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   प्रधानमंत्री का दुख
सुख में बड़े लोग शानदार लगते हैं। दुख में लाचार।
सफेद कपड़े और काला चश्मा। बड़े लोग किसी बड़े दुख को इसी तरह ज़ाहिर करते हैं। वो छाती पीट कर रोते-बिलखते नहीं हैं। लगता है कि क्या बड़ा होना हुआ जो रोना ही नहीं हो सका। मनमोहन सिंह का दुख ऐसा ही लगता है। दुख है मगर आंसूओं को काले चश्मे से ढंक देते हैं। नहीं कहते कि मैं निराश हो गया हूं। हार गया हूं।
बस इशारा करते हैं। कहते हैं कुछ निराशाओं के साथ जीना पड़ता है। ज़िंदगी ख़त्म नहीं होती। लेकिन यह भी नहीं बताते कि जीने की उम्मीद की वजह क्या है। क्यों आप निराशा और उम्मीद के बीच झूला झूल रहे हैं? फिर से प्रधानमंत्री ने कह दिया कि खंडित जनादेश के कारण मनमाफिक काम नहीं कर पा रहा हूं। साढ़े तीन साल बाद प्रधानमंत्री को जनादेश खंडित लग रहा है। लेकिन इस दुख को भी वो सफेद कुर्ता पहनकर और काला चश्मा लगाकर व्यक्त कर रहे हैं। वो आम नेता की तरह कुर्ता फाड़ कर दहाड़ नहीं रहे। रो नहीं रहे हैं।
| वो आपत्तियों से नहीं भिड़ रहे हैं। उनका जवाब नहीं दे रहे हैं। उन आपत्तियों पर सवाल नहीं उठाते। लगता है मनमोहन सिंह साढ़े तीन साल तक प्रधानमंत्री होने के बाद भी राजनेता नहीं हो सके। |
अजीब दुख है। प्रधानमंत्री ने एक बार भी कड़क कर नहीं कहा कि परमाणु करार क्यों चाहते हैं। एक बार इशारा भी किया तो करार पर बात करने से पहले ही सरकार तक को कुर्बान करने का भावुक बयान दे डाला। बाद में कांग्रेस के बीचबचाव के कारण उन्हें गठबंधन की आपत्तियों का सम्मान करना पड़ रहा है। तब भी वो आपत्तियों से नहीं भिड़ रहे हैं। उनका जवाब नहीं दे रहे हैं। उन आपत्तियों पर सवाल नहीं उठाते। लगता है मनमोहन सिंह साढ़े तीन साल तक प्रधानमंत्री होने के बाद भी राजनेता नहीं हो सके। खंडित जनादेश की बात कर देश से ज़्यादा अपनी लाचारी बता रहे हैं। कह नहीं पा रहे हैं कि करार न हुआ तो देश की बदनामी होगी। जनता को नुकसान होगा। उसे बिजली नहीं मिलेगी। ऐसा लगता है प्रधानमंत्री के लिए यह करार निजी मामला है।
प्रधानमंत्री पद के लिए मनमोहन सिंह स्वाभाविक उम्मीदवार नहीं थे। राजनीतिक परिस्थिति में बना दिए गए। तो स्वीकार कर लिया और सोनिया जी को त्याग की मूर्ति बताते रहे। लेकिन खुद को कभी तैयार नहीं कर पाये कि राजनीति में कई चीज़ों का त्याग खुद भी करना होगा। राजनेता होते तो वाम दलों और संसद के अन्य प्रतिनिधियों की राय को मान लेते। उन्हें लगता कि जब इस देश का लोकतंत्र नहीं चाहता तो भावुक होने का मसला नहीं है। फिर लोकतंत्र के रास्ते से बहस करते। देश को समझाते कि आप परमाणु मुद्दे पर अपना जनादेश दें। यह आपके लिए ज़रूरी है। मनमोहन ऐसा नहीं कर रहे हैं। वो दुखी हो रहे हैं।
इशारे में दुख ज़ाहिर कर रहे हैं कि जनादेश नहीं है। गठबंधन की मजबूरी होती है। दरअसल वो एक ऐसे ईमानदार नेता की तरह बात कर रहे हैं जो खुद तो ईमानदार है लेकिन वो सिस्टम से नहीं लड़ता। उनके भीतर का ईमानदार अफसर रिटायर होने तक देश की सेवा करना चाहता है। वो लिंग्दोह की तरह सिस्टम से नहीं लड़ रहे हैं। बगावत नहीं कर रहे। बल्कि अपनी साफ सुथरी फाइल पर दस्तखत चाहते हैं। मनमोहन सिंह एक ईमानदार होने के साथ बाकी सब कुछ भले हों मगर नेता नहीं हैं। एक ईमानदार नेता या अफसर को लड़ना पड़ता है। रास्ता बनाना पड़ता है। बाकी देश पर छोड़ना होता है कि देश उसके रास्ते पर चलना चाहता है या नहीं। इसके लिए जनता के बीच में जाना होता है। समस्या यही है। मनमोहन सिंह जनता के बीच से आये ही नहीं हैं। इसलिए बीच में नहीं जा सकते। यह फैसला भी पार्टी करेगी। प्रधानमंत्री नहीं। मनमोहन सिंह का दुख यही है कि वो इस संकट में जनता को याद नहीं कर पा रहे हैं। उनके बीच नहीं जा पा रहे हैं।
रवीश कुमार
(लेखक एनडीटीवी इंडिया में वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
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कुल टिप्पणियां: 5
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प्रेषक : Jawarimal ParakhRavishji, Aapne achchha likha hai. Lekin mujhe apki imandari ki baat gale nahin utari. Yeh kaun si imandaari hai jo desh ki azadi ki ladai ko nakarti ho. Jo angrezi aur amriki hukumat ki jee hazoori karvati ho aur jo desh ki samprubhata aur azadi ko khatre men daalti ho. Manmohan singh ki imandaari desh aur yahan ki garib janta ke khilaf khari hai. Jawarimal Parakh
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प्रेषक : पुनीतारवीश जी, आपने तो प्रधानमंत्री को सही ललकाकारा है. बात तो तब बनती है जब सचमुच वो इस बात को समझ सकें कि लोकतंत्र को चलाने के लिए जनता के बीच जाकर उनकी प्राथमिकताओं को समझना पड़ेगा. और खैरियत में मिली सत्ता सुख को वो त्याग भी नहीं पा रहें हैं. इमानदारी सिफ मैड़ल है नेता के लिए और कुछ नहीं. जनता का सुख ही किसी भी नेता के लिए सवोपरी होना चाहिए. कहानियों में सुन रखा है कि राजा - महाराजा लोग रात्री बेला में प्रजा की दुख दर्द समझने निकलते थे और सुबह ही दुखी व्यक्ित का दुख निवारण करते थे. मनमोहन जी तो ऐसा करने से रहे. दिनभर के थके हारे मनमोहन सिंह जी को अगर दिल्ली के ठंड़ में वेश बदल कर निकलने का मन भी करे तो सोनिया जी से इजाजत लेनी पडे़गी. तो यह है हमारी सरकार और ऐसे हैं सत्ताधिकारी. इसलिए बिगुल बंद नहीं होना चाहिए. बजते रहे... शायद खुदा ना खास्ते हमारी आवाज उन तक पहुँच जाए।
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प्रेषक : vineeta singhbahut achcha likha Raveeshji ne, lekin kya achcha ho ki khud pradhanmantri apne bare mein likhe is lekh ko padh lein, sadbudhdhi milegi loktantra ko samajhne ki. shyad tab unko anpna dukh kam lage.gift mein mile PM ki kursi par wo apna vyaktigat adhikar samajh rahe the. badhai lekhak ko safgoee se likhne ke liye.
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प्रेषक : gauravamerica ke dalal hain ye pradhan mantri, south delhi se bhi chunav nahin jeet sake, khandit janadesh ke magarmachhi aansoo bahate hain
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प्रेषक : prasun latantravis kumar ne achcha likha hai. badhayee.
























