपी’ बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं और देखना चाहते हैं कि क्या इसे केवल इसी के पैरों पर ही खड़ा किया जा सकता है(किसी गठबंधन के बिना). कमेटी का मकसद पार्टी के भीतर एक नयी गतिशीलता का संचार करना है.”

ये तो केवल समय ही बताऐगा कि कांग्रेस पर इन प्रयासों से कोई फर्क पड़ेगा या नहीं मगर जो बात पक्की है वो ये कि धीरे धीरे मगर स्थिरता के साथ ये युवा कांग्रेसी सांसद पार्टी की बागडोर की तरफ अपने हाथ बढ़ा रहा है. “वो किसी की इच्छाओं और आकांक्षाओं के हिसाब से नहीं चलते बल्कि खुद के हिसाब से चला करते हैं”, 10 जनपथ के एक करीबी नेता बताते हैं.

दर्शन देसाई

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