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   'विचार खुद हमें चुनते हैं'

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प्रतिष्ठित विज्ञापन निर्माता प्रसून जोशी के नाम के साथ एक बेहतरीन गीतकार, संवेदनशील कवि जैसे विशेषण भी जुड़ चुके हैं। हालांकि फिल्मों में गीत लिखना उन्होंने बाद में शुरू किया मगर वे खुद को सबसे पहले कवि ही मानते हैं। हाल ही में सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्म फेयर पुरुस्कार पाने वाले प्रसून से फिल्मकार नसरीन मुन्नी कबीर ने तहलका के लिए विशेष बातचीत की...

गीत लिखते वक्त मन में विचार कैसे आ जाते हैं?

हम विचारों को नहीं चुनते बल्कि विचार हमें चुनते हैं। हम किसी विचार को पकड़ नहीं सकते, लेकिन एक विचार हमें जकड़ लेता है। आपको अंगीकार करने वाला बनना पड़ता है, विचारों को स्वीकार करने के लिए तैयार रहना होता है। हमेशा सजग और तैयार रहना क्या है? मेरे लिए, ये फिल्म में डूब जाना है। जब मैं ऐसा करता हूं तो सबकुछ फटाफट हो जाता है। उससे पहले ये बड़ा मुश्किल होता है। उदाहरण के लिए, आम दो तरह के होते हैं। एक, जब आप उसे पेड़ से तोड़ते हैं। और उसके बाद उसे पकने तक आप इंतज़ार करते हैं। और दूसरा वो जो डाल पर ही पक कर खुद-ब-खुद टपक पड़ता है- जिसे "टपका" कहते हैं। ये सबसे मीठे होते हैं क्योंकि खुद प्रकृति ही इसे पका कर आपको देती है। गीत भी इसी तरह के होते हैं। कुछ खुद ब खुद आपकी कल्पनाओं में जन्म ले लेते हैं।

क्या गाने की परिस्थितियां(सिचुएशन) कैसी हों इस बारे में आपकी कोई भूमिका होती है?

इस मामले में मैं थोड़ा किस्मत वाला हूं, जिन लोगों के साथ मैं काम करता हूं वो मुझे कभी-कभी गानों की परिस्थितियां निर्मित करने की भी छूट दे देते हैं। रंग दे बसंती में "लुका-छिपी" गाने के लिए जगह नहीं थी। बेटे के अंतिम संस्कार का दृश्य था जहां एक मां अपने बेटे को खोने के अथाह दर्द का अनुभव कर रही है। रहमान और मैंने मिलकर एक मां और बेटे के बीच लुका-छिपी के खेल के विचार का उपयोग किया। इसके पीछे दुखद सच ये था कि बेटा हमेशा के लिए छुप गया था। कभी-कभी एक गाने के माध्यम से भावनाओं को व्यक्त करना संवादों की अपेक्षा ज़्यादा कारगर साबित होता है। जब मैं ऐसा गहराई से महसूस करता हूं तो मैं दृश्य में गाना जोड़कर इसे और प्रभावी बनाने की कोशिश करता हूं। मैं गानों की शक्ति में विश्वास रखता हूं।

कभी ऐसा हुआ कि आपने कोई गाना एक दृश्य को ज़ेहन में रखकर लिखा हो मगर उसका उपयोग किसी दूसरे ही दृश्य में हुआ हो?

हां, फिल्म "तारे ज़मीं पर" का गाना "मौसम का है मेहमान तू" मैंने उस समय के लिए लिखा था जब बच्चा अपने स्कूल से भाग जाता हैं। लेकिन आमिर इससे संतुष्ट नहीं थे। उनके मुताबिक ये गाना उस सिचुएशन के हिसाब से उपयुक्त नहीं था, इसलिए उन्होंने इसे फिल्म के क्लाइमेक्स में इस्तेमाल किया। मैंने इसे फिल्म के अंत के लिए नहीं लिखा था लेकिन ये गाना वहां बिल्कुल सटीक बैठा।

जब आप लिख रहे होते हैं तो, क्या उस समय कंपोज़र और आप पूरी तरह से अकेले होते हैं?

एक बार जानकारी मिल जाने के बाद सब कुछ मेरे और संगीत निर्देशक के बीच की बात होती है। कभी-कभी निर्देशक हमारे साथ होते हैं और कभी नहीं। मेरे ख्याल से संगीतकार और कवि चाहते हैं कि उन्हें अकेला छोड़ दिया जाए क्यों कि आप शब्दों और सुरों के साथ नये-नये प्रयोग कर रहे होते हैं। मैंने शंकर, एहसान और लॉय के साथ "फिर मिलेंगे" और "तारे ज़मीं पर" में काम किया है। मैं शंकर को काफी लंबे समय से जानता हूं। हम दोनों विज्ञापन जगत में साथ-साथ थे। वो बहुत ही सरल है। अगर कोई विशेष शब्द धुन में फिट नहीं हो रहा हो तो मैं उनसे कहता हूं--नहीं, मुझे ये शब्द हर हाल में चाहिए ही। ये बहुत महत्वपूर्ण हैं। ये किसी पेपरवेट की तरह है और अगर आप इसे हटा देंगे तो सब कुछ उड़ जाएगा। तब शंकर उस शब्द को धुन में शामिल करने का कोई न कोई तरीका खोज लेते हैं। मैंने जतिन-ललित के साथ भी काम किया है, जो कि थोड़ा पहले के संगीतकारों में से हैं और उनका काम करने का तरीका भी थोड़ा परंपरागत है।

आप इस स्टाइल को कैसे परिभाषित करते हैं?

उनके गाने अक्सर एक पूरे सुंदर पीस के रूप में संगीतबद्ध होते हैं। संगीत अंतरे से आगे बढ़ता है और अंतरे से मुखड़े तक जाता है। कंपोजीशन एक संपूर्ण ढांचा होता है--शुरुआत से लेकर अंत तक। वो मुझे एक पूरा खाका दे देते है और उसपर में शब्दों को संजोता हूं। कभी-कभी मैं उन्हें पहले बोल दे देता हूं इसके बाद धुन तैयार होती है। लेकिन ए आर रहमान के साथ काम करते वक्त तरीका दूसरा होता है। हम खूब बातचीत करते हैं। वो कभी-कभी सिर्फ एक टुकड़ा ही कंपोज़ करते हैं और मैं सिर्फ दो शब्द "रूबरू रोशनी" ही सोचता हूं। बाद में मैं पूरा गाना लिखता हूं और रहमान उस पर पूरी धुन खड़ी कर देते हैं।

"रूबरू" के बोल लीक से हटकर है। गाने की लाइनों में कोई क्रिया नहीं है। आपने ऐसा क्यों नहीं कहा- "मैं रूबरू हूं रोशनी के"

(हंसते हुए) कुछ ने ही इस पर ध्यान दिया है। मेरा विश्वास है कि लोग अनकही बातों के प्रति काफी सहज होते हैं। जब आप एक गीत लिखते हैं तो आप एक वृत्त को पूरा करते हैं, आप वो सब कुछ व्यक्त कर देते हैं जिसे आप कहना चाहते हैं। सबसे बेहतरीन रचनात्मकता वो होती है जब आप केवल एक बिंदु बनाएं और लोग पूरे वृत्त को देख लें। अगर आप श्रोताओं को शामिल होनें देंगे तो वो आपके विचार को पूरा कर देंगे।

मुझे ऐसा लगता है कि रहमान किसी भी गाने को एक-एक स्वर पर मेहनत करके बनाते हैं। 'आरडीबी' के सारे गाने ऐसे ही हैं। अगर खलबली है खलबलीकी बात करें तो इसमें ज़िद्दी शब्द पर बड़ा ज़ोर दिया गया है?

मैं रहमान के स्टूडियो में कुछ शब्द लिख रहा था...मैंने वो रहमान को दिए पर वो बोले कुछ और देखते हैं. इसपर मेरे मुंह से निकल गया, ज़िद्दी रहमान ! उन्हें ये बड़ा पसंद आया और बस गाने की लाइन बन गई ज़िद्दी, ज़िद्दी हैं अरमान...

क्या आप गाने को फिल्म की कहानी से जोड़ने की कोशिश भी करते हैं?

अगर आप मुझसे "चांद सिफारिश" जैसे गाने का मूल्यांकन करने के लिए कहेंगे तो मैं कहूंगा कि ये बढ़िया और मज़ेदार था। अगर आप पूछेंगे कि ये फना के लिए ठीक था या नहीं तो मैं कहूंगा इसने फिल्म में बहुत ही सटीक काम किया। यह आमिर के चरित्र से पूरी तरह मेल खाता है। आप ऐसा गाना लिखना चाहते हैं जो चरित्र विशेष पर फिट बैठता हो। इसमें एक घमंडी और तेज़ तर्रार लड़के की छाप थी। उपमा के रूप में चांद का उपयोग अक्सर किया जाता रहा है, लेकिन यहां मैंने चांद की कल्पना एक वकील के रूप में की है-

चांद सिफारिश जो करता हमारी देता वो तुमको बता,

शर्मो हया के पर्दे गिरा के करनी है हमको ख़ता।

किस तरह की फिल्मी परिस्थितियों पर लिखने में आपको मज़ा आता हैं?

मुझे पार्श्व में चलने वाले गाने लिखने में बड़ा मज़ा आता है--जो चरित्र के मन में चल रहा होता है लेकिन वो इसे व्यक्त करने में असमर्थ होता है। मैं उसकी सोच और उसकी अंतरंग भावनाओं को आवाज़ देता हूं। जब किसी गाने को कोई परदे पर गाता है तो उसकी अपनी ही सीमाएं होती हैं।

किसी गाने के पहले और बाद के दृश्य, क्या आपके लिए कुछ मायने रखते हैं?

गाने के संपूर्ण संदर्भ को समझना जरूरी होता है, फिर इसे भूल जाइए। दिमाग जरूरी चीज़ों को आत्मसात कर लेता है। अगर आप गाने से पहले की परिस्थितियों पर ज़ोर देते रहेंगे तो आप बार-बार एक ही बात दोहराएंगे। जबकि आपके गाने को कहानी में एक नया आयाम जोड़ने वाला होना चाहिए। तारे ज़मीं पर में एक मां अपने बेटे को बोर्डिंग स्कूल में छोड़ने आती है। बच्चा उसकी ओर देखता है, मां की आंखों में आंसू होते हैं। क्या मैं बच्चे या फिर मां की भावनाओं को कोई आवाज़ देता हूं? मैं कह सकता था, तू मुझे बहुत प्यारा है, मेरी आंखो का तारा है। लेकिन ये भावनाएं इन दृश्यों में ही निहित हैं। लिहाजा मैंने एक अकेले छोड़ दिए गए बच्चे के अनकहे डर को आवाज़ देने का फैसला किया-- "मैं कभी बतलाता नहीं, पर अंधेरे से डरता हूं मैं मां।"

क्या गाने ने वास्तव में लोगों पर असर डाला?

मुझे इस पर इतनी प्रतिक्रियाएं मिली कि मेरा मेल बॉक्स ही क्रैश हो गया।

इसने इतने सारे लोगों पर असर कैसे डाला?

सबके अंदर एक अभिभावक और एक बच्चा होता है। एक बच्चा जीवन भर अपनी मां के स्पर्श का भूखा रहता है। इस रिश्ते में मज़बूत भावनाएं अंतर्निहित होती हैं। महिलाओं को मां बनने और केवल उसी में संपूर्णता ढूंढ़ने के वास्ते दबाव डालने के लिए ममता का हमेसा महिमामंडन किया जाता है। लेकिन एक औरत का वजूद इससे कही ज्यादा होता है। जब आपको दर्द होता है, आप "मां" कह कर चिल्लाते हैं। "मां" गाने में कुछ "तारे ज़मीं पर" का है और काफी कुछ मेरा अपना।

आपका पालन-पोषण कैसे माहौल में हुआ है?

मैं एक छोटे से शहर में पला बढ़ा, और मेरा संपर्क हमेशा हिंदी और उर्दू से रहा। अंग्रेज़ी का एक शब्द भी नहीं बोला जाता था। मैं यूपी और उत्तरांचल में अल्मोड़ा में रहा। मेरा बचपन काफी मस्तमौला था। जब आप पहाड़ों पर रहते हैं तो आपको असल विश्वास की भावना देखने को मिलती है। आप प्रकृति से प्यार करते हैं। एमबीए की पढ़ाई के दौरान मैं ध्यानपूर्वक रॉक गानों के बोलों को सुनता था। 70-80 के दशक में बहुत बढ़िया गाने लिखे गए। मैं पॉल साइमन, द रोलिंग स्टोन, जिम मॉरिसन को पसंद करता था।

आपने हिंदी गानों के बारे कुछ नहीं कहा?

ये अजीब लगेगा पर मैं पुराने गानों का रसिक नहीं हूं। मैं ऐसे परिवार से आया हूं जहां क्लासिकल संगीत को पसंद किया जाता था। मेरे माता-पिता दोनों गायक थे। हां, मैं पुराने कवि-गीतकारों को जरूर पसंद करता हूं, विशेषकर कैफ़ी आज़मी को। मैं शैलेंद्र के गीतों की शैली पसंद करता हूं। उनके गाने आसानी से गुनगुनाए जा सकने वाले और स्वभाव से लचीले होते हैं। मैं ग़ज़ल और अर्धशास्त्रीय संगीत सुनता हूं। इसके अलावा आज़मी, शैलेंद्र और मजरूह सुल्तानपुरी को उनकी खुद की आवाजों में सुनता हूं। मैं कविताएं कवि की खुद की आवाज़ में सुनना पसंद करता हूं। इसमें कुछ ऐसा होता है जहां तक गायक या संगीतकार कभी पहुंच ही नहीं सकता।

आप विज्ञापन जगत में काम करते हैं साथ ही गीत और कविता भी लिखते हैं। क्या कभी इन दो अलग तरह की दुनियाओं में तालमेल बिठाने में कोई परेशानी हुई?

मैं पहले कवि बना, विज्ञापन की दुनिया में बाद में आया। परेशानी एडवर्टाइज़िंग से सामंजस्य बिठाने की थी कविता के साथ नहीं। कविता मेरे खून की हर बूंद में है। अगर आप मुझे सुबह जगाते हैं तो हो सकता है आप मुझे एक विज्ञापन करने के लिए तुरंत  तैयार नहीं कर पाएं मगर एक कविता के लिए मैं झट से तैयार हो जाऊंगा। लेकिन मैं कॉर्पोरेट जगत का भी पूरी शिद्दत से मज़ा लेता हूं हालांकि मुझे औपचारिक बोर्डरूम मीटिंग्स में कतई मज़ा नहीं आता। शायद इसकी वजह ये है कि मैं लोगों से सीधे तौर पर आमने-सामने के स्तर पर जुड़ने में यकीन रखता हूं। लेकिन एडवर्टाइज़िंग ने मुझे अपने आशय को लेकर स्पष्ट होना सिखाया। इसने मेरी कविताओं पर भी प्रभाव डाला। बिना समझे कुछ भी कह देना मुझे कभी संतोष नहीं देता।

एक कविता किस तरह से विचारों को गद्य की अपेक्षा बेहतर तरीके से व्यक्त करती है?

अपने अर्थशास्त्र के जरिए। उदाहरण देखें :

नावक-अंदाज़ जिधर दीदा-ए-जानां होंगे
नीम-बिस्मिल कई होंगे कई बे-जां होंगे

(जहां जहां मेरे माशूक की निगाहें पड़ेंगीं, कुछ घायल हो जाएंगे और कई मारे जाएंगे।)

बहुत ही सटीक विचार है। अगर आप इसे गद्य के सहारे व्यक्त करना चाहेंगे तो पूरा पेज भर जाएगा। इसके अलावा गद्य में पाठक या श्रोता की हिस्सेदारी भी सीमित होती है। ऐसा क्यों होता है कि गद्य को ज्यादा पसंद किया जाता है? क्योंकि गद्य आलसी लोगों के लिए होता है। कविता कल्पनाशील लोगों के लिए होती है। ये बुफे जैसा है जहां आपको खुद ही सर्व करना होता है क्योंकि खाना आपकी टेबल तक नहीं आएगा। मुझे दुख होता है कि लोग कविता के प्रति आकर्षण खो चुके हैं।

और इसमें संगीत की क्या भूमिका है?

संगीत एक पात्र की तरह हैं लेकिन इसकी आत्मा तो कविता ही है। मैं संगीतकारों से कहता हूं- शराब पहुंचाते आप हैं, लेकिन बनाते हम हैं।

क्या रचनात्मकता के इर्द-गिर्द ऐसा आभामंडल होता है जो आपको सहज या असहज बनाता है?

मैं कला को जरूरत से ज्यादा भाव नहीं देता हूं। मैं अपने फानेंशियल पार्टनर को कहता हूंमुझमें और तुममें कोई अंतर नहीं है। मेरे पास शब्दों को लिखने की ताकत है तो तुम्हारे अंदर संख्याओं को समझने की। अगर आप किसी झील के बारे में लिख रहे हैं तो आपको उसके सामने मौजूद होना जरूरी नहीं है। झील की छवि आपके मन में बहुत पहले से ही बसी हुई हो सकती है और यही शब्दों में ढ़ल जाती है। जब कोई मेरे किसी गाने को नकार देता है तो मुझे कतई बुरा नहीं लगता। अगर ये काम का नहीं है, तो नहीं है। सबसे बड़ी सीख जो मैंने सीखी है वो है विचारों को त्यागना। एडवर्टाइज़िंग ने मुझे यह सिखाया है। मैं किसी विचार के नकारे जाने पर पहले निराश हो जाता था। विज्ञापन जगत एक व्यावसायिक क्षेत्र है जिसकी अपनी परेशानियां है। सिनेमा में मुझे निर्देशक की सोच के साथ न्याय करना होता है। अगर मैं ऐसा नहीं करता हूं तो इसका कोई मतलब नहीं होगा।

आपको लगता है गाने फिल्मों में कुछ विशेष योगदान देते हैं?

बिल्कुल। मेरा मानना है कि गाने फिल्म के लिए आवश्यक हैं और ये फिल्म को एक नई दिशा देते हैं और सिनेमा ने इनका उपयोग बेहतरीन तरीके से किया है। गाने भावनाओं को जिस तरह से व्यक्त कर सकते हैं उस तरह से संवाद नहीं कर सकते। कविता और गद्य में प्यार अलग अलग तरीके से व्यक्त होता है। संवाद में हम कहते हैं-- आई लव यू। लेकिन कविता में इसे इस तरह से कह सकते है-- हमें तुमसे प्यार कितना, ये हम नहीं जानते, मगर जी नहीं सकते तुम्हारे बिना। पश्चिम की नकल के चक्कर में हम इस सौदर्य को खो देंगे। ग्लोबलाइजेशन की जो चीज़ मुझे सबसे ज्यादा चिंता में डालती है वो ये कि यहां कुछ लोग सोचते हैं कि अमेरिका की संस्कृति सबसे बढ़िया है, जबकि शायद ये दुनिया में सबसे घटिया है। सिर्फ इसलिए कि उनकी अर्थव्यस्था अच्छी है, उनका रहन सहन अपनाने की इच्छा की जाती है।

व्यक्तिगत तौर पर मेरा मानना है कि फिल्म के संगीत की उम्र फिल्म से कहीं ज्यादा होती है। गीत के साथ पहली जरूरत होती है कि वो परिस्थितियों से न्याय करे। लेकिन एलबम इसके आगे भी ज़िंदा रहते हैं और इनके गाने अलग अलग संदर्भों में याद आते रहते हैं। उदाहरण के तौर पर- "ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया", ये आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना ये "हम दोनों" के लिए लिखे जाने के वक्त था।

क्या सफलता ने आपको प्रभावित किया है?

मैं इसे गंभीरता से नहीं लेता। लेकिन सफल होने के फायदे भी हैं। लोग आपको ध्यान से सुनते हैं और आपके विचारों को सम्मान देते हैं। अगर मैं व्यस्त हूं तो लोग मेरा इंतज़ार करने के लिए भी तैयार रहते हैं। ये सफलता का उजला पक्ष है। इसका नुकसान ये है कि आप दोयम दर्जे के काम कर के भी बच जाते हैं। आपको एक सीमा रेखा खींचनी होगी और हमेशा इससे बचना होगा। आपको अपनी कलम के प्रति निर्दयी और ईमानदार बनना पड़ेगा। ये महत्वपूर्ण है।

अपनी राय दें comment कुल टिप्पणियां: 4

  • प्रेषक : Divya Prakash Dubey
    प्रसून जोशी की कहानी सुने के लगता है जैसे ये हमारे जैसे किस्सी आम आदमी की कहानी है जो शायद दुनिया को थोड़ा डूब के जी लेता है ,अपने शब्दों से एक नई दुनिया खीच देता है | रूबरू से जोश भर देता है और तुझको पता है न माँ बोल के आंसू चखा देता है | तहलका की पूरी टीम को बधाई ऐसे लेख के लिए | And Hats off for Prsoon joshi "क्या सोच रहा था पता नही जब शाम के हाथों रात हुई , कागज़ पे यूं ही अनजाने तेरी मूरत साकार हुई "
  • प्रेषक : Rakesh
    Aapko jaanne se kai baaten jaanin...
  • प्रेषक : राजीव जैन
    आपको पहले विज्ञापन जगत से जाना। पहली बार जब गीतकार का नाम प्रसून जोशी सुना तो लगा शायद कोई नया आदमी है। पर बाद में पता चला कि ये आप ही हैं। तारे जमीं का मैं कभी बतलाता नहीं पर अंधरे से डरता हूं मैं मां। गीत मुझे बेहद पसंद है। तहलका टीम ने आपसे रूबरू कराया शुक्रिया, मेहरबानी
  • प्रेषक : vishnu
    अच्छा लगा...कुछ बातें समझ में आईं...शुक्रिया