देखो नया इंडिया जा रहा है...
भूत प्रेत और स्वर्ग की सीढ़ी तक पहुंचने का तरीका जानने की उत्सुकता एक नये भारत की उत्सुकता है। और इस उत्सुक भारत तक भूत प्रेत को पहुंचाना नई पत्रकारिता। यही बदलता भारत है और बदलती ख़बरें। जो यह नहीं समझते हैं उन्हें खबरों की समझ नहीं, ऐसी अकाट्य दलीलें हिंदी न्यूज़ चैनलों के कुछ बड़े पत्रकार देते हैं। उन्नीसवीं सदी में अंधविश्वास से लड़ने वाले समाजसुधारक आज ज़िंदा होते तो वे हिंदी न्यूज़ चैनल के पत्रकारों और संपादकों से लड़ते और हार जाते। क्योंकि ये लोग कहते कि आपकी बात सही है हम सरकार और समाज से लड़ सकते हैं टीआरपी से नहीं। टीआरपी से लड़ना हमारे पेशे की निष्पक्षता और निर्भीकता की परिभाषा में किसी ने लिखा नहीं तो हम क्या करें। ऐसा लगता है कि टीआरपी ने न्यूज़ चैनलों को रस्सी से बांध दिया है और निर्णय लेने वाले पत्रकारों को खूब मज़ा आ रहा है।
तमाम बहसों और आलोचनाओं के बाद भी हिंदी न्यूज़ चैनलों का विश्वास नहीं हिला है। वो कायम हैं अपनी भूत प्रेत की पत्रकारिता पर या फिर सारेगामापाधानिकारिता पर। शायद इंडिया ऐसा ही होगा। बस यह समझ में नहीं आता कि यह इंडिया अंग्रेजी के अखबारों, टीवी चैनलों और अन्य भाषाई टीवी चैनलों को क्यों नहीं दिख रहा है। क्या ये लोग आउट ऑफ इंडिया हो चुके हैं। क्या इंफोसिस के नारायणमूर्ति और विप्रो के अज़ीम प्रेमजी को यह इंडिया दिखा ही नहीं। देर-सबेर ये लोग भी हिंदी न्यूज चैनलों को देखकर भूतों का बीपीओ बनायेंगे जिनके कॉल सेंटरों में रातों को जागकर एक्ज़िक्यूटिव भूतों के फोन रिकार्ड करेंगे और उनका बिज़नेस आउटसोर्स करेंगे। यह समझ में नहीं आता कि यह इंडिया अंग्रेजी के अखबारों, टीवी चैनलों और अन्य भाषाई टीवी चैनलों को क्यों नहीं दिख रहा है। क्या ये लोग आउट ऑफ इंडिया हो चुके हैं।
एक किताब है एलिमेंट ऑफ जर्नलिज़्म। बिल कोवाश और टॉम रोज़ेंस्टियल ने लिखी है। नब्बे के आखिरी दशक में अमरीका में भी पत्रकारिता को लेकर इसी तरह की बहस हो रही थी। पत्रकार भी आम लोगों की तरह बात करने लगे कि वाकई पतन हो चुका है। न्यूज़ रूम में पत्रकारिता की कोई बात ही नहीं होती। तब जून १९९७ में कई अखबारों,रेडियो और न्यूज़ चैनलों के संपादकों की बैठक हुई। कमेटी ऑफ कंसर्न्ड जर्नलिस्ट का गठन हुआ। दो सवालों को लेकर। पत्रकारिता में क्या ग़लत हो रहा है और क्यों ख़बरें मनोरंजन में बदल रही हैं। दो साल तक 3000 लोगों से सीधे बातचीत और 300 पत्रकारों के बीच गहनशोध हुआ। इसमें मीडिया, संस्कृति जैसे विषयों पर शोध करने वाले प्रोफेसर भी शामिल थे।
इस किताब का एक निष्कर्ष इतिहासकार मिशेल स्टीफेंस के हवाले से दिया गया है कि इतिहास के हर दौर में, तमाम मुल्कों और संस्कृतियों में ख़बरों का पैमाना नहीं बदला है। एक समान रहा है। और अध्ययन बताता है कि लोग जितना समय ख़बरों के लिए निकालते रहे हैं उसमें कोई बदलाव नहीं आया है। हर पत्रकार को यह किताब पढ़नी चाहिए। पता चलेगा कि हमारे हिंदी टीवी जगत में जो बहस हो रही है उन्हीं विषयों पर दुनिया के कई मुल्कों में पहले बहस हो चुकी हैं। शोध बताता है कि जब ख़बर का प्रवाह बाधित होता है तब अंधेरा हो जाता है। चिंता बढ़ने लगती है। हम अकेला महसूस करने लगते हैं।
अमरीका के एक कैदी ने लिखा था कि पांच साल तक जेल में रहने के बाद उसे आराम की तकलीफ नहीं हुई बल्कि इस बात की कमी महसूस हुई कि खबर नहीं मिल रही है। हमें न्यूज़ की क्यों ज़रूरत होती है? अपनी रक्षा और एक दूसरे से जुड़ने के लिए। पत्रकारिता एक व्यवस्था है जिसके जरिये समाज ख़बरें पैदा करता है। इसलिए हम खबर और पत्रकार के चरित्र की बात करते हैं। इस निरंतरता को कैसे समझाया जाए। जवाब है कि समाचार, खबर मूल इंसानी फितरत, इम्पल्स को संतुष्ट करता है। लोग जानना चाहते हैं कि उनके अनुभव से आगे और क्या हो रहा है। इंसान के जागरुक बने रहने की भूख से पैदा होती है खबर में दिलचस्पी।
हिंदी पत्रकारिता का संकट खराब पत्रकारों का संकट नहीं है। उनके भीतर के विश्वास का संकट है। भूत प्रेत पत्रकारिता का, दर्शक की पसंद के बहाने बचाव करने वाले ये पत्रकार अपने समय के बेहतरीन पेशेवरों में से रहे हैं। इन्हें भारत की खूब पहचान है। अगर ये कहते हैं कि इंडिया और ख़बर की समझ बदल गई है तो बदल गई होगी। शुक्र है इंडिया सिर्फ हिंदी के न्यूज़ चैनल के लिए बदल रहा है वर्ना आपको अपने ही घर में घुसने में डर लगता कि कहीं कोई है....
| हिंदी का पाठक इतना गंभीर और हिंदी का दर्शक इतना हल्का ? ऐसा है क्या? जैसे कोई नेता कहता है कि बिना काले पैसे के चुनाव नहीं लड़ा जा सकता और पैसा पब्लिक में ही खर्च होता है उसी तरह से हिंदी टीवी के पत्रकार कह रहे हैं कि क्या करें दर्शक के लिए ही तो ये सब कर रहे हैं। |
लेकिन हिंदी के अख़बार जिस बदलते भारत को देख रहे हैं वो कहां से आ रहा है? क्या वो गढ़ रहे हैं या वाकई भारत बदल रहा है? हिंदुस्तान अख़बार ने एक बदलते भारत और सपनों की उड़ान को अभियान के तौर पर चलाया है। अमर उजाला की ख़बरें बता रहीं हैं कि उत्तर भारत का हिंदी समाज यूरोप में नौकरी की संभावनाओं के बारे में जानना चाहता है। अमर उजाला में शिवप्रसाद जोशी की पहली ख़बर छपी कि किस तरह से नीतिगत बदलावों से हज़ारों भारतीयों को नौकरी मिल सकती है। अमर उजाला के मदन जैडा की ख़बरे हर दिन बदले भारत की तस्वीर पेश करती हैं तो हिंदुस्तान के हरवीर सिंह की गेंहूं, कपास और डेयरी पर रिपोर्टिंग उन्हें इस देश के चुनिंदा पत्रकारों की कतार में खड़ी कर देती है। ये सब हिंदी के पत्रकार हैं। दैनिक भास्कर पढ़िए। पूरी दुनिया नज़र आती है।
हिंदी का पाठक इतना गंभीर और हिंदी का दर्शक इतना हल्का ? ऐसा है क्या? जैसे कोई नेता कहता है कि बिना काले पैसे के चुनाव नहीं लड़ा जा सकता और पैसा पब्लिक में ही खर्च होता है उसी तरह से हिंदी टीवी के पत्रकार कह रहे हैं कि क्या करें दर्शक के लिए ही तो ये सब कर रहे हैं। वो अपने बचाव में नई-नई दलीलें ढूंढ़ रहे हैं।
इन दिनों अपनी बेटी के एडमिशन के लिए कई स्कूलों में गया। माता-पिता को बातचीत के लिए बुलाया जाता है। वहां प्रिंसिपल और टीचर मेरी बेटी और पत्नी से बात नहीं करते जबकि मेरी पत्नी शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ी हुई हैं। कोई उनसे यह नहीं पूछता कि पढ़ाने के तरीके में क्या बदलाव हो सकता है। सब मुझसे पूछते हैं। एक ही सवाल करते हैं। जैसे मैं टीवी का पत्रकार नहीं जेबकतरा हूं। एक स्कूल तो वहीं था जिसके ठीक सामने देश के चार न्यूज़ चैनलों का दफ्तर है। नोएडा में सेक्टर सोलह में। इस स्कूल में कई पत्रकारों के बच्चे पढ़ते हैं। मैं बस कल्पना कर सकता हूं कि इस संवाद में मेरे साथ एस पी सिंह होते तो क्या कहते? क्या वैसा ही कहते जैसा कि उनके साथ काम करने वाले एक पत्रकार ने कहा कि एस पी हिंदी पत्रकारिता के इस हाल को देखकर खुश होते और जो आज के हिंदी टीवी चैनलों की आलोचना कर रहे हैं उन्हें ख़बर की समझ नहीं है। बीच बहस में ऐसे दावों से थोड़ा डर लगता है। काश हम भी पिशाच प्रेमी भारत को देख पाते। कम से कम पत्रकार कहलाने लायक तो हो जाते।
रवीश कुमार
(लेखक एनडीटीवी इंडिया में वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
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कुल टिप्पणियां: 11
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प्रेषक : Dr Anurag Aryaकमाल की बात तो ये है की सभी पत्रकार टी आर पी के सर्पदंश का रोना रोते है ओर फ़िर किसी बड़े सांप के तले बैठ जाते है......कल एक चैनल शिरडी के साई बाबा के चमत्कार घंटे भर दिखाता रहा ,कोई बड़ी बड़ी मलायो वाले बाबा को लेकर ज्योतिष गणना करता है तो कोई आपने आप को श्रेष्ट घोषित कर एक महिला को बिठा कर कार्ड खोल देता है.....समाचार गायब है.......कही चुटकले है ,कही फूहड़ खबरे.....खली ,राखी सावंत अब रश्रिया चैनल की खबरे बनते है ...कहाँ है खोजी पत्रकारिता ?काश भारत मे कोई ऐसा दिन आए जब कोई न्यूज़ रीडर किसी ख़बर को पढने से मन कर दे .......इश्वर के लिए हिन्दी दर्शको को इतना मूर्ख ओर फूहड़ न समझिए.....आप प्रसून वाजपयी ,बरखा दत्त ,दुआ जैसे लोगो से कुछ आशाये है .....इन्हे बनाये रखियेगा.....
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प्रेषक : abhayRavish ji, aapka kahna kafihuud thak thik hay per ,may yah nahi samjta ki ,TRP nay hi news channel ko ya news paper ko jakda hay ,quki TRP ki paribha bhi hum jasay logo nay hi to tayar ki hay ,or aaj bhi kai aasay channel hay jo bhut kahyt kay aalawa ,grass root kay problem dikahatay hay .....kay unko TRP ki nahi padi ,padi hay per shayad unohanay MEDIA or channel ka matlab pata hay ......
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प्रेषक : नितिन व्यास"उन्नीसवीं सदी में अंधविश्वास से लड़ने वाले समाजसुधारक आज ज़िंदा होते तो वे हिंदी न्यूज़ चैनल के पत्रकारों और संपादकों से लड़ते और हार जाते। क्योंकि ये लोग कहते कि आपकी बात सही है हम सरकार और समाज से लड़ सकते हैं टीआरपी से नहीं। टीआरपी से लड़ना हमारे पेशे की निष्पक्षता और निर्भीकता की परिभाषा में किसी ने लिखा नहीं तो हम क्या करें। ऐसा लगता है कि टीआरपी ने न्यूज़ चैनलों को रस्सी से बांध दिया है और निर्णय लेने वाले पत्रकारों को खूब मज़ा आ रहा है।" सटीक कथन।
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प्रेषक : kamaljeet singhravish ji aapne aaj ke daur main hindi channel mai chal rahe drama ko aachi tarash se parosa... \ek baat aur bhi hai ki media main aacha khasa dakhal rakhne wale is subject pur charcha karte rehte hai pur mujhe ek bhaut khatakti hai ki koi bhi iss samshya ke hal ke baare mai charcha karne koi tayar nahi hai ...sabhi ek dusre pur kichad uchalne ko tayar hai...isleye plz is samasya ke hal ke baare main soche....
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प्रेषक : Ashita Sethravish ji ke article ko padhkar mazaa to bahut aaya, lekin saath mei dukh bhi hua ki sach me aaj journalism ke mayene badal gaye hai. aaj channels ki lambi kataar to nazar aati hai lekin T.v channels ke paas bas khabar chodhkar baaki sab kuch hai. sabhi media channels ke heads ko journalism ka paath fir se padhne ki zarurat hai.






















